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प्रदोष और शिवरात्रि में अंतर, क्या दोनों का कोई खास संयोग है?

हिंदू धर्म में भगवान शिव से जुड़े कई पावन दिन माने जाते हैं, जिनमें शिवरात्रि और प्रदोष व्रत प्रमुख हैं। ये दोनों शिव को समर्पित हैं और इनके बीच एक विशेष संबंध है, जिसे समझना जरूरी है।

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प्रतीकात्मक तस्वीर, AI Sora

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हिंदू धर्म में अनेक पर्व और त्योहार मनाए जाते हैं। इनके अलावा हर दिन का भी अपना विशेष महत्व होता है। भगवान शिव से जुड़े कई ऐसे दिन हैं जो बहुत पावन माने जाते हैं। इनमें शिवरात्रि और प्रदोष व्रत प्रमुख हैं, जो पूरी तरह शिव भक्ति को समर्पित हैं। इन दोनों के बीच एक खास संबंध भी है, जिसे जानना और समझना दोनों जरूरी है।

 

शिवरात्रि और प्रदोष व्रत, दोनों ही भगवान शिव की आराधना के महत्वपूर्ण अवसर हैं। देखने में ये एक जैसे लग सकते हैं लेकिन शास्त्रों के अनुसार इनके समय और महत्व में स्पष्ट अंतर बताया गया है।

 

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प्रदोष और शिवरात्रि में मुख्य अंतर

  • प्रदोष हर हिंदू महीने के 13वें दिन यानी त्रयोदशी को आता है। वहीं शिवरात्रि हर हिंदू महीने के 14वें दिन यानी चतुर्दशी को आती है।
  • प्रदोष महीने में दो बार, कृष्ण और शुक्ल पक्ष वहीं शिवरात्रि महीने में एक बार, कृष्ण पक्ष।
  • प्रदोष में पूजा सूर्यास्त के समय की जाती है वहीं शिवरात्रि में पूजा रात्रि के समय की जाती है।

आसपास पड़ने का विशेष कारण

इनके आसपास पड़ने का एक बहुत ही सटीक खगोलीय और आध्यात्मिक कारण है। यह कोई संयोग नहीं बल्कि हिंदू पंचांग की गणना पर आधारित है। हिंदू कैलेंडर चंद्रमा की कलाओं पर चलता है। त्रयोदशी के ठीक बाद चतुर्दशी आती है। चूंकि प्रदोष त्रयोदशी को होता है और मासिक शिवरात्रि चतुर्दशी को, इसलिए ये हमेशा एक के बाद एक पड़ते हैं। मासिक शिवरात्रि हमेशा अमावस्या से एक दिन पहले आती है जब चंद्रमा लगभग दिखना बंद हो जाता है।

 

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'प्रदोष' और 'शिवरात्रि' का मिलना

जब कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि सूर्यास्त के समय हो और उसी रात चतुर्दशी तिथि लग जाए तो इसे 'शनि प्रदोष' या 'भौम प्रदोष' के साथ शिवरात्रि का अद्भुत संयोग माना जाता है। साल में एक बार आने वाली महाशिवरात्रि के ठीक एक दिन पहले भी प्रदोष व्रत पड़ता है। इसे 'महाप्रदोष' के समान फलदायी माना जाता है क्योंकि यह साल की सबसे बड़ी शिवरात्रि की पूर्व संध्या होती है।

 

प्रदोष का काल सूर्यास्त से लगभग 45 मिनट पहले और 45 मिनट बाद का समय माना जाता है। मान्यता है कि इस समय महादेव कैलाश पर्वत पर प्रसन्न मुद्रा में नृत्य करते हैं। निशिता काल यानी आधी रात का वह समय जब शिवरात्रि की मुख्य पूजा होती है। यह समय ब्रह्मांडीय ऊर्जा के उच्चतम स्तर पर होने का माना जाता है।

 

नोट: इस खबर में लिखी गई बातें धार्मिक और स्थानीय मान्यताओं पर आधारित हैं। हम इसकी पुष्टि नहीं करते हैं।

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