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'तुष्टीकरण' से 'कट मनी' तक, 5 वजहें जिनके चलते दरक गई ममता बनर्जी की जमीन

पश्चिम बंगाल की सत्ता पहली बार ममता बनर्जी ने साल 2011 के विधानसभा चुनाव के बाद संभाली थी। 2026 में वह खुद अपनी विधानसभा सीट से हार गईं।

Mamata Banerjee

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी। Photo Credit: PTI

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पश्चिम बंगाल में साल 2011 के विधानसभा चुनाव से लेकर 2024 के लोकसभा चुनाव तक, कोई एक ताकत ऐसी नहीं थी, जो ममता बनर्जी के सामने टिक सके। पूरे देश में प्रचंड मोदी लहर के बाद भी भारतीय जनता पार्टी, न तो 2016 का विधानसभा चुनाव जीत पाई, न ही 2021 का। तृणमूल कांग्रेस का दबदबा था, जिसे हिलाने में भारतीय जनता पार्टी और टीम नरेंद्र मोदी को 2 चुनाव लग गए।

अब ममता बनर्जी, पश्चिम बंगाल का अतीत हो गईं हैं, जिनकी वापसी फिलहाल मुश्किल है। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC) को करारी हार मिली है। 15 साल सत्ता में रहने के बाद ममता की पार्टी को जनता ने बड़े पैमाने पर नकार दिया। 2024 के लोकसभा चुनाव में TMC ने 42 में से 29 सीटें जीती थीं, लेकिन महज 23 महीनों में सब बदल गया।

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कैसे दरकती गई ममता बनर्जी की जमीन? वजहें समझिए 

  • RG कर रेप कांड: सबसे बड़ा झटका आरजी कर अस्पताल बलात्कार और हत्याकांड मामले की वजह से लगा। अगस्त 2024 में कोलकाता के सरकारी अस्पताल में एक डॉक्टर के साथ बलात्कार हुआ और उसे मार दिया गया। पूरे बंगाल में आक्रोश फैल गया। सरकार ने पहले मामले को सामान्य मामले की तरह पेश किया, फिर इसे राजनीतिक साजिश बता दिया गया। ममता बनर्जी खुद रैली निकालकर न्याय की बात करने लगीं, लेकिन जनता का गुस्सा शांत नहीं हुआ। आरोप लगे कि अस्पताल प्रशासन और TMC नेताओं के बीच गठजोड़ था और सबूत मिटाने की कोशिश हुई।

  • शिक्षक भर्ती घोटाला: ममता बनर्जी की विदाई में भ्रष्टाचार का अहम रोल रहा। अप्रैल 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने 25,000 से ज्यादा शिक्षकों की नियुक्ति रद्द कर दी। कोर्ट ने कहा कि पूरा चयन प्रक्रिया भ्रष्टाचार से भरी हुई थी। पूर्व शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी से जुड़े ठिकानों पर बरामद नोटों के बंडलों की तस्वीरें फिर से याद आईं। ममता सरकार ने बर्खास्त शिक्षकों को राहत देने का वादा किया, लेकिन भ्रष्टाचार का दाग साफ नहीं हो सका।

  • सिंडिकेट वाला नैरेटिव: भारतीय जनता पार्टी, यह स्थापित करने में कामयाब रही कि ममता बनर्जी सरकार में कट मनी कल्चर और कैडर गुंडागर्दी चरम पर है। उनकी हार का तीसरा कारण शासन की नाकामी और सिंडिकेट रहा। टीएमसी पर आरोप लगा कि पार्टी के नेता हर काम में कमीशन लेते हैं। सड़क, निर्माण, फिल्म इंडस्ट्री तक सब पर सिंडिकेट का कब्जा बताया गया। राज्य में बड़े उद्योग नहीं आए, नौकरियां नहीं बनीं। लोगों में नाराजगी बढ़ती गई।

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  • अल्पसंख्यक वोटों में सेंध: ममता बनर्जी, खुद को अल्पसंख्यकों का सबसे बड़ा हितैषी बताती हैं। उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस, अल्पसंख्यक राजनीति करते हैं, टीएमसी के नेता, खुद को अल्पसंख्यकों का संरक्षक बताते हैं। इस बार उनका भी भरोसा दरका। इस बार पूर्व TMC विधायक हुमायूं कबीर की पार्टी और इंडियन सेकुलर फ्रंट ने कुछ सीटों पर वोट काटे। इससे ममता के अल्पसंख्यक वोट बैंक में सेंध लगी। वहीं हिंदू वोट BJP के पक्ष में मजबूती से जुड़े। सयानी घोष जैसे नेताओं के गानों ने हिंदुओं के एकजुट होने में और अहम भूमिका निभाई। 

  • विकास, शासन से भटकी, राजनीति पर अटकी TMC: ममता बनर्जी के हारने की एक वजह, उनकी आक्रामक राजनीति भी है। जिसे उनकी राजनीतिक खासियत लोग समझते हैं, बंगाल के लोग, उससे असहज हो गए। वह केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार से सीधे भिड़ती थीं, बाहरी बनाम मां, माटी और मानुष की राजनीति शुरू की। साल 2011 में जो गलती वामपंथी दलों से हुई थी, वही खुद ममता बनर्जी कर बैठीं। उन्होंने वामपंथी सरकार को हराकर सत्ता हासिल की थी, लेकिन खुद की पार्टी को काबू में नहीं रख पाईं। पार्टी सरकार से ऊपर हो गई। विकास और शासन की बजाय राष्ट्रीय राजनीति पर ध्यान दिया गया। शहरों में लोगों को यह रवैया पसंद नहीं आया। वह मछली, मांस और हिंदुत्व को लेकर बीजेपी को घेरती रहीं लेकिन अपनी जमीन दरक गई।


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