भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (CAG) की एक ऑडिट रिपोर्ट ने दिल्ली जल बोर्ड (DJB) द्वारा सप्लाई किए जाने वाले पीने के पानी की पोल खोल दी है। यह रिपोर्ट 7 जनवरी 2026 को दिल्ली विधानसभा में पेश की गई थी। रिपोर्ट में बताया गया कि पानी की जांच, शुद्धीकरण और निगरानी में बड़ी लापरवाही बरती गई। इससे राजधानी में लोगों के स्वास्थ्य पर बड़ा खतरा मंडरा रहा है। जन स्वास्थ्य अभियान इंडिया (JSAI) ने इस पर तुरंत कार्रवाई की मांग की है।
ऑडिट में सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि जांचे गए जमीन के पानी (ग्राउंडवाटर) के सैंपल में से ज्यादातर पीने लायक नहीं पाए गए। कुल 16,234 सैंपल में से 8,933 सैंपल यानी करीब 55 प्रतिशत असुरक्षित थे। अलग-अलग सालों में यह प्रतिशत 49 से लेकर 63 प्रतिशत तक रहा। CAG ने साफ चेतावनी दी है कि ऐसे असुरक्षित पानी की सप्लाई से लोगों को गंभीर स्वास्थ्य जोखिम हो सकता है।
यह भी पढ़ेंः ट्रंप के 'बोर्ड ऑफ पीस' में शामिल होंगे नेतन्याहू, बाकी देशों ने क्या कहा?
गुणवत्ता मॉनीटरिंग भी कमजोर
दिल्ली में पानी की रोजाना जरूरत करीब 1,680 मिलियन गैलन है, लेकिन करीब 25 प्रतिशत पानी की कमी रहती है। इससे भी ज्यादा परेशानी यह है कि सप्लाई होने वाले पानी की असली गुणवत्ता का पता ही नहीं चल पाता, क्योंकि जांच बहुत कम और गलत तरीके से होती है। DJB के लैब में स्टाफ और उपकरणों की भारी कमी है। BIS (भारतीय मानक ब्यूरो) के नियमों का पालन नहीं हो रहा।
ऑडिट में पता चला कि 80-90 मिलियन गैलन प्रति दिन बिना ट्रीट किया हुआ पानी बोरवेल और रैनी वेल से सीधे अंडरग्राउंड रिजर्वॉयर में या कई बार सीधे लोगों तक पहुंचा दिया जाता था। ऐसा 5 साल तक चलता रहा। विशेषज्ञ कहते हैं कि बिना शुद्ध किए पानी देने से पानी से होने वाली बीमारियां बहुत बढ़ सकती हैं।
फ्लो मीटर नहीं होने से निगरानी मुश्किल
रिपोर्ट में कहा गया है कि वाटर ट्रीटमेंट प्लांट, रिजर्वॉयर और बोरवेल पर फ्लो मीटर नहीं लगे हैं। इससे पानी की मात्रा और गुणवत्ता का सही हिसाब नहीं लग पाता। यह बीमारी रोकने के बुनियादी नियमों के खिलाफ है।
यह भी पढ़ें: गाजा में शांति लाने में मदद करेंगे PM मोदी? डोनाल्ड ट्रंप ने भेजा न्योता
जरूरी टेस्ट ही नहीं होते
DJB के लैब में पानी की जांच सिर्फ 12 पैरामीटर पर होती है, जबकि BIS के नियमों (IS 10500:2012) में 43 पैरामीटर अनिवार्य हैं। जहरीले पदार्थ, रेडियोएक्टिव तत्व, बैक्टीरिया, वायरस और आर्सेनिक, लेड जैसे भारी धातुओं की जांच नहीं होती। CAG ने चेताया कि ऐसे पदार्थ पानी में होने से किडनी खराब होना, एनीमिया और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियां हो सकती हैं। प्राइवेट वाटर ट्रीटमेंट प्लांट में बैन किए गए कैंसर पैदा करने वाले पॉलीइलेक्ट्रोलाइट्स का इस्तेमाल अभी भी हो रहा है, जबकि सरकार ने साफ मना किया था।
