भारत में बिजली से चलने वाले कारखानों के साथ-साथ बहुत सारी फैक्ट्रियां ऐसी भी हैं जिनका काम गैस से होता है। खाद बनाना हो, कांच के उत्पाद बनाना हो, सेरैमिक आइटम बनाने हों या फिर सीमेंट उत्पाद हो, इन सबमें गैस की जरूरत खूब पड़ती है। अब मौजूदा स्थिति में इस तरह के तमाम उद्योग गैस की कमी की मार झेल रहे हैं। गैस के लिए हर दिन सिलिंडर लेने या कम स्टॉक रखने पर आश्रित छोटी फैक्ट्रियों का काम रुक गया है। बड़ी कंपनियों की हालत भी यह है कि अगर जल्द ही सप्लाई पहले के जैसी नहीं हुई तो उनका काम भी बंद हो सकता है। इसके पीछे बड़ी वजह यह है कि गैस की किल्लत के चलते भारत सरकार ने निर्देश दिए हैं कि पहले घरेलू इस्तेमाल के लिए गैस दी जाए।
देश की राजधानी दिल्ली से लेकर, गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान और अन्य राज्यों के औद्योगिक शहरों में गैस की कमी के चलते कारोबारी परेशान हैं। चिंता की बात यह है कि गैस आधारित टरबाइन से बिजली बनती है और देश की जरूरत की कुल बिजली में 6-7 पर्सेंट की हिस्सेदारी गैस बेस्ड प्लांट्स की ही है। यानी गैस का विकल्प मानी जा रही बिजली से चलने वाली फैक्ट्रियां भी प्रभावित हो सकती हैं।
सेरैमिक इंडस्ट्री बेहाल
देश में सेरैमिक बर्तनों, मूर्तियों और डेकोरेटिव आइट्म्स आदि का बड़ा बाजार है। इस इंड्स्टी का ज्यादातर काम गैस से चलने वाली भट्ठियों के जरिए ही होता है। ऐसे में दिल्ली समेत तमाम राज्यों के कारोबारी अब गैस की किल्लत से तंग आ गए हैं। दिल्ली, नोएडा, गाजियाबाद और गुजरात के मोरबी शहर में टाइल्स और सेरैमिक आइटम्स बनाने वाली कई कंपनियों ने अपना कामकाज कुछ दिनों के लिए रोक दिया है। इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इसका असर यह होगा है कि दो-तीन दिन में सेरैमिक आइटम्स की कीमत बढ़ गई है। पहले से दिए गए ऑर्डर में भी कीमतें बदली जा रही हैं।
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इसका असर इन कंपनियों में काम करने वाले मजदूरों पर भी रहा है। कई कंपनियों में काम बंद होने की वजह से वे बिना काम के हो गए हैं। मजदूरों को कह दिया गया है कि जब तक स्थिति सामान्य नहीं होती फैक्ट्रियां चालू नहीं होंगी। इसके चलते इस बड़ी इंडस्ट्री के सामने ठीक वैसी ही समस्या हो गई है जैसे कि एक समय पर लॉकडाउन के चलते हुई थी।
इंडिया ब्रांड एंड एक्विटी फाउंडेशन के मुताबिक, भारत की सेरैमिक इंडस्ट्री लगभग 70 हजार करोड़ रुपये के आसपास की है। इसमें लगभग 40 प्रतिशत हिस्सेदारी निर्यात की है यानी जो सामान बनाया जाता है, उसका बड़ा हिस्सा विदेश जाता है। हर साल 6 से 7 प्रतिशत की रफ्तार से बढ़ रहे सेरैमिक मार्केट के लिए यह घटना चिंताजनक है।
इस इंडस्ट्री में मुख्य तौर पर एलीजी और नेचुरल गैस आधारित भट्टियों की जरूरत होती है। सेरैमिक आइट्स को पकाने के लिए 1200 डिग्री से ज्यादा तापमान की लंबे समय तक जरूरत होती है। ऐसे में बिना गैस के इन आइट्स को बनाना ही मुश्किल है। इन आइटम्स को अलग-अलग आकार में ढालने, उन्हें पकाने और फिर सुखाने में गैस की ही जरूरत पड़ती है।
ग्लास इंडस्टी पर बुरा असर
असल में ये उद्योग ऐसे हैं जिनमें सीधे-सीधे आग की जरूरत पड़ती है और बिजली के उपकरण यह काम नहीं कर सकते हैं। कांच के आइटम बनाने वाली फैक्ट्रियों को LPG और PNG की जरूरत पड़ती है और यह गैस ज्यादातर दूसरे देशों से आती है। शुरुआती कुछ दिनों में ही LPG आधारित प्लांट काम प्रभावित हो गया है। जिनके पास सप्लाई है वे काम तो कर पा रहे हैं लेकिन पूरी क्षमता के साथ उत्पादन नहीं कर पा रहे हैं। इसकी वजह यह है कि इस इंडस्ट्री में हर समय काम होता है और काम के दौरान गैस की जरूरत पड़ती है।
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कांच को पिघलाने से लेकर उसे आकार देने तक के लिए गैस वाली भट्ठियों की जरूरत पड़ती है। आधुनिक भट्ठियां भी गैस से ही चलती हैं क्योंकि कांच को गर्मी नहीं आग की जरूरत होती है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, गैस सप्लाई में 5 पर्सेंट की कमी भी इन कंपनियों को बंद कर सकता है और इसका बड़ा नुकसान हो सकता है। बाद में इन कंपनियों को दोबारा शुरू करने में अतिरिक्त खर्च भी होगा।
बता दें कि भारत की ये कंपनियां हर दिन लगभग 26 हजार टन का उत्पादन करती हैं, जिसमें से 80 प्रतिशत चीजों की खपत देश में ही हो जाती है। बाकी की 20 पर्सेंट चीजें विदेश भेज दी जाती हैं। यही कंपनियों मेडिकल इस्तेमाल वाली कांच की चीजें भी बनाती हैं। दवा रखने के लिए कांच के बर्तन भी इसी इंडस्ट्री में बनते हैं।
बोरोसिल जैसी दिग्गज कंपनियों को भी हर दिन 15 से 20 टन LPG को जरूरत पड़ती है। कुछ कंपनियां ऐसे भी हैं जिनकी भट्ठियां गैस के अलावा फर्नेस ऑयल से भी चल सकती हैं लेकिन गैस की जरूरत तब भी पड़ती है। एक और चीज यह है कि दो तरह के फ्यूल पर चलने वाली भट्टियां कम ही कंपनियों या लोगों के पास हैं। एक समस्या यह है कि कांच के काम के लिए लगातार गैस की जरूरत होती है। अगर किसी भी कारण से भट्ठियां आधे घंटे के लिए भी रुक गईं तो जितनी चीजें प्रोसेस के बीच में होती हैं वे खराब हो जाती हैं और उन्हें फिर ठीक नहीं किया जा सकता है।
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इंडस्ट्री के विशेषज्ञों का मानना है कि एक बार बंद हो जाने पर एक कंपनी को अपना काम शुरू करने में 6 से 12 महीने लग सकते हैं और बड़ी फैक्ट्रियों की भट्ठियों को चालू करने का खर्च 50 से 200 करोड़ रुपये तक हो सकता है।
बाकियों का भी बुरा हाल
इसी तरह गैस वाली भट्टियों से चलने वाली सीमेंट फैक्ट्रियां, ऑटोमोबाइल पार्ट्स बनाने वाली कंपनियां और फार्मास्यूटिकल कंपनियां भी प्रभावित हुई हैं। गुजरात, महाराष्ट्र और तमाम राज्यों में जो औद्योगिक क्षेत्र हैं वहां पाइप से पहुंचने वाली LNG की सप्लाई बुरी तरह प्रभावित हो रही है और अब इंडस्ट्री से जुड़े लोग राज्य और केंद्र सरकार से संपर्क साध रहे हैं ताकि किसी भी हाल में उन्हें गैस मिल सके।
