यूपी में महिलाओं के खिलाफ अपराध, 'जातीकरण' का रूप कैसे ले रहे हैं?
उत्तर प्रदेश में महिलाओं के खिलाफ हो रहे अपराधों का तेजी से सियासीकरण और जातीकरण हो रहा है, जिसका सीधा संबंध 2027 के चुनाव से है।

अखिलेश यादव, योगी आदिस्यनाथ और स्वामी प्रसाद मौर्या।
उत्तर प्रदेश में पिछले दिनों महिलाओं के खिलाफ दुष्कर्म के दो बड़ा मामले सामने आए। पहला मामला पूर्वी यूपी के गाजीपुर जिले का है। गाजीपुर के करंडा थाना क्षेत्र में कटरिया गांव आता है। यहां पिछले महीने अप्रैल में विश्वकर्मा जाति की एक नाबालिग के साथ दुष्कर्म किया गया था, जिसका बाद में गंगा नदी में शव बरामद किया गया। लड़की 14 अप्रैल की रात गायब हो गई थी। सनसनी फैलने के बाद खोजबीन हुई को 15 अप्रैल की सुबह लाश नदी में मिली।
पहले मामले को दबाया गया लेकिन मृतका के परिवार ने दुष्कर्म के बाद हत्या करने का आरोप लगाया। आरोप लगा उच्च जाति के लड़कों पर। मामले में दो मुख्य आरोपी हैं हरिओम पांडे और अभिषेक पांडे। पुलिस ने दोनों को गिरफ्तार कर लिया है। पुलिस ने पहले इस केस में आत्महत्या मानकर कार्रवाई शुरू की थी लेकिन मृतका के परिजनों के दबाव के बाद हत्या का केस लिखा गया।
फतेहपुर का मामला क्या है?
दूसरा मामला फतेहपुर जिले का है। हम सबसे पहले गाजीपुर केस के बारे में बात करते हैं। दरअसल, फतेहपुर के खागा कोतवाली क्षेत्र में एक 22 साल की युवती अपने मंगेतर के साथ कहीं जा रही थी। तभी गर्मी के कारण आराम करने के लिए जंगल में रुक गए। इसी समय तीन मनचले वहां पहुंचे और मंगेतर को पीटा और उसे बंधक बना लिया। मंगेतर को बंधन बनाने के बाद सभी दरिंदों ने युवती के घंटों तक सामूहिक दुष्कर्म किया। घटना का वीडियो भी बनाया गया और दोनों को जान से मारने की धमकी दी गई। इतना ही नहीं दरिंदों ने मंगेतर से ऑनलाइन पैसे भी ट्रांसफर करवा लिए।
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शुरुआत में पुलिस ने शिकायत दर्ज नहीं कर रही थी। तीनों आरोपियों में से एक बीजेपी का नेता है और वह फरार है। पुलिस ने उसपर एक लाख रुपये का इनाम घोषित किया है। वहीं, दो आरोपी गिरफ्तार कर लिए गए हैं। मुख्य आरोपी का नाम बबलू सिंह है।
इन दोनों घटनाओं में पहली पीड़िता विश्वकर्मा जाति और दूसरी पीड़िता मौर्या जाति से आती हैं। ऐसे उत्तर प्रदेश में महिलाओं के खिलाफ हो रहे अपराधों का तेजी से 'सियासीकरण' और 'जातीकरण' हो रहा है। इन दोनों की घटनाओं को 2027 के चुनावी चश्मे से देखा जा रहा है। विपक्ष यूपी में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर और निचली जातियों के दमन का मुद्दा उठा रहा है। वहीं, सरकार इन मामलों में फूंक कर कदम आगे बढ़ा रही है। हालांकि, दोनों मामले हाई प्रोफाइल हो गये हैं, जिसकी वजह से पुलिस मुस्तैदी से केस की जांच कर रही है।
गाजीपुर मामले में सियासत
गाजीपुर जिले के कथित दुष्कर्म और हत्या की खबर जैसे ही सोशल मीडिया पर फैली सबकी निगाहें पीड़िता 'विश्वकर्मा' यवती पर गड़ गईं। ऐसे में समाजवादी पार्टी ने निशा और उसके परिवार से बात करने और उन्हें न्याय दिलाने के लिए 22 अप्रैल को कटरिया गांव में अपना प्रतिनिधिमंडल भेजा। सपा प्रतिनिधिमंडल 22 अप्रैल को जब मृतक के गांव पहुंचा तो सपा नेताओं पर जमकर पथराव हो गया और गांव में हिंसा हुई।
इस पथराव में कई सपा के नेता और इंस्पेक्टर-पुलिसवाले घायल हो गए। क्योंकि मामला एक विश्वकर्मा समाज की लड़की की मौत से जुड़ा है और आरोपी सवर्ण समाज से हैं तो ऐसे में मामला अगड़ा बनाम पिछड़ा हो गया है। यही नहीं पथराव की घटना में मामला यूपी की राजनीति में सत्ता बनाम विपक्ष की बड़ी लड़ाई का बन गया। समाजवादी पार्टी इस मामले को लेकर सीधे सरकार पर हमलावर है।
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इस मामले को सपा प्रमुख अखिलेश यादव और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने भी उठाया और पीड़िता के लिए सरकार ने न्याय की मांग की। राहुल गांधी ने कहा कि गाजीपुर में विश्वकर्मा समाज की बेटी के साथ बलात्कार घटना एक पैटर्न बन गया है। मणिपुर की बेटी ने न्याय की राह देखते-देखते दम तोड़ दिया। उन्होंने कहा, 'हर बार वही चेहरा- पीड़िता दलित, पिछड़ी, आदिवासी, गरीब। हर बार वही सच्चाई- अपराधी को संरक्षण, पीड़ित को प्रताड़ना। हर बार वही चुप्पी- सत्ता की, जिन्हें बोलना चाहिए था।' राहुल गांधी के इस बयान के बाद कांग्रेस ने भी अपना प्रतिनिधिमंडल गाजीपुर में पीड़िता के घर भेजने का फैसला किया है।
फतेहपुर मामले में सियासत
फतेहपुर में पीड़िता फतेहपुर समाज की है और मुख्य आरोपी राजपूत समाज से है। ऐसे में इसको लेकर भी राजनीतिक बयानबाजियां तेज हो गई हैं। इसी वजह से यह मामला जातीय सम्मान और सामाजिक न्याय के मुद्दे से भी जुड़ गया। विपक्ष योगी सरकार के ऊपर कानून-व्यवस्था को लेकर जमकर हमला कर रहा है। विपक्षी नेता स्वामी प्रसाद मौर्य ने योगी सरकार पर गुंडाराज का आरोप लगाते हुए कहा है कि सरकार सच्चाई दबा रही है। उन्होंने चेतावनी दी है कि अगर 24 घंटे में मुख्य आरोपी की गिरफ्तारी नहीं होती है तो वह आंदोलन करेंगे।
दरअसल, इन दोनों ही मामलों में दोनों पीड़िताएं ओबीसी समाज से हैं। यूपी में ओबीसी समाज बड़ा वोट बैंक है। विपक्षी दल इन घटनाओं को पिछड़ों और दलितों पर अन्याय बताकर इसे सीधे तौर पर जातियों के 'पिच' पर ले जा रहे हैं। विपक्ष इसे पिछड़ी जातियों पर अत्याचार बता रहा है। वहीं, सरकार का मानना है कि इन संवेदनशील मुद्दों के जरिए 2027 के चुनावों की जमीन तैयार की जा रही है और राजनीतिक दल अपनी 'सियासी रोटी' सेंकने की कोशिश कर रहे हैं
इसलिए यह दोनों मामले अब सिर्फ अपराध तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि सामाजिक-राजनीतिक प्रतिनिधित्व का मुद्दा बन गए हैं।
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