संजय सिंह, पटना। बिहार की राजनीति एक बार फिर बड़े मोड़ पर खड़ी नजर आ रही है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के संभावित तौर पर केंद्र की राजनीति में सक्रिय होने की चर्चाओं ने न केवल सियासी गलियारों में हलचल मचा दी है, बल्कि जेडीयू के भीतर भी असहजता बढ़ा दी है। पार्टी के कई नेता और कार्यकर्ता चाहते हैं कि नीतीश कुमार बिहार की कमान न छोड़ें। इसी बीच जेडीयू के वरिष्ठ नेता आनंद मोहन ने खुलकर अपनी नाराजगी जाहिर की है।
जनता के विश्वास को ठेस पहुंची
मीडिया से बातचीत में आनंद मोहन ने कहा कि यह फैसला जनता की भावनाओं के विपरीत है। उन्होंने याद दिलाया कि जनता के बीच यह संदेश गया था कि 2025 से 2030 फिर से नीतीश। ऐसे में अब अगर वे दिल्ली की राजनीति की ओर रुख करते हैं तो यह जनता के भरोसे को ठेस पहुंचाने जैसा होगा।
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उन्होंने साफ तौर पर कहा कि जो लोग यह सोच रहे हैं कि इस फैसले से कोई राजनीतिक लाभ होगा, वे गलतफहमी में हैं। उनके मुताबिक, इससे जेडीयू को नुकसान तो होगा ही, साथ ही इसका खामियाजा बीजेपी को भी उठाना पड़ सकता है। आनंद मोहन ने यह भी जोड़ा कि इसका सीधा फायदा विपक्ष को मिलेगा, खासकर पिछड़ा और अति-पिछड़ा वर्ग के बीच इसका नकारात्मक संदेश गया है।
निशांत कुमार को लेकर खुला समर्थन
मुख्यमंत्री के बेटे निशांत कुमार को लेकर भी सियासी चर्चा तेज है। इस पर आनंद मोहन ने कहा कि निशांत कुमार की एंट्री से नई उम्मीद जगी है। उन्होंने इसे नीतीश कुमार के संभावित दिल्ली जाने के फैसले का शॉक ऑब्जर्वर बताया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि अगर निशांत कुमार को मुख्यमंत्री बनाया जाता है तो यह स्वागतयोग्य कदम होगा। हालांकि, उपमुख्यमंत्री बनाए जाने के सवाल पर उन्होंने हल्के-फुल्के अंदाज में तंज कसते हुए कहा उपमुख्यमंत्री क्या होता है? उपमुख्यमंत्री मतलब चुप मुख्यमंत्री। उनका मानना है कि अगर निशांत को लाया जाए तो उन्हें पूरी जिम्मेदारी के साथ लाया जाना चाहिए।
बीजेपी के चेहरे पर भी दी राय
एनडीए के भीतर संभावित नेतृत्व को लेकर भी आनंद मोहन ने अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि अगर बीजेपी की ओर से किसी को मुख्यमंत्री बनाया जाता है तो सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखना जरूरी होगा। इस संदर्भ में उन्होंने सम्राट चौधरी का नाम आगे बढ़ाया। उनके अनुसार सम्राट चौधरी लव-कुश, पिछड़ा और अति-पिछड़ा वर्ग के बीच एक मजबूत संदेश देने में सक्षम नेता हैं।
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एनडीए के फैसले पर टिकी नजरें
फिलहाल बिहार की राजनीति में स्थिति पूरी तरह से स्पष्ट नहीं है। जेडीयू के भीतर उठ रही आवाजें यह संकेत दे रही हैं कि पार्टी के कई नेता नीतीश कुमार के फैसले से सहज नहीं हैं। वहीं दूसरी ओर एनडीए के भीतर भी नेतृत्व को लेकर मंथन जारी है। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि आखिरकार एनडीए किसे बिहार का अगला चेहरा बनाता है और क्या नीतीश कुमार वाकई केंद्र की राजनीति में नई भूमिका निभाने के लिए राज्य की कमान छोड़ते हैं या फिर कार्यकर्ताओं की अपील को ध्यान में रखते हुए बिहार में ही बने रहते हैं। बहरहाल, यह साफ है कि आने वाले दिनों में बिहार की राजनीति में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं और इस पूरे घटनाक्रम ने सियासी पारा चढ़ा दिया है।
