साल 1971, बैटल ऑफ बसंतर के टैंक वॉर में सेकेण्ड लेफ्टिनेन्ट अरुण खेत्रपाल जब घायल हुए तो उनसे पीछे हटने को कहा गया लेकिन खेत्रपाल ने इस आदेश को मानने से इनकार कर दिया और लड़ते रहे लेकिन यह कहानी अरुण खेत्रपाल की नहीं है। उनके साथ उसी लड़ाई में उनका साथ दे रहे मेजर होशियार सिंह दहिया की कहानी भी उसी बहादुरी और लीडरशीप से भरी है। जो घायल होने के बाद भी वॉर जोन में सिर्फ टिके नहीं रहे बल्कि एक सच्चे लीडर की तरह अपने साथियों का मनोबल भी बनाए रखा। अपने गनर के शहीद होने के बाद उन्होंने खुद ही मशीनगन संभाल ली थी।

 

यह कहानी 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के हीरो मेजर होशियार सिंह की है,  जो उन इंडियन ऑफिसर्स की लिस्ट में शामिल हुए जिनको जीते जी परमवीर चक्र का सम्मान दिया गया। 

 

वॉरजोन में जब जीवन और मौत के बीच सिर्फ एक धागे भर का अंतर रह जाता है, तब फैसला सैनिक के अपने हाथों में होता है। मोमेंट ऑफ ट्रूथ। अब जान दी जाएगी या ली जाएगी। मेजर होशियार सिंह ने दूसरा विकल्प चुना। गोलियों और तोपों की आवाज के बीच जब वह घायल हो गए, तब भी उन्होंने मैदान नहीं छोड़ा और एक सच्चे लीडर की तरह अपने साथियों का मनोबल बनाए रखा। इसी का परिणाम था कि 16 दिसंबर 1971 को ढाका में पाकिस्तान ने आत्मसमर्पण किया और हमारे पड़ोस में एक नए मुल्क बांग्लादेश का जन्म हुआ।

 

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इसी युद्ध पर बेस्ड एक नई फिल्म आ रही है- बॉर्डर 2। इसमें सनी देओल, वरुण धवन और दिलजीत दोसांझ जैसे स्टार हैं। बॉर्डर 2 1997 में आई बॉर्डर का सीक्वल है। बॉर्डर बैटल ऑफ लोंगेवाला पर आधारित थी। बॉर्डर 2 में वरुण धवन ने 3 ग्रेनेडियर्स के मेजर होशियार सिंह दहिया का किरदार निभाया है। मेजर होशियार सिंह का नाम सुनकर लोग अक्सर उनको उनके हमनाम ब्रिगेडियर होशियार सिंह समझ लेते हैं। ब्रिगेडियर होशियार सिंह 1962 में भारत-चीन के बीच हुए युद्ध में लड़ते हुए शहीद हो गए थे जबकि मेजर होशियार सिंह दहिया 1971 वॉर में घायल हो गए थे और जिंदा वापस लौटे थे लेकिन उनकी कहानी सिर्फ 1971 के युद्ध तक ही सीमित नहीं है बल्कि वह 1965 इंडो-पाक वॉर में भी शामिल हुए थे।

 

इतिहास और भूगोल बदलने की लड़ाई

 

हरियाणा के सोनीपत जिले का सिसाना गांव। 5 मई 1937 को होशियार सिंह का जन्म एक जाट परिवार में हुआ। गांव के 250 से ज्यादा लोग सेना में जा चुके थे इसलिए पिता चौधरी हीरा सिंह भी चाहते थे कि उनका बेटा इंडियन आर्मी में जाए। परिवार की जीविका खेतीबाड़ी पर टिकी थी। शुरुआत में होशियार सिंह भी मदद के लिए खेतों में काम किया करते थे। गांव के स्कूल से बेसिक एजुकेशन पूरी करने के बाद वह जाट हायर सेकेंडरी स्कूल पहुंचे और फिर जाट कॉलेज, रोहतक। पढ़ाई में खूब तेज थे और साथ ही खेल में भी। वॉलीबॉल शानदार खेलते थे इसलिए जल्द ही पंजाब टीम के कप्तान बन गए। इसी कारण उन्हें नेशनल टीम में भी जगह मिली थी।

 

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1957 में उन्होंने 2 जाट रेजीमेंट को एक सैनिक के तौर पर ज्वॉइन किया। छह साल बाद एग्जाम ऑफ प्रमोशन के जरिए वह अधिकारी बनें और 30 जून 1963 को उन्हें ग्रेनेडियर्स रेजिमेंट में कमीशन मिला। यह रेजीमेंट कभी बॉम्बे प्रेसीडेंसी और ब्रिटिश इंडियन आर्मी का हिस्सा रही। आज के समय में यह भारत की सबसे ज्यादा सम्मानित रेजीमेंट्स में से एक है। जिसको तीन परमवीर चक्र प्राप्त हुए हैं। हवलदार अब्दुल हामिद को 1965 की लड़ाई के लिए, मेजर होशियार सिंह को 1971 वॉर के लिए और मेजर योगेंद्र सिंह यादव को 1999 के कारगिल युद्ध के लिए यह सम्मान मिला।

 

 

मेजर होशियार सिंह को शुरुआत में नॉर्थ ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी (NEFA) में तैनाती मिली। इसी समय उनके लीडरशिप की ओर सबका ध्यान गया लेकिन असली मौका तब आया जब उन्होंने 1965 के इंडो-पाक वॉर में हिस्सा लिया। बीकानेर सेक्टर में उनकी बहादुरी के लिए उनको मेंशन-इन-डिस्पैचेज से सम्मानित किया गया लेकिन छह साल बाद वह एक ऐसे युद्ध में शामिल हुए जिसने पाकिस्तान का इतिहास और भूगोल बदलकर रख दिया। जाहिर है 1971 के भारत पाकिस्तान युद्ध की बात हो रही है। जिसे बांग्लादेश लिबरेशन वॉर भी कहा जाता है।

  

3 दिसंबर 1971 को पाकिस्तान ने भारत के अमृतसर, पठानकोट, श्रीनगर, अवंतीपुर, उत्तरलाई, जोधपुर, अंबाला और आगरा के हवाई अड्डों पर बमबारी की। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश को संबोधित किया और कहा कि पाकिस्तान ने हम पर हमला किया है। भारतीय सेना इस हमले के लिए पहले से तैयार थी। लिहाजा उनको मुंहतोड़ जवाब दिया जा रहा था।

कई मोर्चों पर थी लड़ाई 

 

1971 इंडो-पाकिस्तान वॉर ईस्टर्न फ्रंट के साथ-साथ वेस्टर्न फ्रंट पर भी लड़ा जा रहा था। शकरगढ़ सेक्टर, पाकिस्तान की सीमा का एक 30 किलोमीटर लंबा क्षेत्र था। जो छुरी के आकार का था। यह भारतीय क्षेत्र की ओर निकलता था और इसके बीच से बसंतर नदी बह रही थी। यह इलाका पाकिस्तान के सियालकोट के बड़े मिलिट्री बेस के पास था। जहां से पठानकोट स्थित इंडियन बेस पर हमला करना आसान था। अगर ऐसा होता तो जम्मू-कश्मीर के कई अहम इलाकों से भारत का संपर्क टूट सकता था। इसलिए भारत का इस पर कब्जा करना जरूरी था क्योंकि इससे जम्मू-कश्मीर और उत्तरी पंजाब पर मंडराता खतरा समाप्त हो जाता। 

 

पाकिस्तानी सेना ने इलाके में बारूदी सुरंगें बनाई थीं। 47 इंडियन इन्फैंट्री ब्रिगेड को, बसंतर नदी के पार एक ब्रिजहेड (Bridge-head) बनाने का आदेश दिया गया। ब्रिजहेड का मतलब है दुश्मन के इलाके में घुसने का रास्ता सिक्योर कर लेना। आमतौर पर जब  सेना किसी नदी या झील जैसी पानी की बाधा को पार करने की कोशिश करती है तो पानी के उस पार दुश्मन के क्षेत्र में एक छोटे, सुरक्षित क्षेत्र पर कब्जा कर लिया जाता है, ताकि सेना उसी रास्ते से होकर आगे बढ़े और हमला करे।

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47th ब्रिगेड ने तेजी से अपना काम किया और 15 दिसंबर 1971 की रात को 9 बजे तक ब्रिजहेड तैयार कर लिया गया। इसके आगे दुश्मन का वह इलाका था, जहां बारूदी सुरंगें थीं। अब यह ब्रिगेड के इंजीनियर्स का काम था कि वे माइनफील्ड्स को सिक्योर करें ताकि 17 पूना हॉर्स के टैंक आगे बढ़ सकें। इंजीनियर्स अपना काम कर रहे थे। उन्होंने करीब आधा इलाका सिक्योर लिया था लेकिन तभी पाकिस्तानी तोपों की आहट मिली। ब्रिजहेड पर तैनात भारतीय जवानों ने मैसेज पास किया और तत्काल भारतीय टैंकों से सहायता मांगी गई। यह बसंतर के टैंक युद्ध की शुरूआत थी।

 

तारीख 16 दिसंबर। सुबह करीब 8 बजे। पूना हॉर्स की दो टैंक टुकड़ियों को पाकिस्तान के जारपाल क्षेत्र की ओर बढ़ने का आदेश दिया गया। इनमें से एक टुकड़ी को लीड कर रहे थे- सेकेंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल। जिन पर हाल ही में इक्कीस नाम की फिल्म आई है। भारतीय सैनिक जब जारपाल की ओर बढ़ रहे थे तब दूसरी तरफ पाकिस्तानी सेना भी टैंकों के साथ तैयार थी। उसने एक आर्मर्ड रेजीमेंट के साथ धुंध की आड़ में पूरी ताकत से हमला किया। भारतीय सैनिक संख्या में कम थे और उनके पास टैंकों की संख्या भी कम थी, इसलिए बी स्क्वाड्रन के कमांडर ने तुरंत रीइन्फोर्समेंट की मांग की। जब वह बसंतर नदी पार कर रहे थे, तब वहां कुछ पाकिस्तानी टैंक और रीकॉइल गन पोस्ट ऐक्टिव थे। रीकॉइल गन पोस्ट का मतलब है- दुश्मन की एक मजबूत फायरिंग पोजिशन, जहां एंटी-टैंक गन्स या भारी तोपें छिपाकर या कवर के पीछे लगाई जाती हैं।

मेजर होशियार सिंह दहिया

 

अरुण की टुकड़ी ने रीइंफोर्समेंट का जवाब दिया और दुश्मन से सीधे मुकाबले के लिए आगे बढ़ने का फैसला लिया लेकिन ब्रिजहेड जोन के पास, छिपे हुए पाकिस्तानी टैंक और रीकॉइल गन पोस्ट से भारतीय टैंकों पर भारी हमला हुआ। अरुण के साथ खड़ा था- 3 ग्रेनेडियर्स जिसकी कमान संभाल रहे थे- मेजर होशियार सिंह दहिया। 16 दिसंबर को अरुण खेत्रपाल शहीद हो गए। 17 दिसंबर की सुबह तक पाकिस्तानी सेना की ओर से छह हमले हुए थे। छठा हमला सुबह के 6 बजे हुआ- 3 ग्रेनेडियर्स पर। 3 ग्रेनेडियर्स का टारगेट था- लोहल और जरपाल को अपने कंट्रोल में लेना। यह एक अलग किस्म का संयोग था। यह दूसरा मौका था जब पूना हॉर्स और 3 ग्रेनेडियर्स एक साथ लड़ रहे थे।
 
मेजर होशियार सिंह ने 1997 में दिए एक पुराने इंटरव्यू में इस युद्ध की पूरी कहानी सुनाई थी। उन्होंने बताया था कि इस लड़ाई में कई पाकिस्तानी टैंक नष्ट हुए और उनके बहुत-से सैनिक मारे गए। उन्हें जरपाल गांव पर कब्ज़ा करने का आदेश मिला था, जिस पर पाकिस्तानी सेना का कब्ज़ा था। इस इलाके के चारों ओर बारूदी सुरंगें बिछी हुई थीं और वहां टैंक और गोला-बारूद भी तैनात था। मेजर होशियार ने बताया था कि 15 दिसंबर की रात को करीब 10 बजे उन्हें नदी पार कर गांव पर कब्ज़ा करने का आदेश मिला था। उनकी टुकड़ी ने रात 12 बजे तक नदी पार कर ली और फिर गांव पर कब्ज़ा भी कर लिया। भारतीय सैनिकों को यह पता था कि इसके बाद पाकिस्तान चुप नहीं बैठेगा। वह इस इलाके पर वापस कब्जा करने के लिए पूरी ताकत झोंक देगा।
 
रात 12 बजे तक गांव पर कब्जा हो गया लेकिन एक चुनौती यह थी कि सुबह होने तक नदी पर पुल भी बनाना था, ताकि भारतीय टैंक आगे बढ़ सकें और इसी बीच बारूदी सुरंगें भी हटानी थीं। होशियार सिंह के जरपाल पर कब्जा करते ही पाकिस्तानी सेना ने उनको चारों तरफ से घेर लिया और हमला शुरू कर दिया। 16 दिसंबर की दोपहर 12 बजे पाकिस्तान ने अपने कई टैंकों के साथ हमला हुआ। इसके बाद शाम 4 बजे एक और टैंक हमला हुआ।

 

मेजर होशियार सिंह ने बताया कि लगातार तीन टैंक हमले हुए और उन्होंने 40 से 45 पाकिस्तानी टैंक नष्ट कर दिए। 16 और 17 दिसंबर को पाकिस्तान ने और ज़्यादा फौज भेजी और दो दिशाओं से हमला किया। एक तरफ़ से टैंक और दूसरी तरफ से पैदल सेना लेकिन इसमें भी उन्हीं को नुकसान हुआ। होशियार सिंह के अनुसार, इस लड़ाई में 300–350 पाकिस्तानी सैनिक मारे गए। कई पाकिस्तानी टैंक भी तबाह हो गए। उन्होंने बताया कि उन्होंने 97 पाकिस्तानी सैनिकों के शव इकट्ठा किए, जिन्हें बाद में उनकी सेना को सौंप दिया गया।
 
17 दिसंबर को 3 ग्रेनेडियर्स जब दुश्मनों के हमलों को नाकाम कर रही थी। तब मेजर होशियार सिंह घायल हो चुके थे। इसके बावजूद वह एक खाई से दूसरी खाई तक जा रहे थे और अपने सैनिकों का मनोबल बढ़ा रहे थे। जब उनके गनर शहीद हो गए तो उन्होंने खुद ही मशीनगन संभाल ली और दुश्मन सेना पर हमले शुरू कर दिए। उनको ऐसा करते देख उनकी कंपनी के दूसरे सैनिक भी जोश से भर गए और उन्होंने दुश्मन पर जबरदस्त हमला किया और उनकी बटालियन को पूरी तरह तहस-नहस कर दिया। उस दिन पाकिस्तान सेना के 89 सैनिक मारे गए, जिनमें उनके कमांडिंग ऑफिसर लेफ्टिनेंट कर्नल मोहम्मद अकरम राजा और उनके तीन अधिकारी भी शामिल थे। इसके बाद भी युद्ध जारी रहा। बचे हुए पाकिस्तानी सैनिकों और ग्रेनेडियर्स के बीच गोलीबारी चलती रही। 

कैसे हुआ सीजफायर?

 

शाम के 6 बजे सैनिकों को जानकारी मिली कि रात के 8 बजे से सीजफायर लागू होगा। इसके बाद दोनों ओर के सैनिकों ने अंतिम बार पूरी ताकत से एक-दूसरे पर हमला किया। मेजर होशियार सिंह ने अपने पुराने इंटरव्यू में बताया था कि 18 दिसंबर को एक पाकिस्तानी ब्रिगेड कमांडर सफेद झंडा लहराते हुए आया। उसने अपने सैनिकों के शव मांगे और कहा कि वे अब पीछे हट रहे हैं। तब तक दोनों देशों की सरकारों ने सीज़फायर का एलान कर दिया था। लेफ्टिनेंट कर्नल मोहम्मद अकरम रजा का पार्थिव शरीर और उनके साथ मारे गए पाकिस्तानी सैनिकों के शव पाकिस्तानी ब्रिगेड कमांडर ब्रिगेडियर शाह बाज खान को सौंप दिए गए।

 

यहां युद्ध की एक और अनूठी और दुर्लभ घटना घटी। युद्ध के बाद जरपाल गांव में  पाकिस्तान के लेफ्टिनेंट कर्नल अकरम रजा का शव मिला। उनकी बाहें अकड़ गई थीं और वह उसी स्थिति में थीं जिसमें उन्होंने अपनी स्टेन गन पकड़ी हुई थी। ग्रेनेडियर्स की एक बटालियन के कमांडिंग ऑफिसर कर्नल वेद एरी की बेटी रितु ए। पंडित ने साल 2021 में द प्रिंट से बात करते हुए बताया कि 18 दिसंबर को जब कर्नल अकरम राजा का शव लौटाया गया तो उनके ताबूत के भीतर एक चिट्ठी रखी। जिसका टाइटल था- 'एक सैनिक को श्रद्धांजलि'। इसमें लिखा था कि अकरम रजा ने एक सच्चे सैनिक की तरह मौत को गले लगाया। हम उन्हें सलाम करते हैं। बाद में इसी चिट्ठी के आधार पर पाकिस्तान के लेफ्टिनेंट कर्नल अकरम रजा को हिलाल-ए-जुर्रत दिया गया जो पाकिस्तान का दूसरा सबसे बड़ा सैन्य वीरता पुरस्कार है।

 

सीज़फायर के बाद भारतीय ब्रिगेड कमांडर जब मौके पर पहुंचे तो होशियार सिंह घायल अवस्था में थे। उनकी बहादुरी के लिए उनको परमवीर चक्र दिया गया। मेजर होशियार सिंह 1988 में भारतीय सेना से रिटायर हुए। 1998 में जब वह 61 साल के थे, दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया।
 
1971 का युद्ध सिर्फ हथियारों की लड़ाई नहीं थी, बल्कि ये बहादुरी और लीडरशीप की भी परीक्षा थी। बैटल ऑफ बसंतर में मेजर होशियार सिंह दहिया ने यह साबित कर दिया कि सच्चा सैनिक हालात से नहीं चलता, बल्कि उसे सिर्फ अपना देश और अपना कर्तव्य दिखता है। घायल होने के बावजूद मोर्चा न छोड़ना और खुद मशीनगन संभाल लेना भारतीय सेना की परंपरा का प्रतीक है। परमवीर चक्र उनके शौर्य की औपचारिक पहचान है लेकिन उनकी असली विरासत वह साहस है जो हर पीढ़ी के सैनिकों को प्रेरित करता रहेगा।