भारत में नदियों को मां का दर्जा दिया जाता है। गंगा, यमुना, नर्मदा और गोदावरी जैसी नदियों की पूजा होती है, उनके नाम पर पर्व और अनुष्ठान होते हैं। इसी देश में एक ऐसी नदी भी है, जिसे न तो धार्मिक मान्यता मिली और न ही पूजा का अधिकार, इस नदी को लोग चंबल के नाम से जानते हैं। सवाल यह है कि आखिर चंबल नदी को सदियों से पूजा से दूर क्यों रखा गया? क्या सच में यह नदी श्रापित है या फिर इसके पीछे कोई और ऐतिहासिक और सामाजिक वजह छिपी हुई है?

 

मध्य भारत से होकर बहने वाली चंबल नदी को लेकर पौराणिक कथाओं में श्राप की कहानियां मिलती हैं। कहा जाता है कि प्राचीन यज्ञों में हुई हिंसा और रक्त प्रवाह की वजह से इस नदी को अपवित्र घोषित कर दिया गया। समय के साथ यह मान्यता इतनी गहरी होती चली गई कि धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं में चंबल का नाम लगभग गायब हो गया। बाद के दौर में डाकुओं और हिंसा से जुड़े घटनाक्रमों ने भी इस नदी की छवि को और नकारात्मक बना दिया।

 

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चंबल नदी की पूजा क्यों नहीं होती?

भारत की अधिकांश नदियां गंगा, यमुना, नर्मदा, गोदावरी पूजनीय मानी जाती हैं लेकिन चंबल नदी को लेकर आम धारणा है कि इसकी पूजा नहीं होती या बहुत सीमित रूप में होती है। इसके पीछे पौराणिक श्राप, हिंसा से जुड़ी कथाएं और सामाजिक भय जुड़े हुए हैं।

चंबल नदी से जुड़ी पौराणिक कथा

राजा रंतिदेव और ब्राह्मणों का श्राप

पुराणों और लोककथाओं के अनुसार, राजा रंतिदेव एक महान दानी राजा थे। उनके राज्य में एक विशाल यज्ञ आयोजित हुआ, जिसमें बड़ी संख्या में पशुओं की बलि दी गई। यज्ञ के बाद मरे हुए पशुओं का रक्त और अवशेष एक नदी में प्रवाहित किया गया। यह नदी बाद में चंबल कहलाने लगी। इससे क्रोधित होकर ब्राह्मणों और ऋषियों ने नदी को श्राप दे दिया कि यह नदी पवित्र नहीं मानी जाएगी और इसकी पूजा नहीं होगी, मान्यताओं के अनुसार, इसी वजह से चंबल को श्रापित नदी कहा जाने लगा।

 

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हिंसा और रक्त से जुड़ी मान्यता

एक अन्य मान्यता के अनुसार, चंबल क्षेत्र में प्राचीन काल से युद्ध, नरसंहार और हिंसा ज्यादा होती रही। मान्यता है कि कई युद्धों में मरे हुए सैनिकों और अपराधियों के शव इसी नदी में बहाए गए,  इससे नदी को अपवित्र माना जाने लगा। यही वजह बना कि धार्मिक कर्मकांडों में इसे शामिल नहीं किया गया।

क्या चंबल की कभी पूजा होती थी?

हां, प्रारंभिक काल में चंबल की पूजा होती थी लेकिन वह पूजा स्थानीय लोगों तक ही सीमित थी। आदिवासी और ग्रामीण समुदाय नदी को जीवनदायिनी मानकर पूजते थे। कृषि, पशुपालन और जल-स्रोत के रूप में इसका महत्व था लेकिन ब्राह्मणवादी परंपराओं में इसे स्थान नहीं मिला और धीरे-धीरे धार्मिक ग्रंथों और सामाजिक मान्यताओं में इसका स्थान कम होता चला गया।

पूजा कब और क्यों बंद हुई?

माना जाता है कि उत्तर वैदिक काल और महाजनपद काल (लगभग 1000–500 ईसा पूर्व) के बाद जब शास्त्र आधारित धार्मिक व्यवस्था मजबूत हुई, तब चंबल को अपवित्र नदी की श्रेणी में डाल दिया गया।

डाकुओं से जुड़ने की वजह से बदनामी

मध्यकाल और आधुनिक काल में चंबल का इलाका डाकुओं (बागियों) का गढ़ बन जाता था। हिंसा, अपहरण और हत्याओं की वजह से यह क्षेत्र डर का प्रतीक बन गया, इससे चंबल की छवि और भी नकारात्मक होती चली गई हालांकि यह एक सामाजिक-राजनीतिक वजह थी, धार्मिक नहीं।

क्या चंबल वास्तव में अपवित्र है?

नहीं। यह एक भ्रम है। चंबल नदी आज भी भारत की सबसे स्वच्छ नदियों में गिनी जाती है, इसमें घड़ियाल, डॉल्फिन, कछुए जैसे दुर्लभ जीव पाए जाते हैं। इसका जल कई जगहों पर पीने योग्य भी है।