उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में माघ मास यानी जनवरी के महीने में मौनी अमावस्या के दिन त्रिवेणी संगम में स्नान का विशेष महत्व माना जाता है। इसी दौरान कुंभ मेले का आयोजन भी होता है। सनातन धर्म में मान्यता है कि मौनी अमावस्या के दिन संगम में स्नान करने से व्यक्ति के सभी पाप धुल जाते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
इसी मौनी अमावस्या के दिन ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती भी त्रिवेणी संगम में स्नान के लिए पहुंचे थे। इस दौरान उनके समर्थकों और पुलिस के बीच किसी बात को लेकर झड़प हो गई। इस घटना से नाराज होकर शंकराचार्य बिना गंगा स्नान किए ही मठ लौट गए। इसी घटना के बाद ज्योतिर्मठ देशभर में चर्चा का विषय बन गया। ऐसे में लोगों के मन में सवाल उठ रहा है कि ज्योतिर्मठ आखिर है क्या, इसकी शुरुआत कब हुई और मठ के संस्थापक कौन है। आइए जानते हैं पूरी कहानी।
कौन हैं शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद?
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती वर्तमान में ज्योतिर्मठ पीठ के शंकराचार्य हैं। वे उत्तराखंड में स्थित ज्योतिर्मठ के प्रमुख आचार्य हैं। उनका जन्म 15 अगस्त 1969 को उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के ब्राह्मणपुर गांव में हुआ था। संन्यास लेने से पहले उनका नाम उमाशंकर उपाध्याय था। उन्होंने वाराणसी स्थित संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से शास्त्री और आचार्य की शिक्षा प्राप्त की। 15 अप्रैल 2003 को उन्होंने दंड संन्यास की दीक्षा ली। उनके गुरु स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने उन्हें नया नाम अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती प्रदान किया।
ज्योतिर्मठ की स्थापना और इतिहास
ज्योतिर्मठ की स्थापना आदि शंकराचार्य ने लगभग 8वीं शताब्दी में की थी। यह मठ उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित है। ज्योतिर्मठ के पहले आचार्य आदि शंकराचार्य के शिष्य तोटकाचार्य थे। आदि शंकराचार्य ने भारत के चारों कोनों में चार मठों की स्थापना की थी जैसे ज्योतिर्मठ (उत्तर) ,श्रृंगेरी मठ (दक्षिण) ,द्वारका मठ (पश्चिम),और गोवर्धन मठ (पूर्व) में स्थापना की गई । इन सभी मठों में मुख्य रूप से अद्वैत वेदांत दर्शन का प्रचार-प्रसार किया जाता है।
कुछ समय तक ज्योतिर्मठ व्यवस्थित रूप से चलता रहा, लेकिन बाद में यह लगभग निष्क्रिय हो गया। वर्ष 1941 में स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती ने ज्योतिर्मठ का पुनः पुनर्गठन किया। उनके निधन के बाद 1953 में उत्तराधिकार को लेकर विवाद शुरू हुआ, जो आज तक चला आ रहा है। कथित वसीयत के आधार पर कृष्ण बोधाश्रम को गद्दी सौंपी गई। वर्तमान में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ज्योतिर्मठ के आचार्य हैं।
कौन थे आदि शंकराचार्य?
आदि शंकराचार्य का जीवन अद्भुत और अलौकिक घटनाओं से भरा हुआ था। उनका जन्म लगभग 2500 वर्ष पूर्व केरल के कालड़ी गांव में हुआ था। उनके पिता शिवगुरु और माता आर्याम्बा थे। संतान प्राप्ति के लिए माता-पिता ने भगवान शिव की आराधना की, जिसके फलस्वरूप शंकराचार्य का जन्म हुआ।बचपन से ही वे असाधारण प्रतिभा के धनी थे। कहा जाता है कि बहुत कम उम्र में ही वे अपनी मातृभाषा में दक्ष हो गए थे और शास्त्रों का गहन अध्ययन करने लगे थे। आठ साल की उम्र में उन्होंने वेदों का ज्ञान प्राप्त कर लिया था और बारह साल तक सभी प्रमुख शास्त्रों में निपुण हो गए थे।
उन्होंने नर्मदा तट पर गोविंदपादाचार्य से दीक्षा ली और ‘शंकर भगवत्पाद’ कहलाए। महज 16 साल की उम्र में उन्होंने प्रसिद्ध शांकर भाष्य की रचना की, जिसे आज भी विद्वान अत्यंत श्रेष्ठ ग्रंथ मानते हैं। आदि शंकराचार्य ने पूरे भारत की चार बार पदयात्रा कर अद्वैत वेदांत दर्शन का प्रचार किया और बौद्ध मत सहित अन्य विरोधी विचारधाराओं का तर्क के माध्यम से खंडन किया। उन्होंने उपनिषदों, भगवद्गीता और ब्रह्मसूत्र पर महत्वपूर्ण भाष्य लिखे और सनातन धर्म को फिर से प्रतिष्ठित किया।
ज्योतिर्मठ की साधना और परंपरा
ज्योतिर्मठ में संत मुख्य रूप से अद्वैत वेदांत दर्शन का अध्ययन और प्रचार करते हैं। यहां गुरु-शिष्य परंपरा का पालन किया जाता है। वरिष्ठ संत नए संन्यासियों को दीक्षा देते हैं, जो दशनामी संप्रदाय से संबंधित होते हैं। दशनामी संप्रदाय के संत भगवा वस्त्र धारण करते हैं, शरीर पर भस्म लगाते हैं और 54 या 108 रुद्राक्ष की माला पहनते हैं। इनमें से कुछ संत नागा साधु होते हैं, जो निर्वस्त्र रहते हैं और कुंभ मेले में विशेष आकर्षण का केंद्र बनते हैं।ज्योतिर्मठ में तप, साधना और ज्ञान के माध्यम से सनातन धर्म के मूल सिद्धांतों का प्रचार-प्रसार किया जाता है।