पूरे भारत में शनिवार को ईद-उल-फित्र बड़े उत्साह से मनाई गई। लोग नमाज पढ़कर, मीठी चीजें बांटकर और परिवार के साथ मिलकर खुशियां मना रहे थे लेकिन उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले में बड़ोसराय इलाके के किंतूर गांव में ऐसा नहीं हुआ। यहां शिया समुदाय ने इस बार ईद पर खुल के खुशियां नहीं मनाईं। कोई उत्सव नहीं, कोई मिठाई नहीं, कोई गले मिलना नहीं।
इसकी वजह ईरान से जुड़ी है। 1 मार्च को अमेरिका और इजरायल के हवाई हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई की मौत हो गई। इससे शिया मुसलमानों पर बहुत गहरा असर पड़ा है, खासकर किंतूर गांव में रहने वाले लोगों पर।
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गांव वालों ने ईद नहीं मनाई
गांव के लोग खुशी मनाने की बजाय शोक मना रहे थे। इमामबाड़ा के प्रबंधक सरवर अली ने बताया, 'इस साल शिया परिवारों ने कोई उत्सव नहीं मनाया। घर में सिवइयां नहीं बनाईं, कोई गले नहीं मिले। सिर्फ सामूहिक नमाज पढ़ी गई। साथ ही, एक शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन भी किया गया।'
लोग न सिर्फ नमाज के लिए बल्कि ईरान पर हुए हमले के खिलाफ गुस्सा जताने के लिए भी इकट्ठा हुए। उन्होंने इजरायल के खिलाफ नारे लगाए, लेकिन सब कुछ शांतिपूर्ण रहा।
गांव मे मातम का माहौल
गांव के डॉ. रेहान काज़मी ने कहा कि पूरे गांव में उदासी छाई हुई है। खामेनेई की मौत से सबको बहुत दुख है। किंतूर गांव का ईरान से पुराना रिश्ता है। यहां के लोग कहते हैं कि उनके पूर्वज आयतुल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी से जुड़े हैं। खुमैनी ईरान की 1979 की इस्लामी क्रांति के नेता थे और इस्लामिक गणराज्य के संस्थापक भी थे। खामेनेई उनके शिष्य थे और 1989 में खुमैनी की मौत के बाद उन्होंने उनकी जगह ली।
पूर्वज गए थे ईरान
गांव के निवासी सैयद निहाल अहमद काज़मी का कहना है कि उनके पूर्वज मुसवी 1834 में भारत की आजादी की लड़ाई में हिस्सा लेने के बाद ईरान गए थे। ब्रिटिश सरकार की पाबंदियों की वजह से वे वापस नहीं आ सके और ईरान के खुमैन शहर में बस गए। वहीं बाद में खुमैनी का जन्म हुआ।
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कई लोगों के लिए यह रिश्ता सिर्फ इतिहास नहीं, बल्कि भावनाओं का है। खामेनेई को खुमैनी का उत्तराधिकारी मानकर लोग उन्हें बहुत सम्मान देते थे। इसलिए इस ईद पर गांव में शोक की लहर थी। लोग ईरान के साथ एकजुटता दिखा रहे थे।