ऑल इंडिया इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के चीफ असदुद्दीन औवैसी, असम के सांप्रदायिक सौहार्द को लेकर अक्सर मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा को घेरते हैं। उनका कहना है कि हिमंत बिस्व सरमा की सांप्रदायिक नीतियों ने संविधान का उल्लंघन किया है, असम के मुसलमानों को परेशान किया जा रहा है। वह कभी हिमंत को सांप्रदायिक बताते हैं, कभी नस्लवादी। वह असम के हाल पर चिंतिंत हैं, असम में दमखम के साथ AIMIM को चुनावी मैदान में उतारने का इशारा कर चुके हैं लेकिन अभी गुमनाम हैं।
असम में विधानसभा चुनावों के एलान में अब डेढ़ महीने से भी कम वक्त बचा है। अभी तक चुनाव की तारीखों का एलान नहीं हुआ है लेकिन सारे दल चुनावी मोड में महीनों पहले आ गए थे। असदुद्दीन ओवैसी, राज्य में इतनी बड़ी अल्पसंख्यक आबादी के बाद भी असम को लेकर न उत्साहित नजर आ रहे हैं, न ही यह कह रहे हैं कि चुनाव लड़ेंगे। अगर चुनाव नहीं लड़े तो किसे समर्थन देंगे, यह तक नहीं बताया है।
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नवंबर 2025 में असदुद्दीन ओवैसी ने यह इशारा किया था कि वह चुनाव में उतर सकते हैं। उन्होंने यह बताने से पहरेज किया था कि वह किस तरह से चुनावी मैदान में उतरेंगे, उनकी चुनावी रणनीति क्या होगी।
क्या AIUDF के साथ हैं असदुद्दीन ओवैसी?
ऐसी अटकलें लगीं कि ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के चीफ असदुद्दीन ओवैसी और ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (AIUDF) के नेता बदरुद्दीन अजमल, असम चुनावों में गठबंधन कर सकते हैं। दोनों की गिनती, मुसलमानों के बड़े नेताओं में होती है। दोनों अल्पसंख्यक समुदाय में खासे लोकप्रिय हैं। असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी का विस्तार, अब तेंलगाना से लेकर महाराष्ट्र और बिहार तक है। ऐसे में बदरुद्दीन अजमल ने उम्मीद जताई थी कि उनकी पार्टी का गठबंधन, AIMIM के साथ हो सकता है।
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अटकलें क्यों लगीं?
AIUDF अध्यक्ष बदरुद्दीन अजमल ने 17 नवंबर 2025 को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस किया। उन्होंने इशारा कि असदुद्दीन ओवैसी के साथ उनकी बातचीत चल रही है, कुछ भी संभव हो सकता है। उन्होंने ओवैसी को भाई बता दिया था। उन्होंने यह भी कहा था कि दोनों साथ मिलकर प्रचार कर सकते हैं।
क्या था AIUDF का प्लान?
असम में 35 विधानसभाएं ऐसी हैं, जहां मुस्लिम वोटर निर्णायक स्थिति में है। 20 विधानसभाओं में मुस्लिम वोटर बेहद मजबूत हैं, जहां बीजेपी का दांव भी नहीं चलता है। असदुद्दीन ओवैसी की मदद से वह इन सीटों पर अपनी दावेदारी ठोकना चाहते थे लेकिन अब असदु्ददीन ओवैसी असम से दूरी बना रहे हैं.
ओवैसी ने AIUDF के साथ दोस्ती पर क्या कहा?
AIMIM ने 18 नवंबर 2025 को X पर आधिकारिक रूप से कहा, 'ये रिपोर्टें बिल्कुल झूठी हैं। AIMIM ने न तो असम में ऑपरेशन शुरू करने का फैसला किया है और न ही राज्य में किसी पार्टी के साथ गठबंधन करने का।'
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अगर साथ हों तो असदुद्दीन ओवैसी तो क्या हो सकता है?
साल 2011 की जनगणना बताती है कि असम में मुस्लिम आबादी 34 फीसदी से ज्यादा है। बदरुद्दीन अजमल की लोकप्रियता घटी है। साल 2024 में वह अपनी सीट धुबरी गंवा बैठे थे। असदुद्दीन औवैसी उनकी उम्मीद थे लेकिन अब उन्होंने अकेले चलने का फैसला किया है।
AIMIM ने नहीं दिया भाव, अब अकेले चुनाव लड़ेगी AIUDF
AIUDF पहले कांग्रेस गठबंधन के साथ थी, अब कांग्रेस ने इस पार्टी को संप्रदायिक बताकर किनारा कर लिया। AIUDF ने अकेले चुनाव में उतरने का फैसला किया है।
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असम में आने से बच क्यों रहे हैं असदुद्दीन ओवैसी, भ्रम क्यों?
AIUDF, बांग्लाभाषी मुसलमानों की सबसे बड़ी पार्टी है। दूसरे वर्गों के मुस्लिम भी उन्हें अपना नेता मानते हैं। चुनाव दर चुनाव AIUDF ने यह साबित किया है। साल 2006 में AIUDF ने 10 विधानसभा सीटें जीती थीं, साल 2011 में 18 सीटें मिलीं, साल 2016 में 13 सीटों पर कामयाबी मिली। 2021 में एक बार फिर 16 सीटों पर जीत मिल गई। असम में AIUDF मजबूत फैक्टर है। AIUDF की भी राजनीति वही है, जो असदुद्दीन ओवैसी की है।
अल्पसंख्यक हितों की बाद बदरुद्दीन अजमल भी करते हैं, असदुद्दीन ओवैसी भी करते हैं। एक जमाना ऐसा था, जब अल्पसंख्यक कांग्रेस के कोर वोटर थे, अब बदरुद्दीन अमजल की पार्टी के हैं। असदुद्दीन ओवैसी पर बीजेपी की टीम बी होने के आरोप लगते रहे हैं।
अगर असदुद्दीन ओवैसी यहां उतरे हैं तो AIMIM पर वोट कटवा पार्टी होने के आरोप लगने तय हैं। पहले ही पार्टियां, असम में उन्हें इसी भूमिका में देख रहीं है। अप्रैल में चुनाव होने वाले हैं और अभी तक असदुद्दीन ओवैसी न तो असम गए हैं, न ही संगठन को सक्रिय किया है। असम के लिए उनकी सक्रियता सिर्फ सोशल मीडिया तक सक्रिय है।