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1950 से चली आ रही यह दुकान, पेन हाउस से लाहौर वॉच कंपनी बनने तक का सफर

1950 में अपनी स्थापना के साथ, लाहौर वॉच कंपनी को पहले 'लाहौर पेन हाउस' के रूप में जाना जाता था, जिसमें पेन और घड़ियों का कारोबार शामिल था।

the history of Lahore watch company

पेन हाउस से लाहौर वॉच कंपनी बनने तक का सफर

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आज भले ही टाइम देखने के लिए स्मार्टफोन हो लेकिन जो बात कलाई में बंधी घड़ी में है, वो मोबाइल में कहा? घड़ी एक ऐसी एक्सेसरीज है जो आपकी पर्सनैलिटी को और भी आकर्षक बना देती है और शायद इसलिए घड़ी के प्रति आज भी लोगों में आकर्षण बरकरार है। करोल बाग के गफ्फार मार्केट में स्थित लाहौर वॉच कंपनी (Lahore Watch Co.) घड़ी की दुकान पर पहुंचते ही घड़ी के शौकीनों की भीड़ देख आपको इस बात का एहसास भी हो जाएगा।

 

लाहौर पेन हाउस था पहले नाम 

1950 में अपनी स्थापना के साथ, लाहौर वॉच कंपनी को पहले 'लाहौर पेन हाउस' के रूप में जाना जाता था, जिसमें पेन और घड़ियों का कारोबार शामिल था। हालांकि, समय के साथ झुकाव घड़ियों की ओर हुआ और बाद में इस दुकान पर घड़ियों के कई ब्रांड को रखना शुरू कर दिया गया।

 

कितनी पुरानी है यह दुकान?

इस दुकान में आपको एक से बढ़कर एक एंटीक और लेटेस्ट घड़ियों की चमक देखने को मिल जाएगी और आप खुद को इसे खरीदने से रोक नहीं पाएंगे। 74 वर्ष पुरानी इस दुकान पर हाथ और दीवार घड़ी का बेहतरीन कलेक्शन देखने को मिल जाएगा। लाहौर वॉच कंपनी की स्थापना सबसे पहले राज चंद्योक ने की थी, जिन्होंने घड़ियों के कारोबार और मार्केटिंग के प्रति अपने जुनून के साथ अपनी कंपनी को नई ऊंचाइयों पर ले जाने का विजन विकसित किया। अगर आप भी घड़ी का शौक रखते हैं तो आपको इस दुकान पर लिमिटेड एडिशन की कई घड़ियां मिल जाएंगी।

 

लाहौर पेन हाउस से लाहौर वॉच कंपनी तक का सफर

अब 83 साल के हो चुके राज चंद्योक 9 साल की उम्र में दिल्ली आए थे लेकिन वह अपने दिमाग से लाहौर को निकाल नहीं पा रहे थे। उनके पिता सितंबर 1947 में लाहौर से दिल्ली आए और कुछ महीने बाद अजमल खान रोड पर एक छोटी सी दुकान में स्टेशनरी बेचने लगे और इसका नाम लाहौर पेन हाउस रखा। 1950 के दशक में उनके परिवार ने अपना काम गफ्फार मार्केट में शिफ्ट कर दिया। उसी साल इन लोगों ने घड़ियां बेचने का बिजनेस किया और दुकान का नाम बदलकर लाहौर वॉच कंपनी रख दिया, जो आज घड़ी की सबसे पुरानी दुकानों में से एक बन गई है।

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