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तिरंगे और राष्ट्रगान सा वंदे मातरम् का मान, अपमान किया तो खानी होगी जेल की हवा

अब 'वंदे मातरम्' का अपमान करना भारी पड़ सकता है। केंद्रीय कैबिनेट ने राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971 में संशोधन के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है।

Vande Mataram Prevention of Insults to National Honour Act 1971

वंदे मातरम से सजा हुआ बोर्ड, Photo Credit: PTI

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केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम्' के सम्मान को और मजबूत करने के लिए बड़ा कदम उठाया है। केंद्रीय कैबिनेट ने प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है, जिसके तहत अब वंदे मातरम् के गायन में जानबूझकर बाधा डालना दंडनीय अपराध माना जाएगा। इस फैसले के बाद राष्ट्रीय गीत को भी वही कानूनी सुरक्षा मिलेगी, जो राष्ट्रीय गान 'जन गण मन' को प्राप्त है।

 

इस संशोधन के लागू होने के बाद वंदे मातरम् और जन गण मन दोनों को कानून के तहत समान सम्मान मिलेगा। यानी अब इन राष्ट्रीय प्रतीकों के अपमान या उनके कार्यक्रमों में बाधा डालने पर सख्त कार्रवाई की जाएगी। सरकार का कहना है कि यह कदम देश की सांस्कृतिक एकता और राष्ट्रीय सम्मान को मजबूत करेगा।

 

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कानून में बड़ा बदलाव

फिलहाल 1971 के राष्ट्रीय सम्मान अपमान निवारण अधिनियम के तहत राष्ट्रीय ध्वज, संविधान और राष्ट्रीय गान का अपमान अपराध माना जाता है। इसमें दोषी पाए जाने पर अधिकतम 3 साल तक की जेल या जुर्माना हो सकता है। अब इस कानून में संशोधन कर वंदे मातरम् को भी शामिल किया जाएगा। सरकार के अनुसार, अगर कोई व्यक्ति जानबूझकर वंदे मातरम् के गायन में बाधा डालता है या उसका अपमान करता है तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी। यह संशोधन संसद की मंजूरी के बाद लागू होगा और इसके बाद यह राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावी हो जाएगा।

 

पूर्व केंद्रीय मंत्री और BJP सांसद अनुराग ठाकुर ने इस फैसले का स्वागत किया है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह को धन्यवाद देते हुए कहा कि यह लंबे समय से उठाई जा रही मांग थी और हर भारतीय के लिए गर्व का विषय है।

 

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ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व

गृह मंत्रालय पहले ही निर्देश दे चुका है कि जब वंदे मातरम् और राष्ट्रीय गान एक साथ हों तो पहले वंदे मातरम् का पूरा गायन किया जाएगा। यह गीत स्वतंत्रता संग्राम में अहम भूमिका निभा चुका है और इस वर्ष यह अपने 150वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। सुप्रीम कोर्ट भी इस मुद्दे पर दायर याचिका को खारिज कर चुका है और इसे अनिवार्य नियम बनाने के लिए समय से पहले की मांग बताया था। संविधान सभा ने 1950 में इसे राष्ट्रीय गान के बराबर सम्मान देने का निर्णय लिया था।


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