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पंजाब में होगा महाराष्ट्र वाला खेल, क्या अकाली दल से छिन जाएगा चुनाव चिह्न?

शिरोमणि अकाली दल के चुनाव चिह्न तकड़ी पर अकाली दल पुनर्सुरजीत ने दावा ठोक दिया है। चुनाव आयोग ने उनकी याचिका को स्वीकार भी कर लिया है।

Sukhbir Singh Badal

सुखबीर सिंह बादल, Photo credit: @officeofssbadal

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पंजाब में अगले साल विधानसभा चुनाव हैं और इन चुनावों की तैयारियों में सभी राजनीतिक दल लगे हुए हैं। दस साल से पंजाब की सत्ता से बाहर शिरोमणि अकाली दल एक बार फिर पंजाब में वापसी की तैयारी कर रहा है। पार्टी प्रधान सुखबीर सिंह बादल राज्यभर में बैसाखी से पहले 40 रैलियों को संबोधित करने वाले हैं। पार्टी ने संगठन को मजबूत करने पर जोर दिया है और लगातार ग्राउंड पर काम कर रही है। इस बीच पार्टी की चिंता अचानक बढ़ गई क्योंकि पार्टी का चुनाव चिह्न तकड़ी यानी तराजू खतरे में आ गया है। अकाली दल के चुनाव चिह्न तकड़ी पर अकाली दल पुनर्सुरजीत ने दावा ठोक दिया है और चुनाव आयोग ने उनकी याचिका को स्वीकार भी कर लिया है। महाराष्ट्र में शिवसेना और एनसीपी में जब दोफाड़ हुई थी तब चुनाव आयोग ने अलग हो चुके गुट के पक्ष में फैसला दिया था। 

 

चुनाव आयोग ने उस याचिका को स्वीकार कर लिया है जिसमें अकील दल पुनर्सुरजीत ने दावा किया था कि अकाली दल का चुनाव चिह्न तकड़ी उन्हें मिलना चाहिए। यह याचिका अकाली दल पुनर्सुजीत की ओर से एडवोकेट गुरजीत सिंह तलवंडी ने दायर की है। अब चुनाव आयोग अकाली दल पुनर्सुरजीत की याचिका पर सुनवाई करेगा। ऐसे में अगर चुनाव आयोग इस याचिका के पक्ष में फैसला देते हैं तो सुखबीर बादल और शिरोमणि अकाली दल की चिंता बढ़ सकती है। 

 

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किस आधार पर चुनाव चिह्न पर दावा?

अकाली दल पुनर्सुरजीत ने चुनाव आयोग में दायक अपनी याचिका में दावा किया है कि सुखबीर बादल ने पार्टी के नेताओं के एकमत होने के बावजूद भी अध्यक्ष पद से इस्तीफा नहीं दिया था। इसके बाद नाराज नेताओं ने अलग होने का फैसला किया।  दो दिसंबर 2024 को अकाली दल अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने श्री अकाल तख्त साहिब के सम्मुख पेश होकर अपनी सरकार के दौरान हुईं गलतियां स्वीकार की थीं। अब अकाली दल पुनर्सुरजीत इसे ही अपने पक्ष में सबूत बनाएगा, जिससे यह साबित किया जा सके कि पार्टी के तमाम नेता इन गलतियों के कारण ही सुखबीर से नाराज थे और उन्हें अध्यक्ष पद छोड़ने के लिए कह रहे थे।

पहले क्यों खारिज हुई थी याचिका?

इससे पहले पार्टी ने जनप्रतिनिधि कानून के तहत अपनी याचिका दायर की थी, लेकिन चुनाव आयोग ने चुनाव चिह्न पर दावे के लिए द इलेक्शन सिंबल (रिजर्वेशन एंड अलॉटमेंट) ऑर्डर 1968 की धारा 15 के तहत याचिका दायर करने को कहा था। इसके बाद पार्टी ने नए सिरे से चुनाव आयोग के निर्देशों का पालन करते हुए याचिका दायक की थी। इस याचिका को चुनाव आयोग ने बीते सोमवार स्वीकार कर लिया है। 

 

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यहां समझिए पूरा मामला

जब सुखबीर बादल ने अकाली दल के अध्यक्ष पद से इस्तीफा नहीं दिया तो पार्टी के कई नेता पार्टी से अलग हो गए। इसे पार्टी  में एक बड़ी टूट के रूप में देखा गया लेकिन पार्टी पर दावा सुखबीर बादल के गुट का ही रहा। श्री अकाल तख्त साहिब से जारी हुए हुक्मनामे में पार्टी के लिए नई लीडरशिप को आगे लाने के लिए पांच सदस्यीय कमेटी बनाकर जो भर्ती अभियान शुरू करने का आदेश जारी किया गया था, उसके बाद से ही पार्टी दोफाड़ हुई थी। इसके बाद अलग हुए नेताओं ने चुनाव आयोग से पार्टी का नाम अकाली दल और चुनाव चिह्न तकड़ी रखने की मांग की थी। उन्होंने अपने आप को असली अकाली दल के रूप में पेश किया था। बता दें कि महाराष्ट्र में शिवसेना और एनसीपी में इसी तरह की टूट हुई थी, जिसमें पार्टी से अलग हुए गुट को असली पार्टी का दर्जा दिया गया है। 

 

चुनाव आयोग ने अलग हुए गुट को नई पार्टी का अलग नाम रखने के लिए कहा था और अकाली दल पुनर्सुरजीत की ओर से दायर याचिका में कहा गया है कि पार्टी नई नहीं बनी है बल्कि पार्टी दोफाड़ हो गई है और उसके ज्यादातर पदाधिकारियों ने सुखबीर बादल का साथ छोड़ दिया है इसलिए पार्टी के चुनाव चिन्ह और नाम पर केवल उनका अधिकार है। अकाली दल पुनर्सुरजीत की दलीली है कि पार्टी के ज्यादातर पदाधिकारी उनके साथ आ गए थे। इसलिए असली अकाली दल पर उनका अधिकार है और उन्हें चुनाव चिह्न मिलना चाहिए।

 


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