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गूगल में काम करना मुश्किल या आसान, सॉफ्टवेयर इंजीनियर ने बताया अनुभव

बेंगलुरु के एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर गूगल में अपने तीन साल के अनुभव को साझा किया था। जिसमें फायदे और चुनौती दोनों शामिल है। जानिए-

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गूगल एप। (Pic Credit- Canva)

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हाल ही में बेंगलुरु के एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर राज विक्रमादित्य ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व में ट्विटर) पर गूगल में अपने तीन साल के अनुभव को साझा किया था। राज के इस पोस्ट को 97,000 से ज्यादा व्यूज मिले और लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा। उन्होंने गूगल में काम करने के फायदे और चुनौती दोनों पर खुलकर चर्चा की, जिससे यह पोस्ट तेजी से वायरल हो गई।

गूगल में काम करने के फायदे

राज विक्रमादित्य ने अपनी पोस्ट में गूगल की बेहतरीन वर्क-लाइफ बैलेंस (WLB) की तारीफ की। उन्होंने X पोस्ट में लिखा कि, ‘गूगल आपके जीवन की हर जरूरत का ख्याल रखता है- खाना, जिम, स्पा, ट्रिप्स, पार्टियां।’ यह इस बात को दर्शाता है कि गूगल अपने कर्मचारियों की भलाई को सर्वोच्च प्राथमिकता देता है।

 

उन्होंने गूगल के कोडबेस की गुणवत्ता की भी प्रशंसा की। उनके अनुसार, ‘गूगल का कोडबेस इतना बेहतरीन है कि जब आप इसे समझने लगते हैं, तो उसकी डिजाइन और आर्किटेक्चर की प्रशंसा किए बिना नहीं रह पाते।’

 

इसके अलावा, उन्होंने गूगल में मौजूद टैलेंटेड लोगों के साथ काम करने के अनुभव को प्रेरणादायक बताया। यह माहौल लगातार सीखने और बेहतर बनने के लिए प्रेरित करता है। गूगल में मिलने वाले अन्य फायदों में ऑन-कॉल शिफ्ट्स के लिए अतिरिक्त वेतन, पीयर बोनस, स्पॉट बोनस और एडवांस गैजेट का इस्तेमाल शामिल है। उन्होंने बताया कि गूगल के इंटरनल टूल बहुत एडवांस हैं साथ ही, गूगल का बेहतर डॉक्यूमेंटेशन टीम ट्रांजिशन को आसान बनाता है।

गूगल में ये हैं चुनौतियां

हालांकि गूगल में कई सुविधाएं और बेहतरीन माहौल है, लेकिन इसके साथ कुछ चुनौतियां भी हैं। राज विक्रमादित्य ने गूगल की धीमी अप्रूवल प्रोसेस को एक बड़ी चुनौती बताया। उन्होंने कहा कि यह प्रक्रिया इसलिए आवश्यक है ताकि बड़ी कंपनी होने के नाते किसी भी प्रकार के कानूनी जोखिमों और समस्याओं से बचा जा सके।

 

इसके अलावा, उन्होंने यह भी बताया कि गूगल जैसी बड़ी कंपनियों में अक्सर कार्यक्षेत्र (Scope of Work) सीमित हो सकता है। उन्होंने कर्मचारियों के लिए ‘सीमित दायरा’ होने की बात भी कही। उन्होंने बताया कि अधिकांश टीमें एंड-टू-एंड फीचर्स पर काम नहीं करतीं और अधिकांश इंफ्रास्ट्रक्चर पहले से बना होता है। इससे सीखने का अवसर सीमित हो जाता है, जब तक कि आप किसी कोर टीम का हिस्सा न हों।

 

इसके अलावा, टीम बदलने और प्रमोशन की प्रक्रिया भी एक चुनौती है। उन्होंने बताया कि जिस टीम में किया गया काम प्रमोशन के लिए गिना नहीं जाता अगर आप टीम बदल लें। इससे कुछ कर्मचारी प्रमोशन के तुरंत बाद टीम बदलने का निर्णय लेते हैं, जिससे कुछ टीमों में प्रमोशन की प्रक्रिया धीमी हो जाती है।

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