असम के श्रीभूमि जिले से एक बड़ी खबर सामने आई जहां पत्थरकांडी निर्वाचन क्षेत्र के आरक्षित वनों में 8 फरवरी(रविवार) को प्रशासन ने अवैध बस्तियों को हटाने के लिए एक विशाल ऑपरेशन शुरू किया। इस कार्यवाही का मुख्य उद्देश्य जंगल की लगभग 12,000 हेक्टेयर जमीन को फिर से कब्जे में लेना है, जो लंबे समय से अतिक्रमण की चपेट में थी। जिले के आला अधिकारी और वन विभाग की टीमें खुद इस पूरी प्रक्रिया की निगरानी कर रही थी।
इस अभियान की शुरुआत से पहले प्रशासन ने यहां रह रहे 2,000 से अधिक परिवारों को नोटिस जारी किया था। किसी भी अप्रिय स्थिति से निपटने के लिए मौके पर भारी संख्या में पुलिस और अर्धसैनिक बल तैनात किए गए थे। जिले के वरिष्ठ अधिकारी और वन विभाग की टीम खुद मौके पर मौजूद रहकर पूरी कार्यवाही की निगरानी कर रही है।
यह भी पढ़ें: मुस्लिम यूनिवर्सिटी के लिए मिली थी जमीन, अब कट रही अवैध कॉलोनी; जांच शुरू
हाथियों ने संभाला मोर्चा
हैरानी की बात यह है कि इस अभियान में सिर्फ मशीनों का ही नहीं बल्कि हाथियों का भी सहारा लिया जा रहा है। अधिकारियों ने बताया कि मधुबन, नारायणपुर और दोहलिया जैसे घने वन क्षेत्रों में, जहां उबड़-खाबड़ रास्तों के कारण जेसीबी या बुलडोजर नहीं पहुंच पा रहे, वहां हाथियों के जरिए अतिक्रमण हटाया जा रहा है। कुल 50 से अधिक भारी मशीनों के साथ-साथ हाथियों की यह टीम जंगल को उसके पुराने स्वरूप में लौटाने में जुटी है।
मशीनों की जगह हाथी क्यों?
असम में वन प्रबंधन और अतिक्रमण हटाने के लिए हाथियों का इस्तेमाल हमेशा से चर्चा और बहस का विषय रहा है। जहां एक तरफ विशेषज्ञ मानते हैं कि संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र में जेसीबी मशीनों से ज्यादा नुकसान होता है और हाथी 'ईको-फ्रेंडली' विकल्प हैं, वहीं पशु अधिकार कार्यकर्ता इसे क्रूरता बताते हैं।
वन्यजीव संरक्षण अधिनियम (1972)
हाथी इस अधिनियम की अनुसूची-I में शामिल हैं, जिसका अर्थ है कि उन्हें भारत में सर्वोच्च स्तर की सुरक्षा प्राप्त है। धारा 40 और 42 के तहत पालतू हाथियों के स्वामित्व के लिए मुख्य वन्यजीव वार्डन से सर्टिफिकेट लेना अनिवार्य है। हाथियों की व्यापारिक खरीद-बिक्री पूरी तरह प्रतिबंधित है। हालांकि 2022 में एक संशोधन किया गया था जिसके तहत विशेष परिस्थितियों या धार्मिक उद्देश्यों के लिए हाथियों के स्थानांतरण की सख्त निगरानी के साथ अनुमति है।
असम के विशिष्ट नियम
असम में हाथियों का उपयोग 'एलिफेंट ऑपरेशंस' जैसे गश्त या लकड़ी ढोने के लिए एक सदी पुराना तरीका है। असम सरकार 'कैप्टिव एलिफेंट मैनेजमेंट रूल्स' का पालन करती है, जिसमें स्पष्ट है कि काम के दौरान हाथी को सही भोजन, पानी और आराम मिलना चाहिए। साथ ही गर्भवती या बीमार हाथियों से काम कराना गैर-कानूनी है।
इस कानून के तहत इस बात का पूरा ध्यान रखा गया है कि तापमान और काम के घंटों की सीमा तय की गई हो। कानून के तहत जंगली हाथियों को पकड़ना प्रतिबंधित है लेकिन पालतू/बंदी हाथी का उपयोग विशिष्ट सरकारी कार्यों और पारंपरिक उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है।
यह भी पढ़ें: अफीम खाकर तोते हो रहे नशेड़ी, तारों पर लटककर करते हैं अजीब हरकतें
पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 (PCA Act) के तहत, यदि हाथियों को जेसीबी के विकल्प के रूप में इस्तेमाल करते समय उन पर अत्यधिक दबाव डाला जाता है या उन्हें घायल किया जाता है, तो यह इस कानून का उल्लंघन है।
पक्ष-विपक्ष के तर्क
हाथियों के उपयोग के पीछे कई तर्क दिए जाते हैं। कुछ लोगों का कहना है कि जेसीबी मिट्टी और वनस्पतियों को भारी नुकसान पहुंचाती है, जबकि हाथी प्राकृतिक रूप से चलते हैं।
वहीं पशुओं के लिए काम करने वाले लोगों का तर्क है कि हाथियों को भारी वजन उठाने या अतिक्रमण हटाने के लिए मजबूर करना मानसिक और शारीरिक क्रूरता है। तकनीकी तौर पर अगर बात करें तो कीचड़ भरे या घने जंगलों में जहां मशीनें फेल हो जाती है वहां हाथी ही एकमात्र विकल्प बचते हैं।
