इजरायल और लेबनान के बीच हालिया सीजफायर को अगर सतही तौर पर देखा जाए, तो यह शांति की दिशा में एक सकारात्मक कदम लगता है लेकिन जब इस समझौते के भीतर झांका जाए, तो तस्वीर कहीं ज्यादा जटिल और रणनीतिक दिखाई देती है। खासतौर पर इजरायल का यह रुख कि वह दक्षिण लेबनान से तुरंत पूरी तरह पीछे नहीं हटेगा, इस बात की ओर संकेत करता है कि यह सीजफायर सिर्फ युद्ध विराम नहीं, बल्कि 'बफर जोन पॉलिटिक्स' की शुरुआत भी हो सकता है। यही वह बिंदु है, जहां इतिहास बेहद प्रासंगिक हो जाता है, क्योंकि इजरायल पहले भी इसी तरह की रणनीति अपना चुका है और उसके परिणाम मिले-जुले ही नहीं, बल्कि कई मामलों में उल्टे भी रहे हैं।

 

मौजूदा परिदृश्य में इजरायल की सबसे बड़ी चिंता हिजबुल्लाह है, जो लेबनान के भीतर एक शक्तिशाली सैन्य और राजनीतिक ताकत बन चुका है। इजरायल का तर्क है कि जब तक हिजबुल्लाह की सैन्य क्षमताएं बरकरार हैं, तब तक उसकी उत्तरी सीमा सुरक्षित नहीं हो सकती। इसलिए सीमा के पार कुछ किलोमीटर अंदर तक एक 'बफर जोन' बनाना आवश्यक है, ताकि संभावित हमलों को पहले ही रोका जा सके। यह तर्क नया नहीं है; बल्कि यही लॉजिक अतीत में भी इस्तेमाल किया गया था, जब साउथ लेबनान सिक्युरिटी जोन की स्थापना हुई थी।

 

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लेबनान पर किया था नियंत्रण

उस दौर में इजरायल ने दक्षिण लेबनान के एक बड़े हिस्से पर नियंत्रण स्थापित कर लिया था और इसे 'सिक्युरिटी जोन' का नाम दिया गया था। शुरुआत में इसे एक अस्थायी उपाय बताया गया था, जिसका उद्देश्य सीमावर्ती इलाकों को सुरक्षित करना था। लेकिन धीरे-धीरे यह व्यवस्था 15 वर्षों तक चलने वाले सैन्य कब्जे में बदल गई। इस दौरान स्थानीय आबादी में असंतोष बढ़ता गया और हिजबुल्लाह ने इसी असंतोष को अपने समर्थन आधार को मजबूत करने के लिए इस्तेमाल किया। नतीजा यह हुआ कि जो बफर जोन सुरक्षा के लिए बनाया गया था, वही संघर्ष और हिंसा का केंद्र बन गया। अंततः 2000 में इजरायल को अंतरराष्ट्रीय दबाव और लगातार हमलों के चलते पीछे हटना पड़ा।

कई समानताएं हैं

अगर हम आज के सीजफायर को इस ऐतिहासिक अनुभव के साथ जोड़कर देखें, तो कई समानताएं सामने आती हैं। एक ओर इजरायल शांति की बात कर रहा है, लेकिन दूसरी ओर वह अपनी सैन्य मौजूदगी को पूरी तरह खत्म करने को तैयार नहीं है। यह संकेत देता है कि 'अस्थायी तैनाती' (temporary deployment) धीरे-धीरे एक स्थायी सिक्युरिटी की व्यवस्था में बदल सकता है। यही वह पैटर्न है, जो पहले भी देखने को मिला था जहां सीमित सैन्य कार्रवाई धीरे-धीरे लंबे हस्तक्षेप में बदल गई, जैसा कि 1982 लेबनान युद्ध के दौरान हुआ था।

शुरू किया था ऑपरेशन

1982 के युद्ध के समय इजरायल ने शुरुआत में एक सीमित ऑपरेशन शुरू किया था, जिसका उद्देश्य फिलिस्तीनी संगठन PLO को हटाना था लेकिन यह ऑपरेशन जल्द ही एक बड़े सैन्य अभियान में बदल गया, और इजरायल लंबे समय तक लेबनान में बना रहा। इस अनुभव ने यह दिखाया कि जब किसी संघर्ष में बफर जोन या सीमावर्ती नियंत्रण की रणनीति अपनाई जाती है, तो उसकी अवधि और दायरा अक्सर अपेक्षा से कहीं ज्यादा बढ़ जाता है। यही जोखिम आज भी मौजूद है, जहां सीजफायर के बावजूद इजरायल अपनी स्थिति मजबूत बनाए रखना चाहता है।

 

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हिजबुल्लाह की भूमिका

मौजूदा स्थिति को और जटिल बनाता है हिजबुल्लाह का रोल, जो इस सीजफायर का औपचारिक हिस्सा नहीं है। यह एक बड़ा लूपहोल है, क्योंकि इतिहास बताता है कि बिना मुख्य लड़ाकू पक्ष की सहमति के कोई भी बफर जोन स्थायी नहीं हो सकता। 2006 लेबनान युद्ध के बाद भी एक तरह का बफर मॉडल लागू करने की कोशिश की गई थी, जब दक्षिण लेबनान में अंतरराष्ट्रीय बलों की तैनाती के जरिए हिजबुल्लाह को सीमा से दूर रखने का प्रयास हुआ। लेकिन यह व्यवस्था पूरी तरह सफल नहीं हो सकी, क्योंकि हिजबुल्लाह का असैन्यीकरण कभी नहीं हो पाया। इससे यह स्पष्ट हुआ कि सिर्फ सैन्य उपस्थिति से स्थायी शांति नहीं लाई जा सकती।

 

दरअसल, बफर जोन की सबसे बड़ी समस्या यही है कि यह एक सैन्य समाधान है, जबकि समस्या मूलतः राजनीतिक और सामाजिक होती है। जब किसी क्षेत्र में बाहरी सैन्य मौजूदगी बढ़ती है, तो स्थानीय आबादी इसे कब्जे के रूप में देखने लगती है। इससे असंतोष और प्रतिरोध बढ़ता है, जो मिलिटेंट संगठनों के लिए नए समर्थन का आधार बन जाता है। यही कारण है कि 1985–2000 के सिक्युरिटी जोन के दौरान हिजबुल्लाह और मजबूत होकर उभरा। यानी जिस रणनीति को सुरक्षा के लिए अपनाया गया था, उसने अंततः असुरक्षा को और बढ़ा दिया।

हिजबुल्लाह की बढ़ गई है ताकत

आज के परिदृश्य में यह जोखिम और भी बड़ा है, क्योंकि मिडिल ईस्ट की जियो पॉलिटिक्स पहले से ज्यादा जटिल हो चुकी है। हिजबुल्लाह अब सिर्फ एक स्थानीय मिलिटेंट संगठन नहीं, बल्कि एक क्षेत्रीय शक्ति का हिस्सा बन चुका है, जिसे ईरान का समर्थन प्राप्त है। ऐसे में अगर इजरायल दक्षिण लेबनान में बफर जोन बनाता है, तो यह केवल दो देशों के बीच का मुद्दा नहीं रहेगा, बल्कि एक व्यापक क्षेत्रीय टकराव का हिस्सा बन सकता है। यह स्थिति सीजफायर को और ज्यादा नाजुक बना देती है।

 

इसके अलावा, यह मुद्दा लेबनान की संप्रभुता पर भी गंभीर सवाल खड़ा करता है। अगर किसी देश की जमीन पर दूसरे देश की सेना लंबे समय तक मौजूद रहती है, तो यह उस देश की राजनीतिक और सैन्य कमजोरी को दर्शाता है। लेबनान पहले से ही आर्थिक संकट और राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहा है, और ऐसे में वह इजरायल की इस रणनीति का प्रभावी विरोध करने की स्थिति में नहीं है। इससे एक खतरनाक उदाहरण बन सकता है, जहां कमजोर राज्यों की जमीन पर 'सुरक्षा' के नाम पर बाहरी शक्तियां स्थायी रूप से पैर जमा लेती हैं।

लॉन्ग टर्म गारंटी नहीं

इस पूरे परिदृश्य में अंतरराष्ट्रीय समुदाय की भूमिका भी अहम है। भले ही सीजफायर को एक कूटनीतिक सफलता के रूप में पेश किया जा रहा हो, लेकिन अगर जमीनी हकीकत में बफर जोन बनता है और उसे मूक सहमति मिल जाती है, तो यह अंतरराष्ट्रीय कानून और संप्रभुता के सिद्धांतों को कमजोर कर सकता है। खासकर तब, जब इसे 'सेल्फ-डिफेंस' के नाम पर सही ठहराया जाए।

 

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अंततः, इतिहास का अनुभव एक स्पष्ट चेतावनी देता है। बफर जोन शॉर्ट-टर्म सिक्युरिटी का एक प्रभावी उपाय हो सकता है, लेकिन यह लॉन्ग-टर्म स्टेबिलिटी की गारंटी नहीं देता। अगर इसके साथ राजनीतिक समाधान, कूटनीतिक प्रयास और सभी पक्षों की सहमति नहीं जुड़ी हो, तो यह रणनीति अक्सर उल्टा असर करती है।

 

आज का सीजफायर इसी चौराहे पर खड़ा है एक ओर यह शांति की संभावना को जन्म देता है, तो दूसरी ओर यह उसी पुराने चक्र की ओर भी इशारा करता है, जहां 'अस्थायी सुरक्षा' धीरे-धीरे 'स्थायी संघर्ष' में बदल जाती है।