चुनावी जीत के लिए हजारों करोड़ का दांव, अपने 'कल्याण' पर सरकारों का जोर
पांच राज्यों के चुनाव से पहले हर राज्य सरकार ने हजारों करोड़ की ऐसी योजनाएं शुरू की हैं जिनके जरिए मतदाताओं को प्रत्यक्ष रूप से पैसे बांटे जा रहे हैं।

चुनाव से पहले कैश ट्रांसफर वाली योजनाओं पर जोर, Photo Credit: Sora AI
मौजूदा वक्त में देश के चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में चुनाव हो रहे हैं। चुनाव से ठीक पहले समाज के बड़े वर्गों को टारगेट करके अलग-अलग योजनाओं के तहत उन्हें पैसे देना राजनीतिक दलों के लिए फायदेमंद साबित हो रहा है। महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, बिहार और हरियाणा के बाद अब इन सभी राज्यों में अलग-अलग दलों की सरकारों ने ऐसी ही योजनाओं के तहत मोटी रकम खर्च करना शुरू कर दिया है। इस चुनाव में असम की सरकार ने महिलाओं के खाते में 9000 रुपये, तमिलनाडु की सरकार ने महिलाओं के खाते में 4 हजार रुपये, केरल सरकार ने 1000 रुपये और पश्चिम बंगाल सरकार हर महीने 1500 रुपये दे रही है।
रोचक बात यह है कि इन योजनाओं का एलान चुनाव से ठीक पहले किया गया है। पहले भी देखा गया है कि ऐसी योजनाओं के चलते राज्य सरकारों पर अतिरिक्त बोझ बढ़ा है लेकिन चुनावी नतीजों में फायदा मिलता देख सभी सत्ताधारी दलों ने इस फॉर्मूले को आजमाया है। भारतीय जनता पार्टी (BJP), कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, जनता दल (यूनाइटेड), झारखंड मुक्ति मोर्चा और आम आदमी पार्टी ने अपनी-अपनी सरकारों के जरिए ऐसी योजनाएं शुरू की हैं जिनके जरिए सीधे पैसे ट्रांसफर किए जा रहे हैं।
दांव पर हजारों करोड़
तमिलनाडु ने पोंगल गिफ्ट के नाम पर सिर्फ मार्च महीने में 13000 करोड़ रुपये खर्च किए हैं। इस योजना के तहत राशनकार्ड धारकों को 3000 रुपये नकद, चावल, चीनी और गन्ना बांटा गया है। इस योजना के तहत तमिलनाडु की स्टालिन सरकार ने 2.22 करोड़ से ज्यादा परिवारों तक लाभ पहुंचाया है। इसी तरह पश्चिम बंगाल ने महिलाओं को 1500 रुपये देने के लिए 3000 करोड़ रुपये खर्च किए। असम की हिमंत बिस्व सरमा की सरकार ने महिलाओं के खाते में 9000 रुपये डालने के लिए 3600 करोड़ रुपये एक दिन में खर्च किए। यह सब कुछ चुनावी आचार संहिता लागू होने से ठीक पहले किया गया।
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इसकी बड़ी वजह यह है कि बीते कुछ साल में राजनीतिक दलों ने महिलाओं को एक अलग वोटबैंक की तरह देखा है। महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में पीछे दिख रही बीजेपी की जीत ने यह साबित भी किया कि यह दांव चुनावी जीत दिलाने में कामयाब है। यही वजह है कि जिन राज्यों में प्रत्यक्ष लाभ वाली योजनाएं शुरू की गईं, उनमें महिलाओं को ही केंद्र रखा गया।
तमिलनाडु की स्टालिन सरकार ने पोंगल गिफ्ट योजना के तहत जो 3000 करोड़ रुपये खर्च किए हैं, वह राज्य पर काफी भारी पड़ने वाला है। दरअसल, इस योजना के तहत दिए जाने वाले कैश के लिए ही 6936 करोड़ रुपये खर्च होने हैं जो राज्य के टैक्स रेवेन्यू के लगभग 3 प्रतिशत के बराबर है। इसी के कुछ दिन पहले ही डीएमके सरकार ने 1.3 करोड़ महिलाओं के खाते में 5000 रुपये भी भेजे थे। इस तरह कुल 9556 करोड़ रुपये स्टालिन सरकार ने इसी साल ऐसी योजनाओं पर ही खर्च कर डाले हैं।
ऐसी योजनाओं के मामले में सिर्फ सत्ताधारी दल ही आगे नहीं हैं। विपक्षी पार्टियों ने भी ऐसे वादे किए हैं। तमिलनाडु की मुख्य विपक्षी पार्टी AIADMK ने तो मुफ्त में फ्रिज बांटने का एलान किया है। पहली बार चुनाव में उतरे थलपति विजय की पार्टी ने महिलाओं को 2500 रुपये देने का एलान किया है। उनके वादों में सिल्क साड़ी, शादी के लिए सोना, नवजात लड़कियों के लिए सोने की अंगूठी और सरकारी बसों में मुफ्त यात्रा जैसी चीजें शामिल हैं।
सत्ता बचाने की कोशिश में BJP वाला दांव खेल रहीं ममता
लगातार 15 साल से पश्चिम बंगाल की सत्ता पर काबिज ममता बनर्जी के लिए यह चुनाव काफी अहम माना जा रहा है। ऐसे में महिला मतदाताओं को अपने साथ बनाने रखने के लिए उन्होंने भी BJP वाला दांव चला है। ममता बनर्जी ने चुनावी साल में महिलाओं में को दी जाने वाली मासिक सहायता को 500 से बढ़ाकर सामान्य वर्ग की महिलाओं के लिए 1500 रुपये और SC-ST महिलाओं के लिए 1700 करने का एलान कर दिया। इसके जरिए 2.2 करोड़ महिलाओं को पैसे मिलते हैं। 500 से 1500 और 1700 रुपये करने के चलते राज्य के 13,200 करोड़ रुपये अतिरिक्त खर्च होंगे।
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इसी की तरह ममता बनर्जी ने युवाओं के लिए भी एक योजना शुरू की है। इसके तहत 21 से 40 साल के बेरोजगार युवाओं को हर महीने 1500 रुपये दिए जाएंगे। इसके लिए शुरुआती तौर पर ही 5000 करोड़ रुपये का बजट रखा गया है। इन योजनाओं के अलावा ममता बनर्जी ने आखिरी वक्त में आंगनवाड़ी कार्यकताओं के लिए हर महीने 1000 रुपये देने का एलान किया है। इस पर 280 करोड़ रुपये खर्च होंगे। अगर पश्चिम बंगाल की ऐसी योजनाओं का हिसाब लगाएं तो यह करीब 18,600 करोड़ रुपये तक पहुंच जाता है।
असम में पैसों के सहारे जीत की तैयारी?
असम में पिछले 10 साल से बीजेपी की सरकार है। 5 साल से मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा के लिए यह चुनाव बेहद आसान माना जा रहा है लेकिन आखिरी वक्त में उन्होंने भोग बिहू योजना के तहत प्रदेश की 40 लाख महिलाओं के खाते में 9-9 हजार रुपये भेजे हैं। एक ही दिन में सभी महिलाओं के खाते में पैसे भेजने के चलते कुल 3600 रुपये खर्च किए गए। यह पैसा राज्य को टैक्स से होने वाली कमाई के 10 प्रतिशत के बराबर है। यानी जितनी कमाई टैक्स से होती है उसका 10वां हिस्सा एक ही दिन में खर्च कर दिया गया।
केरल की लेफ्ट सरकार ने सामाजिक सुरक्षा पेंशन को 1600 से बढ़ाकर 2000 रुपये कर दिया है। विधवा, बुजुर्ग और दिव्यागों को मिलने वाली इस पेंशन के कुल 62 लाख लाभार्थी हैं। यानी 400 रुपये की इस बढ़ोतरी से राज्य के 2976 करोड़ रुपये अतिरिक्त खर्च होंगे। इसके अलावा केरल ने गरीब महिलाओं को हर महीने 1000 रुपये देने वाली योजना की भी शुरुआत की है। इस पर 3800 करोड़ रुपये सालाना खर्च होंगे।
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इस तरह के खर्च में पुडुचेरी भी पीछे नहीं है। पुडुचेरी ने पोंगल गिफ्ट के तौर पर 3.47 लाख परिवारों को 3000 रुपये देने और अन्य चीजें बांटीं। इसमें से सिर्फ कैश के लिए पुडुचेरी के 104 करोड़ रुपये खर्च होंगे और पूरी योजना पर कुल 130 करोड़ रुपये खर्च होंगे।
हिट फॉर्मूला, अनफिट इकॉनमी
यह फॉर्मूला चुनाव जीत के लिए तो बेहद हिट हो गया है। अब देश के 15 राज्यों में योजनाएं चल रही हैं। लगभग 13 करोड़ से ज्यादा महिलाएं ऐसी योजनाओं की लाभार्थी हैं और सालान इन योजनाओं पर लगभग 2.46 लाख करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं। यह भी पाया गया है कि कई राज्यों को अपनी विकास योजनाओं का खर्च कम करके इन योजनाओं पर पैसे खर्च करने पड़ रहे हैं।
इसी साल फरवरी के महीने में देश की सर्वोच्च अदालत ने भी ऐसी योजनाओं के लिए राज्यों की आलोचना की थी। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने कहा था कि घाटे और कर्ज में चल रही सरकारें भी मुफ्त वाली योजनाएं ला रही हैं।
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