उत्तर प्रदेश के वाराणसी में गंगा किनारे बसे मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाट पर चिता की राख से खेली जाने वाली होली इन दिनों चर्चा और विवादों के घेरे में है। काशी की इस 'मसाने की होली' को लेकर शहर के विद्वान और कुछ धार्मिक संगठन आमने-सामने आ गए हैं। काशी विद्वत परिषद का कहना है कि श्मशान में इस तरह होली खेलना शास्त्रों के खिलाफ है और यह कोई पुरानी परंपरा नहीं, बल्कि हाल के वर्षों में शुरू किया गया एक दिखावा है।
काशी विद्वत परिषद के पंडित विनय पांडेय का मानना है कि श्मशान एक ऐसी जगह है जहां लोग अपनों के खोने के बाद दुख में आते हैं, न कि उत्सव मनाने। उनका कहना है कि पिछले कुछ सालों से कुछ लोग इसे जबरदस्ती प्राचीन परंपरा बता रहे हैं, जबकि असल में श्मशान की एक अपनी मर्यादा होती है, उससे इस पवित्र स्थान का अपमान हो रहा है।
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क्या यह परंपरा वाकई 400 साल पुरानी है?
श्मशान रक्षक दल के अजय शर्मा ने इस होली के इतिहास पर बड़ा सवाल उठाया है। उनका कहना है, 'साल 2014 के आसपास यह सब औघड़ बाबाओं को ठंडाई पिलाने के नाम पर शुरू हुआ था। अब लोग इसे यह दावा कर रहें है कि यह 400 साल पुरानी रीत है। उन्होंने यह भी कहा कि हिंदू धर्म के पुराणों में लिखा है कि बिना किसी जरूरी कारण के श्मशान नहीं जाना चाहिए। जो लोग वहां जाकर नाच-गाना करते हैं और फिर मंदिरों में जाते हैं।'
यहां तक कि उन्होंने मशहूर गायक पंडित छन्नूलाल मिश्रा के गाने का उदाहरण देते हुए कहा कि वह गीत भगवान शिव की भक्ति के लिए था, न कि इंसानों के वहां जाकर हुड़दंग करने के लिए।
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आयोजकों का अपना तर्क
दूसरी तरफ, घाटों पर इस होली का आयोजन करने वाले गुलशन कपूर इन बातों को गलत बताते हैं। उनका कहना है कि काशी तो खुद एक 'महाश्मशान' है और यहां भगवान शिव स्वयं चिता की भस्म से होली खेलते हैं। उनका दावा है कि यह परंपरा वेदों और पुराणों का हिस्सा है लेकिन मुगल काल के दौरान यह दब गई थी जिसे अब फिर से शुरू किया गया है।
उन्होंने विरोध करने वालों पर आरोप लगाया कि कुछ लोग चंदे की राजनीति की वजह से इस भक्ति भरे आयोजन को बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं।
