2026 के अप्रैल महीने में उत्तराखंड के 4 पवित्र तीर्थस्थलों में चारधाम की यात्रा शुरू होने वाली है। यह यात्रा 19 अप्रैल से शुरू होगी। इस दौरान लाखों की तादाद में लोग मंदिर के दर्शन करने आएंगे। उत्तराखंड के चारधाम यात्रा को बढ़ावा देने में आदि शंकराचार्य ने अहम योगदान दिया है। आदि शंकराचार्य ने हिंदू धर्म के पुनरुत्थान में बेहद अहम योगदान दिया है। उन्होंने पूरे देश में पदयात्रा कर भगवान की उपासना की थी। इसी प्रकार लगभग 8वीं शताब्दी में वह केरल से पदयात्रा करके उत्तराखंड पहुंचे थे, जहां आदि शंकराचार्य जी ने गंगोत्री से लेकर केदारनाथ तक की यात्रा की थी और पूरी दुनिया को चारधाम यात्रा करने के लिए प्रेरित किया था।
उत्तराखंड के चमोली जिला में आदि शंकराचार्य ने अपना पहला मठ जोशीमठ की स्थापना की थी। धार्मिक मान्यता के अनुसार आदि शंकराचार्य ने ही गंगोत्री, केदारनाथ, यमुनोत्री धाम को पुनः स्थापित कर उत्तराखंड की छोटा चारधाम यात्रा करने के लिए लोगों को प्रेरित किया था। अब सवाल उठता है कि आदि शंकराचार्य का चारधाम यात्रा में क्या योगदान है।
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उत्तराखंड में चारधाम की स्थापना
माना जाता है कि पूरे देश में आदि शंकराचार्य ने ही चारधाम यात्रा की अवधारणा लाई थी। इसके साथ उन्होंने ही उत्तराखंड के छोटे चारधाम को एक साथ पिरोया था। उत्तराखंड का छोटा चारधाम यानी यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ धाम के दर्शन करने के लिए लोगों को प्रेरित किया। आदि शंकराचार्य ने केवल ज्योतिर्मठ की स्थापना ही नहीं की, बल्कि बद्रीनाथ मंदिर की स्थापना के साथ ही केदारनाथ मंदिर में दुबारा से पूजा-पद्धति की शुरुआत भी की थी।
ज्योतिर्मठ की स्थापना
आदि शंकराचार्य ने उत्तराखंड यात्रा के दौरान जोशीमठ की स्थापना की थी, जो कि उनकी यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र था। यहीं उन्होंने अमर कल्पवृक्ष के नीचे तपस्या की थी। इस वजह से वहां ‘ज्योतिर्मठ’ की स्थापना की गई। यह बद्रीनाथ धाम का शीतकालीन निवास और ज्ञान का केंद्र बना।
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बद्रीनाथ मंदिर की पुनः स्थापना
धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक आदि शंकराचार्य ने अलकनंदा नदी से भगवान बद्रीनारायण की मूर्ति को निकाला था। उसके बाद भगवान की मूर्ति को मंदिर में पुनः स्थापित किया था। इसके बाद मंदिर में रीति-रिवाजों के साथ पुजारियों द्वारा पूजा करवाई गई। बद्रीनाथ मंदिर का खास महत्व है। यह भारत के चार धामों में से एक है।
केदारनाथ में अंतिम समय
माना जाता है कि सिर्फ 32 वर्ष की उम्र में ही शंकराचार्य ने अंतिम समाधि ली थी। आदि शंकराचार्य केदारनाथ मंदिर के पास ही अपने जीवन के अंतिम क्षणों में रहे थे। इसी वजह से केदारनाथ मंदिर के ठीक पीछे आदि शंकराचार्य की समाधि है, जहां अक्सर भक्तजन दर्शन करने आते हैं।
डिस्क्लेमर: यह लेख धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है। इसकी पुष्टि नहीं की जाती है।