बांकुरा: कांटे की टक्कर, TMC से आगे बढ़ पाएगी BJP?
बांकुरा जिला में भारतीय जनता पार्टी जहां जड़ें जमाने की कोशिश में जुटी है, तृणमूल कांग्रेस ने गहरी पैठ बना ली है। आइए जानते हैं इस जिले के बारे में।

बांकुरा जिला, Photo Credit: Khabargaon
पश्चिम बंगाल का बांकुरा जिला, पश्चिम बंगाल के 5 प्रमुख संभागों में से एक, मेदिनीपुर का हिस्सा है। यहां दो लोकसभा सीटें हैं। बांकुरा जिले के एक तरफ पूर्वी बर्धमान हैं, दूसरी तरफ पश्चिमी बर्धमान। उत्तर में पुरुलिया जिला है। याहं से दामोदर नदी गुजरती है। यहां के बिष्णुपुर साम्राज्य की ख्याति ब्रिटिश काल में भी रही है। यहां का जोर मंदिर, श्याम राय मंदिर आकर्षण का केंद्र है। सुसुनिया की पहाड़ियां, इस जिले को और खास बनाती हैं। दामोदर बेसिन में बसा यह जिला, खेती-किसानी के लिए लिहाज से बेहद अहम है।
राजनीतिक तौर पर बांकुरा जिले में भारतीय जनता पार्टी और तृणमूल कांग्रेस के बीच लगभग बराबर का मुकाबला रहता है। टीएमसी ज्यादा मजबूत है। यहां 12 सीटें हैं, जिनमें से 7 सीटों पर टीएमसी का कब्जा है, 5 सीटों पर बीजेपी का। 2021 से पहले यहां कांग्रेस दमखम दिखाती थी लेकिन टीएमसी ही भारी पड़ती थी।
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एक नजर, जिले की सियासत पर
बांकुरा जिले के अंतर्गत दो लोकसभा सीटें आती हैं। बांकुरा संसदीय सीट और बिष्णुपुर संसदीय सीट। बांकुरा लोकसभा सीट साल 1952 में अस्तित्व में आई थी। पर कांग्रेस के पशुपति मंडल पहली बार सांसद बने। 1957 और 1962 के चुनाव में भी कांग्रेस को ही जीत मिली फिर 1967 में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया ने यहां बाजी मार ली। यह सीट, 1980 से 2000 के दशक तक, वामपंथ का गढ़ बन गई थी। हर बार CPI (M) के बासुदेव आचार्य जीतते रहे।
2014 में CPI ने यहां बाजी पलट दी। TMC नेता मुनमुन सेन को जीत मिली। 2019 में पहली बार बीजेपी कामयाब हुई और सुभास सरकार सासंद चुने गए। 2024 के चुनाव में TMC ने एक बार फिर जीत हासिल की, यहां से अरूप चक्रवर्ती सांसद हैं।
बिष्णुपुर लोकसभा साल 1962 में अस्तित्व में आई थी। पहला चुनाव कांग्रेस जीती, फिर 1971 से लेकर 2009 के चुनावों तक, CPI (M) को जीत मिली। 2014 में TMC ने लेफ्ट का गढ़ छीन लिया,सुस्मिता बउरी सांसद बनीं। 2019 और 2024 के चुनाव में इस सीट पर बीजेपी आई। यहां से सौमित्र खान सांसद हैं।
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2021 का चुनाव कैसा था?
बांकुरा जिले में 12 विधानसभाएं हैं। बांकुराज जिले में भारतीय जनता पार्टी और तृणमूल कांग्रेस में कांटे का मुकाबला रहता है। 2021 के चुनाव में 5 सीटों पर बीजेपी को जीत मिली, वहीं 7 सीटों पर सत्तारूढ़ टीएमसी के प्रत्याशी जीते। सलटोरा (SC) से चंदना बउरी विधायक है। छटना से सत्यनारायण मुखोपाध्याय। दोनों बीजेपी के विधायक हैं। रानीबंध (ST) ज्योत्सना मांडी को जीत मिली, वहीं रायपुर (ST) से मृत्युंजर मुर्मू को जीत मिली। दोनों टीएमसी से हैं। तलदंगरा विधासनभा से टीएमसी के फाल्गुनी सिंहबाबू को जीत मिली तो बांकुरा विधासनभा से बीजेपी के निलाद्रि शेखर दाना ने जीत दर्ज की।
बरजोरा विधानसभा से टीएमसी के आलोक मुखर्जी विधायक हैं, ओंडा विधानसभा से अमरनाथ शाखा वधायक हैं, वह बीजेपी के नेता हैं। बिष्णुपुर से से टीएमसी के तन्मय घोष विधायक हैं। कातुलपुर (SC) से हरकाली प्रोतिहर विधायक हैं। वह टीएमसी से हैं। इंदास (SC) विधानसभा से निर्मल कुमार धारा विधायक हैं, वह बीजेपी से हैं। सोनामुखी (SC) दिबाकर घरामी से बीजेपी विधायक हैं।
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विधानसभा सीटों का इतिहास
सालटोरा: यह विधानसभा अनुसूचित जाति (SC) के लिए आरक्षित है। साल 2011 में यह विधानसभा अस्तित्व में आई थी। पहला चुनाव में टीएमसी को जीत मिली। स्वपन बउरी यहां से चुने गए। 2016 के चुनाव में भी उन्हें ही जीत मिली। 2021 के चुनाव में उन्होंने TMC के संतोष कुमार मंडल को करीब 4 हजार वोटों से हराया था।
छटना: यह विधानसभा भी साल 2011 में अस्तित्व में आई थी। यहां 3 बार अब तक चुनाव हुए हैं, हर बार पार्टी बदल जाती है। 2011 में TMC के शुभाशीष बतब्याल ने जीत हासिल की। उन्होंने रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी के अनाथबंदु मंडल को शिकस्त दी थी। 2016 में धीरेंद्र नाथ लायक ने RSP के टिकट पर चुनाव जीता। 2021 के चुनाव में सत्यनारायण मुखोपाध्याय ने जीत हासिल की। वह बीजेपी से हैं। उन्होंने TMC के सुभाष बतब्याल को करीब 7116 वोटों से हराया। जैसा इस विधानसभा का ट्रेंड है, बाजी पलट सकती है।
रानीबंध: यह विधानसभा 1962 में अस्तित्व में आई थी। पहले चुनाव में CPI को जीत मिली, फिर कभी CPI और कभी कांग्रेस को जीत मिलती रही। यह सिलसिला 1982 तक चला। 1987 से 2011 तक, इस सीट पर सिर्फ CPI (M) को जीत मिली। 2016 और 2021 के चुनाव में TMC की ज्योत्सना मंडी लगातार जीत रहीं हैं।
रायपुर: 1952 में यह विधानसभा अस्तित्व में आई थी। निर्दलीय प्रत्याशी की जीत से विधानसभा की शुरुआत हुई, पहले विधायक जादू नाथ मुर्मू बने। फिर 1962 तक कांग्रेस को जीत मिली। यहां बंगला कांग्रेस और झारखंड पार्टी जैसे दलों को भी जीत मिली है। 1972 में CPI ने जीत हासिल की। 1977 से लगातार 2011 तक, CPI (M) के उपेन किसकू जीतते रहे। 2016 में TMC को यहां पहली बार कामयाबी मिली। 2021 में भी TMC के प्रत्याशी मृत्युंजय मुर्मू जीते।
ताल्डंगरा: साल 2011 में यह विधानसभा अस्तित्व में आई थी। साल 2011 के चुनाव में CPI(M) के मनोरंजन पात्रा ने जीत हासिल की थी। राज्य में सत्ता परिवर्तन की लहर के बाद, 2016 में यहां पहली बार TMC को कामयाबी मिली और समीर चक्रवर्ती विधायक बने।2021 के चुनाव में भी TMC ने अपना दबदबा कायम रखा और अरूप चक्रवर्ती यहां से निर्वाचित हुए। 2024 के उपचुनाव में तृणमूल कांग्रेस की फाल्गुनी सिंहबाबू ने बीजेपी की अनन्या रॉय चक्रवर्ती को हराकर इस सीट पर कब्जा बरकरार रखा।
बांकुरा: 1952 में यह विधानसभा अस्तित्व में आई है। हिंदू महासभा के राखाहरी चटर्जी विधायक 1957 में कांग्रेस, जीती। 1996 तक, कभी लेफ्ट कभी कांग्रेस जीती रही। 2001 में TMC को जीत मिली। 2006 में फिर CPI (M) को जीत मिली। 2011 में TMC, 2016 में कांग्रेस और 2021 में बीजेपी को जीत मिली। नीलाद्री शेखर दाना यहां से विधायक हैं। उन्होंने TMC के सायंतिका बनर्जी को हराकर यह सीट अपने नाम की है।
बरजोरा: यह विधानसभा 1952 में अस्तित्व में आई थी। शुरुआत में कभी कांग्रेस, कभी लेफ्ट के को जीत मिली। 1977 के बाद 2006 तक, लगातार यहां से CPI (M) जीतती रही। 2011 में TMC ने जीत हासिल की, 2016 में लेफ्ट ने फिर बाजी मारी। 2021 के चुनाव में TMC के आलोक मुखर्जी को कामयाबी मिली। 2021 तक, लेफ्ट का जनाधार खिसक चुका था, दूसरे नंबर पर बीजेपी आ गई। आलोक मुखर्जी ने सुप्रीति चटर्जी को 3 हजार वोटों से हराया था।
ओंदा: 2011 में यह विधानसभा अस्तित्व में आई थी। पहली बार TMC के अरूप कुमार खान चुनाव जीते। साल 2016 में भी उन पर ही टीएमसी ने भरोसा जताया। उन्हें जीत मिली। 2021 में पहली बार बीजेपी को जीत मिली। अमरनाथ शाखा ने TMC के अरूप कुमार खान को 11551 वोटों से होरा दिया।
बिष्णुपुर: यह विधानसभा भी 2011 में अस्तित्व में आई थी। TMC के श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जीत हासिल की। 2016 में कांग्रेस को जीत मिली। उन्होंने जीत के बाद पाला बदल लिया और टीएमसी में चले गए। दलदल के तहत गाज गिरी तो एक बार फिर बाजी मार ली। 2021 में भी यही खेल हुआ बीजेपी के टिकट पर जीते तो तन्मय घोष लेकिन टीएमसी में शामिल हो गए। उपचुनाव हुए, फिर उन्होंने बाजी मार ली। जब बीजेपी में थे तो उन्होंने टीएमसी की अर्चिता बीड को 11 हजार वोटों से हराया था। जैसे समीकरण बन रहे हैं, यहां कहा जा सकता है कि जीते कोई भी, जाना उसको टीएमसी में ही है।
कोतुलपुर: यह अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित विधानसभा है। साल 1957 में यह विधासनभा अस्तित्व में आई थी। जगन्नाथ कोले पहली बार विधायक बने। कभी लेफ्ट, कभी कांग्रेस के खाते में यह सीट जाती रही। 1977 से लेकर 2006 तक, यह सीट CPI (M) के पास रही। 2011 में सौमित्र खान ने यह सीट कांग्रेस के टिकट पर जीती। 2014 में उपचुनाव हुए, श्यामल संत्रा को जीत मिली। 2016 में भी वही जीते। 2021 में हरकाली प्रोतिहर को बीजेपी के टिकट पर जीत मिली। वह टीएमसी में शामिल हो गए। 2023 में उपचुनाव हुए तो एक बार फिर उन्हें ही जीत मिली।
इंडास: यह अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित विधानसभा है। 2011 में यह विधानसभा अस्तित्व में आई। 2011 और 2016 में हुए विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस के गुरुपदा मेते चुनाव जीते। साल 2021 में बीजेपी के निर्मल कुमार धारा ने जीत हासिल की। वह बीजेपी से हैं। 2021 के चुनाव में उन्होंने TMC के रुनु मेते को 7 हजार वोटों से हराया था।
सोनामुखी: यह भी अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित विधानसभा है। 2011 में दीपाली साहा यहां से TMC के टिकट पर जीतीं। 2016 में अजित रे CPI (M) से जीते। 2021 में बीजेपी के दिबाकर घारामी ने जीत हासिल की। उन्होंने TMC के श्याम संत्रा को 10888 वोटों से हराया था। इस बार यहां त्रिकोणीय मुकाबले के आसार है।
जिले की स्थिति
क्षेत्रफल: 6882 वर्ग किलोमीटर
साक्षरता दर: 70.95%
विधानसभा सीटें: 12
लोकसभा सीटें: 2
नगर पालिका- 3
ब्लॉक पंचायत-22
ग्राम पंचायत-38
गांव- 5187
विधानसभा सीटें:- 12
BJP-5
TMC-7
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