गाजियाबाद पुलिस ने देश में जासूसी का बड़े नेटवर्क का पर्दाफाश किया है। शुक्रवार को चार लोगों को गिरफ्तार किया गया और पांच नाबालिगों को हिरासत में लिया गया। ये लोग सेना के ठिकानों, रेलवे स्टेशनों और अन्य संवेदनशील जगहों की तस्वीरें, वीडियो और जीपीएस लोकेशन विदेशी लोगों को भेज रहे थे।

 

पुलिस के अनुसार, गैंग के मुख्य आरोपी नौशाद अली (बिहार के मुजफ्फरपुर का) और समीर उर्फ शूटर (भागलपुर का) अभी फरार हैं। पहले ही सुहैल मलिक नाम के मुख्य हैंडलर को पकड़ा जा चुका है। शुक्रवार को गिरफ्तार होने वाले लोगों में नेपाल के गुल्मी जिले का गणेश (20 साल), बिहार के पूर्णिया का विवेक (18 साल), उत्तर प्रदेश के मेरठ का गगन कुमार प्रजापति (22 साल) और नवी मुंबई में रहने वाला उत्तर प्रदेश का जौनपुर का दुर्गेश निषाद (26 साल) है।

 

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11 लोगों के नाम आए सामने

अतिरिक्त पुलिस आयुक्त (गाजियाबाद) राज करण नैयर ने बताया कि 14 मार्च को कौशांबी थाने को सूचना मिली थी कि कुछ लोग रेलवे स्टेशनों और महत्वपूर्ण जगहों की फोटो-वीडियो विदेशी नंबरों पर भेज रहे हैं। वे और युवाओं को भी इस काम के लिए भर्ती कर रहे थे।

 

पुलिस ने पहले छह लोगों को पकड़ा था। एक एसआईटी (विशेष जांच टीम) बनाई गई। जांच में 11 लोगों के नाम सामने आए। इनमें से नौ को शुक्रवार को पकड़ा गया। पहले पकड़े गए लोगों में एक महिला भी शामिल थी। उनके फोन में संवेदनशील जगहों के वीडियो और लोकेशन मिले।

विदेश से संचालित होता था नेटवर्क

आरोपियों ने बताया कि विदेश से संचालित करने वाले उन्हें काम देते थे। उन्होंने सोलर पावर से चलने वाले सीसीटीवी कैमरे लगाए थे। जांच जारी है। पुलिस ने कहा कि दिल्ली छावनी (कैंटोनमेंट) और सोनीपत रेलवे स्टेशन पर दो ऐसे छिपे कैमरे लगाए गए थे। इन कैमरों का लाइव फीड विदेशी हैंडलर को भेजा जा रहा था।

 

इस मामले में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 61(2) और 152, साथ ही आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम की धारा 3 और 5 के तहत केस दर्ज किया गया है। आरोपियों ने फोन में खास ऐप लगाया था, जिससे जीपीएस लोकेशन भेजी जाती थी। विदेशी हैंडलर उन्हें ऑनलाइन ट्रेनिंग देते थे।

सिम कार्ड से शेयर होती थी ओटीपी

यह गैंग धोखाधड़ी भी करता था। वे भारतीय सिम कार्ड से ओटीपी शेयर करते थे। ये सिम छीनकर, एजेंट से खरीदकर या खुद/परिवार के नाम पर लेते थे। इससे विदेशी हैंडलर भारतीय नंबर से व्हाट्सएप अकाउंट चलाते थे।

 

हर काम के लिए 500 से 15,000 रुपये तक मिलते थे। पैसे यूपीआई से आते थे, लेकिन जन सेवा केंद्र या दुकानों से कैश में निकाले जाते थे, ताकि कोई ट्रेस न हो।

 

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गरीब लोगों को फंसाता था

पुलिस के मुताबिक, गैंग खास तौर पर तकनीकी जानकार लेकिन पैसे की तंगी में रहने वाले युवाओं को चुनता था, जैसे मोबाइल मैकेनिक, सीसीटीवी ऑपरेटर और कंप्यूटर टेक्नीशियन। यह नेटवर्क देश में 50 और जगहों पर छिपे कैमरे लगाने की योजना बना रहा था। पुलिस अब उन जगहों का पता लगा रही है। जांच अभी चल रही है। पुलिस सतर्क है और ऐसे नेटवर्क को तोड़ने में जुटी हुई है।