दरभंगा की आखिरी महारानी कामसुंदरी देवी का सोमवार को निधन हो गया। उनके निधन के बाद एक बार फिर से बिहार का यह ऐतिहासिक परिवार चर्चा में है। यह वही परिवार है जिसने अपनी करोड़ों की संपत्ति अलग-अलग वजहों से दान कर दी। यह वही परिवार है जिसने अपनी निजी संपत्ति से कई विकास कार्य कराए, यूनिवर्सिटी के लिए लाखों का दान दिया, बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के लिए 5 लाख दान किए। इस सबके बावजूद यह परिवार समय के साथ खत्म सा होता गया और संपत्ति भी वैसी नहीं रही जैसी एक समय हुआ करती थी।
चर्चा है कि अब संपत्ति को लेकर एक बार फिर से विवाद भी हो सकता है। इसकी वजह यह है कि आखिरी महाराजा कामेश्वर सिंह थे लेकिन उनकी कोई संतान नहीं थी। पहले पत्नी महारानी राजलक्ष्मी का निधन 1976 में हुआ, दूसरी पत्नी कामेश्वरी प्रिया का निधन 1940 में और अब तीसरी पत्नी कामसुंदरी देवी का निधन 2026 में हुआ है। मौजूदा वक्त में दरभंगा राज के ट्रस्टी हैं कपिलेश्वर सिंह। कपिलेश्वर सिंह, कामेश्वर सिंह के भाई विश्वेश्वर सिंह के पोते यानी विश्वेश्वर सिंह के बेटे शुभेश्वर सिंह के बेटे हैं। रोचक बात है कि अंतिम संस्कार के वक्त कपिलेश्वर सिंह मौजूद नहीं थे और उन्हें मुखाग्नि देने के लिए पोते रत्नेश्वर सिंह आग आए। रत्नेश्वर सिंह, यज्ञेश्वर सिंह के बेटे यानी कपिलेश्वर के चचेरे भाई हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, महारानी कामसुंदरी देवी के अंतिम संस्कार से पहले कुछ विवाद भी हुए। कामेश्वर धार्मिक ट्रस्ट के मैनेजर उदयनाथ झा के बेटे और महारानी कामसुंदरी देवी के परिवार के कई लोगों के बीच पहले बहस हुई और बाद में यह बात हाथापाई तक पहुंच गई। मौके पर पुलिस मौजूद थी लेकिन तनाव पैदा हो गया था। बताया जा रहा है कि जिन लोगों के बीच विवाद हुए वे महारानी के बहन के बेटे बताए जा रहे हैं।
दरभंगा के खजाने का क्या हुआ?
कहा जाता है कि आजादी के वक्त दरभंगा के महाराज की सालाना आमदनी लगभग 55 लाख रुपये रुपये थी। लिहाजा दरभंगा के राजा दूसरे छोटे-मोटे राजघरानों के बैंकर बन गए थे। डुमराव, टेकारी, कूच बिहार के राजा जब कंगाली में आते तो दरभंगा से कर्ज लेते थे। कभी-कभी अपने खानदानी गहने भी बेच देते थे। बस यहीं से शुरू हुआ दरभंगा का वह अनमोल रत्न भंडार, जो हैदराबाद के निज़ाम के खज़ाने से भी ज्यादा कीमती माना जाता था।
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खजाने में क्या-क्या था?
दरभंगा के गहनों में सबसे मशहूर था मराठा पेशवाओं का नौलखा हार। मोतियों, हीरों और पन्नों का ये लंबा हार दुनिया के सबसे शानदार हारों में गिना जाता था। मूल रूप से यह पेशवा बाजीराव प्रथम का था, जिन्होंने इसे 9 लाख रुपये में बनवाया था - इसीलिए नाम पड़ा 'नौलखा'। उनके बाद, हर पीढ़ी के पेशवाओं ने इसमें और रत्न जुड़वाए। 1900 के दशक तक इसकी कीमत बढ़कर 90 लाख रुपये हो गई थी! 1857 की क्रांति के बाद, हारे हुए नानासाहब पेशवा इसे अपने साथ नेपाल ले गए। वहां इसे औने-पौने दामों में नेपाल के प्रधानमंत्री राणा जंग बहादुर को बेच दिया। राणा ने इसके सारे बड़े पन्ने और माणिक निकाल लिए। बाद में राणा के उत्तराधिकारी ने इसे दरभंगा के राजा को बेच दिया, वही एकमात्र शख्स थे जो उस वक्त इसे खरीद सकते थे।
1901 में दरभंगा ने नेपाल के राणाओं से दो और मशहूर चीजें खरीदीं - नानासाहब की 'शिरोमणि' मुहर, जिसमें तीन इंच लंबा एक अकेला पन्ना जड़ा था और 'पेशवा हीरा' - एक बड़ा सफेद हीरा, जिसे दरभंगा के महाराजा अंगूठी की तरह पहनते थे। दरभंगा के संग्रह में एक और खास चीज थी - फ्रांस की आखिरी रानी मेरी एंटोइनेट का हार! यह वही हार था जो 1770 में उनकी शादी पर पेरिस शहर ने उन्हें तोहफे में दिया था। फ्रांसीसी क्रांति के बाद ये ऑस्ट्रिया के हैब्सबर्ग परिवार के पास चला गया। 1930 के दशक में एक ऑस्ट्रियाई राजकुमारी ने इसे नीलामी में रखा। महाराजा कामेश्वर सिंह, जो ऐतिहासिक गहनों के शौकीन थे, ने सफल बोली लगाई और कुछ लाख रुपये देकर इसे अपने संग्रह में शामिल कर लिया। दरभंगा के महाराजा ने रूस के ज़ार के कई जवाहरात भी खरीदे थे।
इनके अलावा दरभंगा के संग्रह में दुनिया का सबसे बड़ा नक्काशीदार पन्ना भी था- 'ग्रेट मुगल एमरल्ड'। 217 कैरेट का यह पन्ना करीब 2 इंच लंबा, 1.75 इंच चौड़ा और आधा इंच मोटा था। माना जाता है कि यह मुग़ल बादशाहों का था, जिस पर कुरान की आयतें नक्काशी की गई थीं। कूच बिहार के महाराजा ने इसे कर्ज के बदले गिरवी रखा था और जब वह कर्ज नहीं चुका पाए तो यह दरभंगा के पास आ गया। दरभंगा के खजाने का एक संबंध भारत के प्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी सर सीवी रमन से भी था। रमन रत्नों के शौक के लिए जाने जाते थे। अपनी प्रयोगशाला में अक्सर वह हीरों का अध्ययन करते थे। एक बार शोध के लिए उन्हें एक बड़े हीरे की जरूरत पड़ी और दरभंगा के महाराजा ने उन्हें दो दिन के लिए 140 कैरेट का हीरा उधार दे दिया! यह वही 'पेशवा हीरा' था, जिसे महाराजा अंगूठी की तरह पहनते थे।
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दरभंगा के संग्रह में और भी कई अनोखी चीजें थीं:
- अवध के आखिरी नवाब वाजिद अली शाह का एक प्याला, जो एक ही पन्ने से बना था
- धौलपुर के राणा का मोतियों का मुकुट
- मुर्शिदाबाद के नवाबों के गहने
इन सभी गहनों को महाराजाओं के दफ्तर में रखा गया था लेकिन अब ये कहां हैं? किसी को नहीं मालूम।
मार्च 2024 में इंडिया टुडे मैगजीन में छपी रिपोर्ट के अनुसार, महाराजा कामेश्वर सिंह के पास हजारों एकड़ जमीन, इमारतें, कंपनियां, अरबों के जेवरात, यह सब कुछ था लेकिन महाराजा ने अपनी संपत्ति का वारिस एक ट्रस्ट को बनाया। इसकी देखरेख की जिम्मेदारी तीन लोगों के पास थी। एक महाराज के बहनोई और दो बाहर के लोग। खुद अपनी रानियों के लिए महाराज महज पांच हजार महीना रकम तय कर गए जबकि महाराजा की कुल संपत्ति का आज के हिसाब से आकलन किया जाए तो चार लाख करोड़ के बराबर थी। जमीन से लेकर शेयर तक, सब कुछ शामिल था। केवल जवाहरातों की ही कीमत 200 करोड़ के आसपास थी लेकिन मिलकर सब लूट लिया गया।
कामेश्वर सिंह की बड़ी पत्नी राजलक्ष्मी की डायरी में एक जिक्र आता है। मार्च 1967 में वह लिखती हैं, 'ज्वेलर आए। ट्रस्ट वालों ने सारा गहना उनसे बेच दिया। मुझसे एक बार भी नहीं पूछा।' मार्च 1967 में इस तथाकथित नीलामी में करोड़ों के जवाहरात बॉम्बे के मशहूर जौहरी नानूभाई झवेरी को बेच दिए गए, वह भी मात्र 70-75 लाख रुपये में। जबकि एक यूरोपियन फर्म ने इनकी कीमत 2 करोड़ पाउंड आंकी थी। लूट का यह सिलसिला- 1967 से नहीं 1962 से ही शुरू हो चुका था। महाराजा की मौत के तुरंत बाद। नवम्बर 1962- ट्रस्टियों ने महाराजा के दो हवाई जहाज भारत सरकार को दान में दे दिए। इसके बाद तत्कालीन वित्त मंत्री मोरारजी देसाई को दरभंगा बुलाया गया। उन्हें सोने से तौला गया और यह सारा सोना भारत सरकार के डिफेन्स फंड में डाल दिया गया।
इंडिया टुडे की रिपोर्ट में दरभंगा राज पर लिखी गई किताब 'द क्राइसिस ऑफ सक्सेशन' के लेखक तेजकर झा का कहना दर्ज़ है। तेजकर झा कहते हैं, 'ट्रस्ट के एग्जीक्यूटर पटना हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस रहे लक्ष्मीकांत झा थे। वह लॉ कमिशन का अध्यक्ष बनना चाहते थे और मोरारजी देसाई को तोले जाने का आयोजन इसी कवायद का नतीजा था।'
कोठियों का क्या हुआ?
ऐसा ही कुछ हाल महाराजा की कोठियों का भी हुआ। इलाहाबाद, कलकत्ता, सौराष्ट्र और तमाम जगहों की कोठियां बेच दी गई। बाकायदा इलाहाबाद की कोठियां तो ट्रस्टी मुकुंद झा (जो महाराजा के बहनोई थे) ने अपने बेटे के नाम करवा लीं। इसके बाद नंबर आया महाराज की फैक्ट्रियों का। अपने जमाने में एशिया की सबसे बड़ी पेपर मिल - अशोक पेपर मिल। लोहट की चीनी मिलें। एक-एक करके सब अधिग्रहीत हुई और एक दशक के भीतर बंद भी हो गईं। इमरजेंसी के दौरान सरकारी अधिग्रहण के नाम पर दरभंगा राज का मुख्य कार्यालय ले लिया गया। यह सब हुआ बिहार के मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र के इशारे पर। 300 बीघा जमीन के लिए मात्र 70,000 रुपये मुआवजा दिया गया।
ट्रस्ट में महाराजा के शेयर भी थे। इन्हें भी औने-पौने दामों पर बेच दिया गया। कुल मिलाकर कहा जाए तो दरभंगा राज की निशानियों के नाम पर आज बस कुछ पुरानी इमारतें बची हैं। जिन्हें देखकर शायद ही कोई कह सके कि एक समय में दरभंगा के महाराज भारत के तीसरे सबसे अमीर व्यक्ति हुआ करते थे
