उत्तराखंड में विधानसभा के बजट सत्र के दौरान उत्तराखंड क्रांति दल (UKD) के कार्यकर्ताओं ने गैरसैंण को राजधानी बनाने के लिए प्रदर्शन किया। UKD के कार्यकर्ताओं की मांग है कि गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाया जाए। इसके अलावा UKD के कार्यकर्ता अंकिता भंडारी मामले को लेकर भी प्रदर्शन कर रहे हैं। इन सभी प्रदर्शनों के बीच UKD को जनता का भी समर्थन मिल रहा है और अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले इसे UKD की बढ़ती ताकत के रूप में देखा जा रहा है। बीजेपी और कांग्रेस के विकल्प के रूप में UKD खुद को पेश कर रही है।

 

प्रदर्शन के दौरान UKD कार्यकर्ताओं ने धामी सरकार के खिलाफ जोरदार नारेबाजी की और गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने की मांग को लेकर सड़क पर धरना दिया। इस दौरान कई जगहों पर पुलिस और कार्यकर्ताओं के बीच तीखी बहस भी हुई। बाद में पुलिस ने सभी UKD कार्यकर्ताओं को बसों में बैठाकर मालसी अस्थायी जेल भेज दिया। कुछ कार्यकर्ता जंगल के रास्ते भी गैरसैंण की और जाते हुए दिखाई दिए। भारी संख्या में युवा इस प्रदर्शन में शामिल हुए। 

 

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लंबे आंदोलन की चेतावनी दी

इस प्रदर्शन के दौरान UKD नेता पुष्पेश त्रिपाठी ने कहा कि उनकी पार्टी किसी भी हालत में गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनवाकर ही दम लेगी। उन्होंने कहा कि चाहे सरकार कितनी भी कोशिश कर ले लेकिन UKD के कार्यकर्ता अपने आंदोलन से पीछे नहीं हटेंगे। उन्होंने बीजेपी सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि सरकार जानबूझकर गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने के मुद्दे को नजरअंदाज कर रही है। 

उत्तराखंड बनाने में अहम भूमिका

UKD वही दल है जिसने 1990 के दशक में अलग राज्य उत्तराखंड की मांग को लेकर पहाड़ों पर जमकर प्रदर्शन किया था। साल 2000 में सरकार को UKD की मांग को मानते हुए उत्तराखंड को अलग राज्य का दर्जा देना पड़ा था लेकिन इसके बाद से UKD कमजोर पड़ता गया। 1979 में स्थापित हुए इस दल से आज कोई भी विधायक या सांसद नहीं है।  2000 में राज्य गठन के बाद UKD को सत्ता में अपनी जगह बनाने का मौका मिला लेकिन आंतरिक मतभेदों और नेतृत्व संकट के कारण यह पार्टी कमजोर पड़ती गई।

चुनावों में नहीं हुई सफल

UKD भले ही उत्तराखंड को अलग राज्य बनाने में कामयाब हो गई हो लेकिन चुनावी राजनीति में पार्टी बुरी तरह फेल हो गई। 2002 में हुए विधानसभा चुनाव में पार्टी को 70 में से सिर्फ 4 सीटों पर जीत मिली। इसके बाद  पार्टी का ग्राफ गिरता ही रहा। 2007 के विधानसभा चुनाव में UKD को सिर्फ तीन सीटों पर जीत मिली। इसके बाद  2012 में सिर्फ प्रीतम सिंह पंवार जीतकर आए लेकिन बाद में वह कांग्रेस में शामिल हो गए। 2017 के विधानसभा चुनाव में पार्टी का एक भी उम्मीदवार विधानसभा नहीं पहुंचा। 

फिर सक्रिय हुआ UKD

UKD पार्टी आपसी गुटबाजी के चलते उत्तराखंड की राजनीति में हाशिए पर पहुंच गई है। 2017 में मिली करारी हार के बाद अब पार्टी अपना जनाधार बढ़ाने की कोशिश कर रही है और पिछले कुछ समय से पार्टी फिर से सक्रिय हो गई है। पार्टी के प्रदर्शनों में युवाओं की काफी संख्या दिखाई देती है। पार्टी अब अपनी मूल मांगो को लेकर फिर से सक्रिय हो गई है, फिर चाहे वह भू-कानून हो, स्थायी राजधानी हो, रोजगार या शिक्षा और पलायन हो, इन सभी मुद्दों को फिर से उठाया जा रहा है। अंकिता भंड़ारी केस में भी पार्टी प्रदर्शनों को मुखर चेहरा रही है। 

 

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राजधानी की मांग पर अड़े कार्यकर्ता

उत्तराखंड को बने 25 साल से ज्यादा को समय हो गया है लेकिन अभी तक गैरसैंण को स्थायी राजधानी का दर्जा नहीं मिला है। इस छोटे से राज्य की दो राजधानियां हैं और UKD के कार्यकर्ताओं का कहना है कि इससे राज्य पर आर्थिक बोझ बढ़ रहा है। इसको लेकर अब UKD के कार्यकर्ता प्रदर्शन कर रहे हैं और आंदोलन की राह पर चल पड़े हैं। 

 

इसके अलावा पार्टी बाहरी लोगों को रोजगार देने का विरोध कर रही है। बीजेपी और कांग्रेस के अलावा तीसरा विकल्प राज्य को देने की कोशिश कर रही है। UKD ने उत्तराखंड आंदोलन के समय जो मुद्दे उठाए थे उन सभी मुद्दों को पार्टी अब फिर से उठा रही है। पार्टी को युवाओं का समर्थन मिल रहा है। मौजूदा समय में पार्टी अध्यक्ष सुरेंद्र कुकरेती, पार्टी नेता काशी सिंह ऐरी, मौजूदा कार्यकारी अध्यक्ष हरीश चंद्र पाठक, पूर्व विधायक जसवंत सिंह बिष्ट पार्टी का नेतृत्व कर रहे हैं।