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जब 'अखुरथ' रूप में भगवान गणेश ने किया था राक्षसों का संहार, जानिए कथा

भगवान गणेश की उपासना के लिए आज अखुरथ चतुर्थी व्रत का पालन किया जा रहा है। आइए जानते हैं इस व्रत से जुड़ी पौराणिक कथा और महत्व।

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भगवान गणेश। (Pic Credit: Canva)

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हिंदू धर्म में प्रत्येक माह की चतुर्थी तिथि के दिन भगवान गणेश को समर्पित चतुर्थी व्रत का पालन किया जाता है। वैदिक पंचांग के अनुसार, आज के दिन अखुरथ संकष्टी व्रत का पालन किया जा रहा है। हिंदू धर्म में इस व्रत का विशेष महत्व है। बता दें कि अखुरथ संकष्टी चतुर्थी भगवान गणेश को समर्पित व्रत है, जो हर माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी के दिन मनाया जाता है। 

 

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान गणेश की पूजा-अर्चना करने से जीवन में आ रही समस्याएं दूर हो जाती है और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है। बता दें कि अखुरथ गणेश का अर्थ है, ‘जो बिना रथ के संपूर्ण जगत का संचालन करते हैं।’ आइए जानते हैं, भगवान गणेश की पूजा का महत्व और पौराणिक कथा।

अखुरथ संकष्टी की पौराणिक कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार देवताओं ने भगवान शिव से कहा कि राक्षसों के कारण स्वर्गलोक और पृथ्वी पर सभी कष्ट झेल रहे हैं। भगवान शिव ने यह सुनकर देवताओं को भगवान गणेश की आराधना करने की सलाह दी। सभी देवताओं ने मिलकर भगवान गणेश का आह्वान किया। देवताओं की आग्रह पर गणेशजी ‘अखुरथ’ रूप में प्रकट हुए और देवताओं की सहायता की। उन्होंने राक्षसों का संहार कर सभी को कष्टों से मुक्त किया था।

व्रत का महत्व

अखुरथ संकष्टी व्रत का महत्व बहुत अधिक है। इस व्रत का पालन करने से जीवन में आने वाली सभी बाधाएं दूर हो जाती हैं और सुख, शांति और समृद्धि प्रदान करते हैं। इस व्रत में शाम के समय गणेश जी की पूजा की जाती है। यह व्रत व्यक्ति के जीवन में आने वाले सभी प्रकार के संकट और कष्टों को दूर करता है। इस दिन निर्जल या फलाहार व्रत रखने की परंपरा है। शाम को चंद्रमा के दर्शन के बाद व्रत पूर्ण होता है।

 

Disclaimer- यहां दी गई सभी जानकारियां सामाजिक और धार्मिक आस्थाओं पर आधारित हैं। Khabargaon इसकी पुष्टि नहीं करता।


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