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कार्ल मार्क्स: मजदूरों का मसीहा, जिसके अनुयायी बन गए 'तानाशाह'

इस शख्स को दुनिया की हर व्यवस्था से चिढ़ थी। हर संस्था आलोचना के दायरे में थी। ये एक ऐसी दुनिया चाहते थे जिसके संसाधनों पर समुदाय का हक हो। कोई भी संपदा, किसी व्यक्ति की संपदा न हो।

Karl Marx

कार्ल मार्क्स की ये मूर्ति जर्मनी के ट्रियर शहर में है. (फोटो क्रेडिट- www.flickr.com, फोटोग्राफर-Max Gerlach)

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राजनीति के क्रांतिकारी दार्शनिकों का जिक्र करें और कार्ल मार्क्स का नाम न आए, ऐसा हो नहीं सकता है। रूस से लेकर चीन तक, इनकी दिखाई राह पर क्रांतिकारियों ने चलने की कोशिश की लेकिन जो नतीजा निकला, वह मानवीय इतिहास पर किसी धब्बे की तरह रहा। कार्ल मार्क्स पश्चिमी जर्मनी के ट्रियर में 5 मई 1818 को पैदा हुए थे। उन्होंने अपने 6 दशक के जीवन काल में दुनिया को एक नई विचारधारा दी, जिसे 'मार्क्सवाद' कहा गया। \

कार्ल मार्क्स ने सामाजिक-राजनीतिक जीवन में कई सूत्र गढ़े। वे दुनिया के सबसे चर्चित विचारकों में से एक बने, लेकिन उनके बनने की कहानी क्या है, आइए जानते हैं। कार्ल मार्क्स का जन्म एक यहूदी परिवार में हुआ था। उनके पिता चर्चित वकील थे। कार्ल मार्क्स भी कानून की पढ़ाई करने बॉन और बर्लिन चले गए। वे फ्रेडिक हेगल की विचारधारा से शुरुआती दिनों में बेहद प्रभावित रहे।

साल 1941 में उन्होंने जेना यूनिवर्सिटी से पीएचडी की उपाधि हासिल की। कार्ल मार्क्स अपने दौर के चर्चित पत्रकारों और लेखकों में से एक रहे। उन्होंने एक उदारवादी अखबार कोलोंग निकाला। कार्ल मार्क्स अपनी पत्नी जेनी के साथ पेरिस चले गए। उस जमाने में पेरिस कट्टरपंथी विचारों का केंद्र हुआ करता था। 

 

एक दोस्त ने बदल दी मार्क्स की दुनिया

कार्ल मार्क्स क्रांतिकारी कम्युनिस्ट के तौर पर उभरे। यहीं उनकी दोस्ती फ्रेडरिक एंगेल्स के साथ हुई। वे अपने विचारों को लेकर इस हद तक कट्टर रहे कि उन्हें फ्रांस से भागना पड़ा। मार्क्स दो साल ब्रूसेल्स में भी रहे। फ्रेडरिक एंगेल्स और मार्क्स ने यहां भी मिलकर कई लेख लिखे। दोनों ने मिलकर एक किताब लिखी 'कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो।' यह किताब साम्यवादियों के लिए गीता और कुरान की तरह है। साल 1848 तक, इस किताब का प्रकाशन हुआ। इस किताब ने बुर्जुआ और सर्वहारा जैसे शब्दों को लोकप्रिय बना दिया। एक वर्ग जो हमेशा संघर्ष करेगा, एक वर्ग जो हमेशा शोषण करेगा। उन्होंने वर्ग संघर्ष की पूरी जद्दोजहद को निशाना बनाया और इसे खत्म करने के लिए अपने विचार दिए। 

आर्थिक तौर पर आजीवन संकट झेलते रहे मार्क्स
बुर्जुआ पूंजीपतियों को कहा गया, सर्वहारा मजदूरों को, जिनका वर्ग संघर्ष हमेशा से चलता आया है। कार्ल मार्क्स ने ब्रुसेल्स भी छोड़ दिया। वे 1849 में लंदन चले आए। उन्होंने यहां अपनी पूरी जिंदगी बिताई। कार्ल मार्क्स, पूरी जिंदगी आर्थिक मुश्किलों से जूझते रहे, उनके दोस्त फ्रेडरिक एंगेल्स समृद्ध थे, उन्हें आर्थिक तौर पर मदद देते रहे।

ऐसे मिला गरीबों को अपना बाइबिल
कार्ल मार्क्स अब अपने जीवन की सबसे अमूल्य कृति लिख रहे थे। उन्होंने अभावों से जूझते ही एक किताब लिखी, जो दुनिया की सबसे चर्चित किताबों में से एक है, 'दास कैपिटल।' पूंजीवाद के बुनियादी सिद्धांतों के खिलाफ लिखी गई ये किताब, साम्यवादियों के लिए संविधान है। इसे सर्वहारा वर्ग के 'बाइबिल' का दर्जा मिला। इसके कई संस्करण आए, जिन्हें उनके खास दोस्त एंगेल्स ने संपादित किया। 

कार्ल मार्क्स अपने जीवन के अंतिम दिनों में टूट चुके थे। वे सामाज के लिए लेख लिख रहे थे, अपने विचारों को आकार दे रहे थे लेकिन भीतर से टूट रहे थे। कार्ल मार्क्स की पत्नी का साल 1881 में निधन हो गया था, जिसके बाद वे मनोवैज्ञानिक रूप से बेहद कमजोर पड़ गए थे। उनकी एक बेटी की भी मौत हो गई थी। अपनों की मौत उनसे बर्दाश्त नहीं हो पाई। 14 मार्च 1883 को उन्होंने भी दम तोड़ दिया। लंदन के हाईगेट कब्रिस्तान में उन्हें दफनाया गया है। कार्ल मार्क्स ने महिलाओं, बेसहारा लोगों और मजदूरों के लिए जो किया, उसे दुनिया आज भी भूल नहीं पाई है।

क्यों कार्ल मार्क्स को याद रखना चाहिए?
कार्ल मार्क्स का सिद्धांत, व्यक्तिवाद के खिलाफ था और वे चाहते थे कि संपत्तियां सार्वजनिक हों। उन्होंने जो कहा कि वह आदर्श स्थिति जैसी है, जिसे युटोपिया भी कह सकते हैं। उन्होंने कहा कि राज्य की संपत्तियों पर अधिकार राज्य का होना चाहिए, न कि किसी व्यक्ति का। उन्होंने कहा कि इसका एक समान बंटवारा होना चाहिए, न किसी को कम मिले, न किसी को ज्यादा। उन्होंने कहा कि पूंजीवाद को समाजवाद की ओर ले जाने की जरूरत है। कार्ल माक्स, एक सीमा रहित, वर्ग रहित समाज चाहते थे। वे चाहते थे कि संसाधनों पर राज्य का नियंत्रण हो।

क्या हैं कार्ल मार्क्स के सिद्धांत की कमियां?
कार्ल मार्क्स ने राज्य का जो सिद्धांत दिया है, वह किसी एक पार्टी को इतना ताकतवर बना देता है, जिससे राज्य पर उसका अधिग्रहण हो जाता है। यह एक हद तक तानाशाही को बढ़ावा देता है। राज्य इतना ताकतवर हो जाता है और समुदाय में कोई भी प्रतिरोध करने की स्थिति में नहीं रह जाता है। चीन, रूस और क्यूबा जैसे देश इसके उदाहरण हैं। ये मूलत: अपने आपको साम्यवादी देशों की लिस्ट में रखते हैं कि यहां दशकों से तानाशाही फैली हुई है। ऐसा नहीं है कि ये देश, गरीबों के लिए स्वर्ग की तरह है। यहां धीरे-धीरे राज्य की ताकतें अनियंत्रित तरीके से बढ़ीं, लालफीताशाही जैसी स्थिति बनी और जनता शोषित की शोषित ही रह गई।

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