संजय सिंह, पटना: बिहार में विधानसभा चुनाव के टिकट बंटवारे से कांग्रेस के भीतर शुरू हुई गुटबाजी चुनाव नतीजे आने के बाद भी खत्म नहीं हुई है। गुटबाजी की वजह से ही कांग्रेस की करारी हार हुई। कांग्रेस 19 सीटों के बजाय 6 सीटों पर आकर सिमट गई। कांग्रेस के कुछ शीर्ष नेता वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम को पसंद नहीं करते हैं। उन्हें सभी विधायकों का समर्थन भी प्राप्त नहीं है। परिणामस्वरूप उनके द्वारा जो भी कार्यक्रम या निर्देश दिया जाता है, उसका पालन ना तो कार्यकर्ता करते हैं और ना ही विधायक। यही हाल कांग्रेस के बिहार प्रभारी कृष्णा अल्लावरू का है।
बिहार विधानसभा का बजट सत्र फरवरी में शुरू होना है। इसके लिए विधान परिषद सर्वदलीय दल की बैठक 29 जनवरी को आयोजित की गई है लेकिन अब तक कांग्रेस ने विधायक दल का नेता नहीं चुना है। इस रेस में सबसे आगे मनिहारी के विधायक मनोहर सिंह और चनपटिया के विधायक अभिषेक रंजन हैं। मनोहर सिंह पूर्व आईपीएस पदाधिकारी भी रहे हैं। वह लगातार तीसरी बार विधायक चुने गए हैं।
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अभिषेक रंजन का दावा मजबूत
वहीं, मनिहारी आदिवासियों के लिए सुरक्षित सीट है। पूरे प्रदेश में इस समुदाय की संख्या कम है। ऐसी स्थिति में पार्टी अभिषेक रंजन पर भी दांव लगा सकती है। अभिषेक रंजन के बारे में लगातार चर्चा होती रही है कि ये दूसरे दलों के संपर्क में हैं। उनका संबंध वाल्मीकि नगर के विधायक सुरेन्द्र प्रसाद से भी बेहतर है। पार्टी की यह कोशिश है कि अभिषेक रंजन को विधायक दल का नेता बनाकर पार्टी के भीतर टूट-फूट की संभावना को कम किया जा सकता है।
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संगठन में बदलाव की भी चर्चा
बीजेपी ने बिहार के विधायक रहे नितिन नवीन को बीजेपी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया है। उनके राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद एनडीए में और राजनीतिक सरगर्मी बढ़ी है। RJD ने भी 25 जनवरी को संगठन में बदलाव को लेकर राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक आयोजित की है। इस बैठक में तेजस्वी यादव राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बन सकते हैं। इसके साथ यह भी चर्चा है कि RJD मंगनीलाल मंडल की जगह किसी दूसरे व्यक्ति को प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी सौंप सकता है। अगर ऐसा हुआ तो कांग्रेस में भी अध्यक्ष बदलने का दबाव बढ़ सकता है। पार्टी का एक बड़ा खेमा प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम की बातों का ज्यादा अहमियत नहीं दे रहा है। उनके खिलाफ विरोधी गुट की ओर से लगातार आंदोलन भी चलाया जा रहा है।
