पंजाब में दलितों की आबादी अन्य जातियों की तुलना में ज्यादा है। पंजाब में सिख धर्म को मानने वाले लोग सबसे ज्यादा हैं और दलित सिखों और हिंदुओं में दोनों बंटी है। दलित समुदाय की एक बड़ी आबादी पंजाब में अब रविदासिया धर्म को अपनाती है। साल 2009 में रविदासी सिखों ने अपना अलग धर्म बना लिया था। इस धर्म के बनने की कहानी भी बहुत रोचक है और आज भी रविदास समाज के लोग सिख और रविदासिया धर्म को अपनाते हैं। 

 

रविदासिया समाज के लोग चमड़े का काम करते थे जिन्हें चमार भी कहा जाता था। गुरु रविदास जी इसी समाज में पैदा हुए थे। गुरु रविदास जी ने जाति-पाति का विरोध किया और सब मनुष्यों को एक समान समझने का उपदेश दिया। वह एक ऐसे समाज की कल्पना करते थे, जहां ना दुख हो, ना टैक्य, ना जाति, ना डर और ना ही कोई भेदभाव हो। ऐसे समाज को वह 'बेगमपुरा' कहते थे।

 

यह भी पढ़ें: 23 सीटों पर BJP की नजर, पंजाब में अचानक चर्चा में क्यों आया डेरा सचखंड बल्लां?

सिख धर्म से कैसे जुड़े?

गुरु रविदास जी सिख गुरुओं से पहले हुए हैं और उनका अपना एक अलग दर्शन था। वे किसी पंथ की स्थापना का इरादा नहीं रखते थे लेकिन बाद में उन्हें सिख धर्म के साथ जोड़ लिया गया। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि उनके देहांत के बाद उनके शिष्यों ने उनके विचारों को आगे बढ़ाया। सिख गुरुओं ने गुरु रविदास के पद गुरु ग्रंथ साहिब में शामिल कर लिए।  गुरु अर्जन देव जी ने गुरु ग्रंथ साहिब में उनके 41 पद (भजन) शामिल कर उन्हें सर्वोच्च सम्मान दिया, जिससे वे सिख धर्म का अभिन्न अंग बन गए। 

सिखों के साथ रविदासिया समाज

सिख गुरुओं के विचारों से प्रभावित होकर दलितों ने सिख पंथ को अपना लिया। कई सिख खुद को रविदासी सिख भी कहते थे। रविदासी सिख भी अन्य सिखों की तरह गुरु ग्रंथ साहिब को मानते थे। इसके बाद संत पीपल दास ने डेरा सचखंड बल्लां की स्थापना की। डेरा सच्चा बल्लां का इतिहास बहुत पुराना है। इसकी स्थापन 1895 में की गई थी। संत पीपल दास के बेटे संत सरवन दास 1928 से 1972 तक डेरा के दूसरे प्रमुख रहे। उनके नेतृत्व में, वाराणसी के सीर गोवर्धनपुर में श्री गुरु रविदास जन्म स्थान मंदिर बनाया गया। इसी डेरा के पांचवे प्रमुख के रूप में संत निरंजन दास ने अगस्त 1994 में पदभार संभाला। दलित समुदाय खासकर रविदासिया समुदाय को जोड़ने में इस डेरे की अहम भूमिका रही है।

2009 का वियना कांड

डेरा सचखंड बल्लां 2009 तक दलितों खासकर रविदास समाज के लोगों के लिए एक प्रमुख संस्थान बन चुका था। डेरा सचखंड के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए दूसरे गुटों से उनकी कई बार झड़पें भी हुई लेकिन 2009 में कुछ ऐसा हुआ जिसने पंजाब ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया को सकते में डाल दिया। 24 मई 2009 को ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना में डेरा सचखंड बल्लां के प्रमुख संत निरंजन दास और संत रामानंद पर हमला हुआ। इस हमले में संत रामानंद की मौत हो गई थी। संत रामानंद जालंधर से प्रवचन के लिए वियना गए थे। सत्संग के दौरान ही कुछ हथियारबंद नौजवान गुरुद्वारे में घुस कर फायरिंग करने लगे। इस घटना में दर्जन भर से ज्यादा लोग घायल हो गए। इस घटना के बाद कई दिनों तक पंजाब सुलगता रहा। 

 

यह भी पढ़ें: कांग्रेस में गहराई जाति की लड़ाई, दलित या जट्ट सिख, आंकड़ों से समझिए कौन मजबूत?

2010 में बनाया अलग धर्म

इस घटना के बाद रविदास समाज ने सिख धर्म से अलग होने का फैसला कर लिया था। 2010 तक रविदास समुजाय गुरु ग्रंथ साहिब की पूजा करता आया था लेकिन इसके बाद रविदास समुदाय ने गुरु ग्रंथ साहिब की जगह अपना ग्रंथ बना लिया था। घोषणा की गई की यह सिर्फ रविदासिया समुदाय नहीं बल्कि रविदासिया धर्म होगा। 30 जनवरी 2010 को संत रविदास की जयंती के मौके पर वाराणसी में इस समुदाय के मुख्यालय डेरा सचखंड बल्लां ने घोषणा की कि आज से रविदास समुदाय सिख धर्म नहीं बल्कि रविदासिया धर्म का पालन करेगा। रविदासिया धर्म के लिए अलग ग्रंथ का सृजन किया गया है। इस ग्रंथ को 'अमृत बानी रविदास' कहा गया है। इस ग्रन्थ में संत रविदास समेत कबीर और दूसरे दलित भक्त संतों की बानी दर्ज है।

राजनीति का केंद्र

पंजाब में दलित आबादी राजनीतिक और सामाजिक लिहाज से बहुत बड़ी ताकत है। हर एक पार्टी के नेता आज भी डेरा सचखंड बल्लां जाते हैं। चुनाव के समय तो नेताओं की कतार इस डेरे में लग जाती है। अब 2027 चुनाव से पहले यह डेरा और समुदाय एक बार फिर चर्चा में है। सरकार ने  डेरा प्रमुख निरंजन दास को भारत के चौथे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्म श्री के लिए चुना गया है। इसके अलावा पीएम मोदी संत रविदास की जयंती पर 1 फरवरी 2026 को इस डेरे में पहुंचेंगे। पंजाब के दोआबा रीजन की 23 में से 19 सीटों पर इस डेरे का काफी प्रभाव है। हालांकि, डेरा खुद को राजनीति से अलग रखता है।