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बीरभूम: अंगद जैसे जमे हैं TMC के पांव, कैसे हिला पाएगी BJP?

पश्चिम बंगाल का बीरभूम जिला TMC का ऐसा मजबूत गढ़ बन चुका है जहां उसे हरा पाना हर किसी के लिए मुश्किल हो रहा है। पढ़िए कैसे हैं समीकरण।

birbhum district of west bengal

बीरभूम जिला, Photo Credit: Khabargaon

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बीरभूम जिला पश्चिम बंगाल के बर्धमान मंडल का सबसे उत्तरी जिला है। यह जिला, उत्तरी छोर पर गंगा से घिरा है और उत्तर पश्चिम में संथाल परगना की पहाड़ियों से। हिंगलो, बकरेस्वर, ब्राह्मणी, कोपाई जैसी नदियों वाला यह जिला, प्राकृतिक तौर पर बेहद समृद्ध है। यहां तारपीठ मंदिर है, टौगोर का घर शांति निकेतन भी है, जिसे देखने दुनियाभर से लोग यहां आते हैं।  यहां से होकर, गौतम बुद्ध भी गुजरे थे।

 

राजनीतिक नजरिए से यह जिला, तृणमूल कांग्रेस गढ़ है। बंगाली संस्कृति का प्रभाव यहां साफ झलकता है। विधानसभा में 11 सीटें हैं, जिनमें से 10 पर तृणमूल कांग्रेस काबिज है। लोकसभा की 2 सीटें हैं बोलापुर और बीरभूम लोकसभा सीट। दोनों पर तृणमूल कांग्रेस का कब्जा है। एक जमाने में लेफ्ट हावी था लेकिन अब दूर-दूर तक कहीं लड़ाई में ही नहीं है। 

लोकसभा चुनाव की बात करें तो 2014, 19 और 24 के चुनाव में बीरभूम की बोलपुर लोकसभा सीट पर कुछ नहीं बदला। उससे पहले 1985 के उपचुनाव से लेकर 2009 के चुनाव तक, यहां सिर्फ लेफ्ट जीतती रही। डॉ. रामचंद्र डोमे यहां के आखिरी लेफ्ट सांसद थे। 2014 में अनुपम हाजरा और 2019, 2024 के चुनाव में असित कुमार मल जीते। 

 

बीरभूम लोकसभा में भी कुछ ऐसा ही हाल रहा। 1952 से लेकर 1971 तक कांग्रेस यहां से जीतती रही। 1971 में वाम दल सत्ता में आए और 2009 तक यहां से जीतते रहे। 2009 के बाद जितने भी चुनाव हुए, हर हार टीएमसी ने बाजी मारी। साल 2009 से ही यहां की सांसद शताब्दी राय हैं।

 

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बीरभूम में 3 सब डिवीजन हैं, सूरी सदर, बोलपुर और रामपुर हाट। 26 पुलिस स्टेशन, 19 डेवलेपमेंट ब्लॉक, 6 नगर नगरपालिका और 167 ग्राम पंचायतों वाले इस जिले में परिसीमन से पहले 12 विधानसभाएं थीं। 2008 में परिसीमन के बाद एक सीट कम की गई। 

 

बीरभूम ने अकाल और संथाल विद्रोह भी देखा है। 1770 में बंगाल में अकाल पड़ा था, जिसमें गांव के गांव नष्ट हो गए थे। बीरभूम का गठन 1787 में हुआ था। तब यह देवघर तक फैला था। 1857 के विद्रोह तक, यह जिला, संथाल परगना का हिस्सा रहा। 1855 में यहां संथाल विद्रोह हुआ था। यह जिला कृषि प्रधान है, यहां खेती-किसानी खूब होती है। 

2021 के चुनाव में क्या हुआ था?

 

इस जिले की सिर्फ एक विधानसभा सीट भारतीय जनता पार्टी जीत पाई है। 10 विधानसभा सीटें, तृणमूल कांग्रेस के पास हैं। इस जिले में किसी भी दल की नहीं चलती है। जीत का अंतर भी इतना ज्यादा रहता है कि कोई मुकाबले में आसपास नहीं ठहरता है। 

विधानसभा सीटों का इतिहास

दुबराजपुर, अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीट है। यहां से बीजेपी के अनूप कुमार साहा ने 2021 के चुनाव में जीत हासिल की थी। साल 2011 में यह सीट अस्तित्व में आई थी। तब ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक को जीत मिली थी। 2016 में इस सीट पर टीएमसी को कामयाबी मिली, 2021 के चुनाव में बाजी बीजेपी ने मार ली। यहां से अनूप कुमार साहा विधायक हैं। 

सूरी विधानसभा भी TMC का गढ़ है। यहां के विधायक बिकाश रॉय चौधरी हैं। 2011, 2016 और 2021 के चुनाव में TMC को ही जीत मिली। 1977 से 2006 तक, यहां CPI (M) का दबदबा रहा। 1951 से 1972 तक, कभी कांग्रेस, कभी PCPI यहां से जीतती रही।

 

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बोलपुर विधानसभा भी TMC का गढ़ है। यहां बीजेपी जोर आजमाइश की कोशिश तो करती है लेकिन जीत कभी नहीं मिलती है। 1951 में यहां CPI जीती, फिर कभी निर्दलीय, कभी रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवारों को जीत मिली। 1972 में CPI (M) ने जीता। 1977 से लेकर 2006 तक कभी लेफ्ट के दल ही हावी रहे। 1977 से 2006 तक कांग्रेस भी बीच-बीच में जीतती रही। 2011 के बाद सिर्फ टीएमसी जीती। यह सीट, चंद्रनाथ सिन्हा का गढ़ है। 2011 में TMC ने जीत दर्ज की, CPI (M) ने 2016 में TMC से यह सीट वापस हासिल कर ली। 2021 के चुनाव में TMC फिर जीत गई।

 

लाबपुर विधानसभा, कभी CPI (M) का गढ़ थी, अब TMC यहां जीत रही है। यहां के विधायक अभिजीत सिन्हा हैं। 1957 से लेकर 2006 तक, यहां से सिर्फ एक बार 1967 में कांग्रेस जीत पाई। 2011 और 2016 के चुनाव में TMC के मोनिरुल इस्लाम जीते। 2021 में उन्हें टिकट नहीं मिला और अभिजीत सिन्हा (राणा) को टिकट मिला। बीजेपी यहां अभी दमदारी से चुनाव नहीं लड़ पा रही है। 

 

सैंथिया विधानसभा 2011 में अस्तित्व में आई। 2011 के चुनाव में CPI (M) ने बाजी तो मार ली लेकिन 2016 और 2021 के चुनाव में TM को ही जीत मिली। यहां न बीजेपी की दाल गलती है, न ही कांग्रेस की। यहां के विधायक नीलाबती साहा हैं।

 

मयूरेश्वर विधानसभा कई दशक तक CPI का अभेद्य किला रहा लेकिन साल 2016 के चुनाव में ममता बनर्जी की TMC इसे ढहाने में कामयाब हुई। यहां के विधायक अशोक रॉय हैं। 1962 से लेकर 2011 तक, यहां सिर्फ लेफ्ट के विधायक जीते। 

 

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रामपुर हाट विधानसभा सीट पर TMC अजेय है। यहां से आशीष बनर्जी विधायक हैं। ममता बनर्जी के भरोसेमंद मंत्री हैं। साल 2001, 2006, 2011, 2016 और 2021 के चुनाव में उन्होंने लगातार जीत हासिल की। उनसे पहले यह सीट ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक का गढ़ रही है। 1982 से लेकर 1996 तक यहां AIFB की जीत हुई थी। कम्युनिस्ट पार्टी और फॉरवर्ड ब्लॉक की कड़ी प्रतिद्वंद्विता रही है। 

 

हंसान विधानसभा 1967 में अस्तित्व में आई। थी। यह सीट कांग्रेस का गढ़ रही है लेकिन अब TMC जीत रही है। RCPI और AIFB भी यहां से जीतती रही हैं। 1996 से लेकर 2016 तक, यह सीट कांग्रेस के खाते में रही। 2021 मेंअशोक कुमार चट्टोपध्याय विधायक चुने गए। यह तृणमूल कांग्रेस से है।

 

नलहाटी विधानसभा, 1951 से 1962 तक के चुनाव तक, कांग्रेस जीतती रही। 1967 से 1972 तक लगातार 4 बार, निर्दलीय गुलाम मोहिद्दीन चुनाव जीतते रहे। 1977 में फारवर्ड ब्लॉक ने जड़ें जमाईं तो 2006 तक, इसी पार्टी के विधायक बने। 2011 में कांग्रेस, 2013 के उपचुनाव में फिर AIFB और 2021 में पहली बार TMC ने बाजी मारी। यहां से राजेंद्र प्रसाद सिंह विधायक हैं। 
 
मुरारई विधानसभा से मोसर्रफ हुसैन विधायक हैं। 2011 से इस सीट से नूर आलम चौधरी जीते। 2011 और 2016 के चुनाव में भी TMC जीती। समाजवादी, कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियों को भी यहां से जीत मिली है। 

 

ननूर विधासनभा भी तृणमूल कांग्रेस का गढ़ है। बिधान चंद्र माझी यहां से विधायक हैं। यह सीट, 2011 से पहले कांग्रेस और लेफ्ट का गढ़ रही है। अब टीएमसी यहां कामयाब है। 


जिले की स्थिति


क्षेत्रफल- 4545 वर्ग किलोमीटर
साक्षरता दर- 70.9%
विधानसभा सीटें-11
BJP 1। TMC 10 
नगर पालिका-6
ब्लॉक पंचायत-19
ग्राम पंचायत-38
गांव- 2,458
 

 


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