20वीं सदी की वैश्विक अर्थव्यवस्था की जिसने अगुवाई की है वह था तेल। तेल के दाम बढ़ते ही महंगाई बढ़ती थी, सरकारों पर दबाव आता था, युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव गहराते थे और पूरी वैश्विक ग्रोथ पटरी से उतर जाती थी। लेकिन 21वीं सदी की अर्थव्यवस्था अब एक अलग दिशा में बढ़ रही है, जहां ग्रीन एनर्जी, इलेक्ट्रिक व्हीकल, डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस विकास के नए स्तंभ बन चुके हैं। इस नए आर्थिक ढांचे में एक मेटल चुपचाप वही भूमिका निभा रहा है, जो कभी तेल निभाता था, और वह है कॉपर।
अब तक कॉपर को 'डॉक्टर कॉपर' कहा जाता था, यानी ऐसा मेटल जिसकी मांग देखकर वैश्विक अर्थव्यवस्था की सेहत का अनुमान लगाया जाता है। लेकिन आज कॉपर सिर्फ एक इंडिकेटर नहीं रह गया है, बल्कि वह खुद पूरे सिस्टम का बैकबोन बनता जा रहा है। यही वजह है कि कॉपर की संभावित वैश्विक कमी को अब सिर्फ कमोडिटी साइकिल का हिस्सा नहीं, बल्कि एक गहरे ‘सिस्टेमैटिक रिस्क’ के रूप में देखा जाने लगा है।
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काफी जगह प्रयोग होता है कॉपर
सोलर पैनल, विंड टरबाइन, स्मार्ट ग्रिड, बैटरी स्टोरेज और हाई-वोल्टेज ट्रांसमिशन लाइन, इन सभी में बड़ी मात्रा में कॉपर की जरूरत होती है। पारंपरिक बिजली उत्पादन की तुलना में रिन्यूएबल एनर्जी सिस्टम में कई गुना अधिक कॉपर इस्तेमाल होता है। जैसे-जैसे दुनिया के देश कोयले और तेल से हटकर स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ रहे हैं, वैसे-वैसे कॉपर की मांग भी संरचनात्मक रूप से बढ़ती जा रही है।
इलेक्ट्रिक व्हीकल क्रांति ने इस मांग को और तेज कर दिया है। जहां एक पारंपरिक पेट्रोल या डीज़ल कार में सीमित मात्रा में कॉपर लगता है, वहीं एक इलेक्ट्रिक व्हीकल में मोटर, बैटरी, इन्वर्टर और वायरिंग के कारण तीन से चार गुना ज्यादा कॉपर की जरूरत होती है। अगर दुनिया वास्तव में EV को बड़े पैमाने पर अपनाने की ओर बढ़ती है, तो यह कॉपर की मांग में एक ऐसा विस्फोट होगा, जिसके लिए मौजूदा सप्लाई सिस्टम तैयार नहीं है।
शहरीकरण और इंफ्रास्ट्रक्चर विकास भी इस कहानी का अहम हिस्सा हैं। मेट्रो रेल, रेलवे का इलेक्ट्रिफिकेशन, स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट, चार्जिंग स्टेशन और डेटा नेटवर्क। इन सभी में केबल, ट्रांसफॉर्मर और इलेक्ट्रिकल इक्विपमेंट की जरूरत होती है, जिनका आधार कॉपर है। इसके साथ ही AI और डिजिटल इकोनॉमी के विस्तार ने डेटा सेंटर्स की मांग बढ़ा दी है, जहां हाई-पावर सर्वर और कूलिंग सिस्टम के लिए भारी मात्रा में कॉपर का उपयोग होता है। इस तरह कॉपर अब सिर्फ ग्रीन ट्रांजिशन नहीं, बल्कि डिजिटल ट्रांजिशन का भी आधार बन गया है।
मांग बढ़ती ही जा रही
समस्या यह नहीं है कि कॉपर की मांग बढ़ रही है, बल्कि यह है कि उसकी सप्लाई उस रफ्तार से बढ़ ही नहीं सकती, जिस रफ्तार से मांग में तेजी आ रही है। तेल की तुलना में कॉपर की सप्लाई कहीं ज्यादा मुश्किल और जटिल है। एक नई कॉपर खदान को खोज से लेकर उत्पादन तक पहुंचने में दस से पंद्रह साल लग जाते हैं। पर्यावरणीय मंजूरी, स्थानीय समुदायों का विरोध, भारी पूंजी निवेश और गिरती अयस्क गुणवत्ता इस प्रक्रिया को और कठिन बना देती है। ऊपर से, पिछले एक दशक में माइनिंग सेक्टर में निवेश अपेक्षाकृत कमजोर रहा है, क्योंकि ESG दबाव और अनिश्चित रिटर्न ने निवेशकों को सतर्क बना दिया है।
ग्रीन प्रोजेक्ट होंगे महंगे
यही कारण है कि कॉपर की कमी अब सिर्फ कीमतों का सवाल नहीं रह गई है। अगर कॉपर महंगा होता है या उसकी उपलब्धता सीमित होती है, तो ग्रीन एनर्जी प्रोजेक्ट महंगे होंगे, EV सस्ते नहीं हो पाएंगे और इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएं धीमी पड़ेंगी। इसका सीधा असर महंगाई पर पड़ेगा, क्योंकि बिजली, आवास और परिवहन की लागत बढ़ेगी। यह एक ऐसी 'ग्रीन इंफ्लेशन' होगी, जो सेंट्रल बैंकों के लिए भी नई चुनौती खड़ी कर सकती है।
इतिहास गवाह है कि जब तेल महंगा हुआ, तो दुनिया हिल गई। 1970 के दशक के ऑयल शॉक्स ने वैश्विक मंदी और राजनीतिक उथल-पुथल को जन्म दिया। आज कॉपर उसी रास्ते पर है, फर्क सिर्फ इतना है कि यह संकट शोर नहीं मचाता। यह धीरे-धीरे, चुपचाप पूरे इकोनॉमिक सिस्टम में तनाव पैदा करता है। जिन देशों के पास कॉपर रिसोर्स हैं, उनका रणनीतिक महत्व बढ़ रहा है, और रिसोर्स नेशनलिज़्म का खतरा भी गहराता जा रहा है।
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भारत के लिए क्या मायने?
भारत के लिए यह उभरता हुआ कॉपर संकट और भी ज्यादा संवेदनशील है, क्योंकि देश एक साथ कई मोर्चों पर तेजी से विस्तार कर रहा है। एक तरफ भारत दुनिया का सबसे तेज़ी से बढ़ता बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता है, तो दूसरी तरफ वह रिन्यूएबल एनर्जी, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और इंफ्रास्ट्रक्चर विस्तार को अपनी विकास रणनीति का केंद्र बना चुका है। रेलवे के शत-प्रतिशत विद्युतीकरण का लक्ष्य, सोलर और विंड कैपेसिटी में तेजी से वृद्धि, मेट्रो नेटवर्क का विस्तार और EV अपनाने की नीति, इन सभी इनीशिएटिव का एक साझा आधार है- कॉपर।
समस्या यह है कि भारत अपनी कॉपर जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है। घरेलू खनन सीमित है और स्मेल्टिंग व रिफाइनिंग क्षमता भी मांग के अनुरूप नहीं बढ़ पाई है। ऐसे में वैश्विक कॉपर कीमतों में तेज़ बढ़ोतरी भारत के लिए दोहरी मार साबित हो सकती है। एक तरफ आयात बिल बढ़ेगा, दूसरी तरफ बिजली, हाउसिंग और ट्रांसपोर्ट जैसे क्षेत्रों में लागत बढ़ने से घरेलू महंगाई पर दबाव आएगा। यह कुछ वैसा ही है जैसा कभी कच्चे तेल की कीमतों में उछाल के दौरान भारत ने झेली थी।
कई प्रोजेक्ट्स पर असर
भारत की ग्रीन ट्रांजिशन रणनीति भी इस संदर्भ में एक नई चुनौती का सामना कर रही है। सोलर पार्क, ग्रीन हाइड्रोजन प्रोजेक्ट, बैटरी स्टोरेज और EV चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, यह सारे के सारे कॉपर-इंटेंसिव यानी कि भारी मात्रा में कॉपर के प्रयोग वाले हैं। यदि कॉपर महंगा होता है या सप्लाई बाधित होती है, तो इन परियोजनाओं की लागत बढ़ेगी और उनकी समयसीमा खिसक सकती है। इससे भारत के नेट-ज़ीरो और ऊर्जा सुरक्षा लक्ष्यों पर भी असर पड़ सकता है, क्योंकि स्वच्छ ऊर्जा को सस्ता और सुलभ बनाना ही इन नीतियों का मूल उद्देश्य है।
हालांकि, इस संकट में भारत के लिए एक रणनीतिक अवसर भी छिपा हुआ है। यदि भारत समय रहते कॉपर और अन्य क्रिटिकल मिनरल्स को अपनी औद्योगिक और व्यापार नीति का हिस्सा बनाता है, तो वह सप्लाई रिस्क को कम कर सकता है। शहरी खनन यानी रीसाइक्लिंग के जरिए पुराने केबल, इलेक्ट्रॉनिक वेस्ट और स्क्रैप से कॉपर निकालना, घरेलू उपलब्धता बढ़ाने का एक व्यवहारिक रास्ता हो सकता है। इसके अलावा, खनन नीति में सुधार, तेज़ मंजूरी प्रक्रिया और विदेशी निवेश को आकर्षित कर भारत इस क्षेत्र में अपनी क्षमता बढ़ा सकता है।
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बनेगा रणनीतिक हथियार
भविष्य में फ्री ट्रेड एग्रीमेंट्स और रणनीतिक साझेदारियों में भी कॉपर जैसे क्रिटिकल मिनरल्स की भूमिका बढ़ने वाली है। जैसे भारत ऊर्जा सुरक्षा के लिए तेल आपूर्ति स्रोतों में विविधता लाने की कोशिश करता रहा है, वैसे ही अब कॉपर और अन्य खनिजों के लिए भी दीर्घकालिक आपूर्ति समझौते जरूरी हो सकते हैं। यह बदलाव भारत की आर्थिक कूटनीति को भी नए सिरे से परिभाषित करेगा।
