कर्नाटक की सिद्धारमैया के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने बेंगलुरु में 22 दलित और OBC मठों को 255 करोड़ रुपये की जमीनें दान में देने का फैसला किया है। कर्नाटक के कई अहम विभागों ने सरकार के इस फैसले का विरोध किया है। विभागों का कहना है कि गोमाला जमीन और शहर के कॉर्पोरेशन की सीमा के अंदर आने वाली जमीन न दी जाए। 

कर्नाटक के वित्त और कानून और संसदीय मामलों के विभागों ने इस पर आपत्ति जताई है। सिद्धारमैया सरकार के इस फैसले पर सवाल इसलिए उठ रहे हैं कि क्योंकि दान ही कानूनी दायरे में आ सकता है। कर्नाटक में प्रावधान है कि गोमाला जमीन को निजी संगठनों को बेचा या दिया नहीं जा सकता है।

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क्यों दान की गई हैं ये जमीनें?

टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक कर्नाटक सरकार ने यह फैसला, बीते सप्ताह लिया है। साल 2025 की शुरुआत में कुछ दलित और पिछड़े वर्ग के संतों ने सरकार से जमीन दान की गुहार लगाई थी। उनका कहना था कि बेंगलुरु में परोपकारी संस्थानों के संचालन के लिए सरकार जमीन दे और आर्थिक मदद दे। 

किन्हें मिला है यह दान?

रिपोर्ट के मुताबिक बैकवर्ड दलित मठाधीश्वरारा ओक्कुटा, बेंगलुरु के अध्यक्ष और महासचिव ने बेंगलुरु उत्तर जिले के रावुत्तनहल्ली और दासनपुरा में अपने 22 मठों के लिए जमीन मांगी थी। सर्वे नंबर 57 पर लगभग 34 एकड़ और 9 गुंटा और सर्वे नंबर 58 पर 18 एकड़ और 5 गुंटा जमीन इन संस्थानों को दी गई। यह मांग की गई थी कि हर मठ को 20 गुंटा से 4 एकड़ जमीन देने का प्रस्ताव दिया गया था। 

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किस आधार पर दान?

यह मठ के आकार, उसके अनुयायियों की संख्या और सामाजिक कार्य के तरीके पर निर्भर करता है। गुंटा महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक जैसे राज्यों में जमीन मापने एक पारंपरिक इकाई है। मुख्य रूप से कृषि भूमि के लिए उपयोग होने वाला 1 गुंटा, 1,089 वर्ग फुट या लगभग 101.17 वर्ग मीटर के बराबर होता है।

क्यों हो रहे हैं विभागीय टकराव?

कृष्णा बायरेगौड़ा, राजस्व मंत्री, कर्नाटक:-
कई विभागों ने विरोध में राय दी थी, लेकिन भूमि देने का फैसला सामाजिक न्याय और समानता के आधार पर किया गया। जब प्रभुत्वशाली समुदायों के मठों को जमीनें दी गईं तो नियम और कानून केवल कमजोर और वंचित समुदायों के मठों पर ही क्यों लागू हों? कैबिनेट में यही आम भावना थी और उसी के अनुसार निर्णय लिया गया। 

कर्नाटक में कांग्रेस नेताओं और सरकार के सीनियर मंत्रियों का कहना है कि विभागों की आपत्ति नई बात नहीं है। जमीन देने के सभी अनुरोधों के लिए ऐसे टकराव पहले भी हुए हैं।

 

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कर्नाटक के सरकारी विभागों का क्या कहना है?

कर्नाटक सरकार के विभागों ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला दिया है। सुप्रीम कोर्ट, पोरंबोकु, गोमाला, खराबू और जल निकायों की जमीनों को संरक्षित करने का पक्षधर है। गोमाला, मवेशियों के चरने वाली जगह है। खराबू बंजर या बेकार जमीनों को कहा जाता है। सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि ऐसी जमीनें, सार्वजनिक उपयोग के लिए होती हैं। इन्हें निजी व्यक्तियों को न दिया जा सकता है, नहीं बेचा जा सकता है, न ही इन पर किसी को कब्जा करने का अधिकार दिया जा सकता है। 

सुप्रीम कोर्ट ने इन फैसलों के आधार पर पूरे देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों को निर्देश दिया है कि ऐसी जमीनों को सुरक्षित रखें और इन्हें सार्वजनिक उपयोग के लिए ही बनाए रखें। अब इस प्रस्ताव वाली जमीन के बारे में नोट कहता है कि  जो जमीन देने की बात चल रही है, वह बेंगलुरु महानगर पालिका के मुख्य कार्यालय से 18 किलोमीटर के दायरे में आती है। यह जमीन शहर के नजदीक है और नियमों के दायरे में आती है।

  
कर्नाटक का कानून क्या कहता है?

 कर्नाटक भूमि अनुदान नियम-1969 कहता है कि शहर की सीमा के भीतर सरकारी ज़मीन किसी भी व्यक्ति या निजी संस्थानों को नहीं दी जाएगी और इसे सार्वजनिक उद्देश्य के लिए आरक्षित रखा जाएगा। विभागों का कहना है कि जमीनों को देने का कोई प्रावधान ही नहीं है।

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कहां फंस रही है बात?

वित्त विभाग के अनुसार, गाइडेंस वैल्यू के अनुसार जमीन की कीमत 1 करोड़ रुपये प्रति एकड़ थी, जबकि वही ज़मीन, अगर बदली हुई लेकिन अविकसित हो, तो उसकी कीमत 1.8 करोड़ रुपये थी। अगर विकसित हो, तो ज़मीन की कीमत 4.8 करोड़ रुपये प्रति एकड़ होगी। राजस्व अधिकारियों ने दावा किया कि इनमें से कुछ मठ जिन्हें जमीन दी गई है, वे हाल ही में बने हैं और उनके परोपकारी कार्यों को साबित करने के लिए कोई ट्रैक रिकॉर्ड नहीं है।


सिद्धारमैया सरकार ने क्यों किया है ऐसा?

कर्नाटक में OBC राजनीति सबसे मजबूत है। कर्नाटक में करीब 33 से 25 फीसदी आबादी अन्य पिछड़ा वर्ग की है। यह ऐसा वर्ग है, जिसे सरकार नाराज नहीं करना चाहती है। कर्नाटक में मठों की राजनीति भी सुर्खियों में रही है। सवर्ण बनाम ओबीसी मठ का मामला, सामाजिक टकराव की वजह बनता रहा है। राज्य की 224 विधानसभा सीटों में ज्यादातर सीटें ऐसी हैं, जहां ओबीसी मतदाता जीत-हार तय करते हैं। कांग्रेस की नजर इसी वोट बैंक पर है। 

कर्नाटक में अल्पसंख्यक, पिछड़ा वर्ग और दलित संगठनों का मजबूत गठबंधन, अहम राजनीतिक समीकरण के केंद्र में रहा है। ओबीसी, सत्ता में मजबूत हिस्सेदारी निभाते हैं। कर्नाटक में किंगमेकर कहलाने वाला वर्ग ओबीसी ही है। कर्नाटक सरकार ने अनुसूचित जाति के मठों को भी दान दिया है। राज्य की कुल आबादी में हिस्सेदारी 18 फीसदी से 19 फीसदी तक है। कर्नाटक में 30 से ज्यादा सीटें, अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं। सियासी जानकारों का कहना है कि कांग्रेस सरकार इस फैसले से अनुसूचित जाति और ओबीसी की कवायद कर अपने राजनीतिक हित साध रही है।