केरल की कांग्रेस सरकार ने बुधवार को फैसला लिया है कि विवादित सिल्वरलाइन हाई-स्पीड रेल प्रोजेक्ट को रद्द किया जाएगा। इसी को के-लाइन प्रोजेक्ट भी कहा जाता है। पिछली लेफ्ट सरकार ने केरल के उत्तरी और दक्षिणी हिस्से को सेमी हाई-स्पीड रेल नेटवर्क से जोड़ने के लिए यह प्रोजेक्ट शुरू किया था। प्रोजेक्ट को रद्द करने का एलान करते हुए मुख्यमंत्री वी डी सतीशन ने बताया है कि जिन लोगों की जमीनें ली गई हैं, उन्हें वापस किया जाएगा। साथ ही, प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज किए गए मुकदमों को भी वापस लेने की बात कही गई है।

 

यह प्रोजेक्ट दक्षिण में स्थित केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम को उत्तर में स्थित कासगरोड जिले से जोड़ने के लिए बनायाया जाना था। साल 2019 में शुरू किए गए इस प्रोजेक्ट का मकसद था कि उत्तर में रहने वाले लोग कम समय में राजधानी तिरुवनंतपुरम तक पहुंच सकें और दक्षिण के लोग भी कम समय में उत्तरी जिलों तक जा सकें। हालांकि, शुरुआत से ही इसका खूब विरोध किया गया। विपक्ष में रही कांग्रेस ने भी इसके खिलाफ आवाज उठाई थी और अब सत्ता में आने के बाद उसने इस प्रोजेक्ट को रद्द करने का एलान कर दिया है।

आगे क्या होगा?

मुख्यमंत्री वी डी सतीशन ने बताया है कि जहां कहीं भी सर्वे हुआ है और पत्थर गाड़े गए हैं, उन्हें राजस्व विभाग की मदद से हटा दिया जाएगा। उन्होंने यह भी बताया है कि इस प्रोजेक्ट के लिए किसी की भी जमीन नहीं ली जाएगी और जिसकी जमीन की नपाई हो गई है, उसे भी वापस कर दिया जाएगा। अब केरल की सरकार कोर्ट में एफिडेविट दाखिल करेगी ताकि इस प्रोजेक्ट के खिलाफ प्रदर्शन करने वाले लोगों के खिलाफ दर्ज मुकदमे वापस लिए जा सकें।

 

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बता दें कि यह प्रोजेक्ट कुल 530 किलोमीटर लंबा होना था। हालांकि, जमीन के अधिग्रहण और कई अन्य कारणों से इसका खूब विरोध किया गया। रोचक बात है कि केरल की लेफ्ट सरकार ने 2019 में इसकी शुरुआत की थी लेकिन विरोध के चलते इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया था। इस प्रोजेक्ट को केंद्र सरकार की भी मंजूरी नहीं मिली थी।

रिपोर्ट के मुताबिक, इस प्रोजेक्ट के लिए लगभग 1200 हेक्टेयर से ज्यादा जमीन की जरूरत थी। यह प्रोजेक्ट कई घनी बस्तियों से होकर गुजरना था और कम से कम 10 हजार परिवारों को इसके लिए विस्थापित होना पड़ता। यही वजह थी कि इसका विरोध खूब हुआ था। पर्यावरण के विशेषज्ञों ने भी इसको लेकर खूब विरोध जताया था क्योंकि जिन इलाकों से यह लाइन गुजरनी थी उन रास्तों में पानी का बहाव रोकने के लिए कई ऐसी संरचनाएं बनानी पड़तीं जिनसे प्राकृतिक बहाव बाधित होता।

केरल को कंगाल कर देता यह प्रोजेक्ट?

इस प्रोजेक्ट के इकनॉमिक मॉडल को लेकर भी खूब सवाल खड़े हुए थे। इसकी प्रस्तावित लागत लगभग 63,941 करोड़ रुपये थी और इसका आधा हिस्सा अंतराष्ट्रीय लोन से आना था। पहले से ही कर्ज में दबे केरल के लिए यह लोन काफी भारी पड़ सकता था। इसे रद्द करने की एक अहम वजह इसे भी माना जा रहा है। 

 

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यह एक स्टैंडर्ड गॉज रेल लाइन होनी थी और इसके लिए रेलवे की मंजूरी जरूरी थी लेकिन केंद्र सरकार ने मंजूरी नहीं थी। ऐसे में इस प्रोजेक्ट का धरातल पर उतरना संभव नहीं लग रहा था। ऐसे में केरल की मौजूदा सरकार ने इसे रद्द करने का ही फैसला ले लिया है।