गैस की कमी लॉकडाउन जैसा हाल करेगी? समझिए डिमांड और सप्लाई का पूरा खेल
गैस और तेल की सप्लाई कम होने का असर यह हो रहा है कि कई कारोबार ठप हो रहे हैं और अब होटल और रेस्तरां का काम भी प्रभावित हो रहा है।

प्रतीकात्मक तस्वीर, Photo Credit: Sora AI
पश्चिमी एशिया में जारी युद्ध का असर अब धीरे-धीरे भारत पर भी दिखने लगा है। गैस और तेल की सप्लाई को लेकर किए जा रहे तमाम दावों के बावजूद कमी दिखने लगी हैं। कई राज्यों में गैस के बलबूते काम ठप हो रहे हैं क्योंकि सरकार ने कमर्शियल गैस के उपभोक्ताओं के बजाय घरेलू इस्तेमाल को प्राथमिकता देने को कहा है। इसका असर यह हो रहा है कि कई फैक्ट्रियों, रेस्तरां और होटल तक को कमर्शियल गैस नहीं मिल पा रही है। होटल कारोबारियों ने तो काम बंद करने की चेतावनी दे डाली है। अगर सच में ऐसा होता है तो कई मेट्रो शहरों में वैसे हालात हो सकते हैं जैसे लॉकडाउन के समय हुआ करते थे। इसका बड़ा कारण यह है कि इन शहरों में बहुत सारे लोग बाहर के खाने पर निर्भर हैं और यह खाना कमर्शियल गैस का इस्तेमाल करके ही बनाया जाता है।
गैस की कमी के चलते टाइल्स इंडस्ट्री का काम प्रभावित हुआ है, पुणे में गैस आधारित शवदाह गृह बंद हो गए हैं और अब होटल संचालकों ने भी काम बंद होने की आशंका जताई है। इस बीच भारत सरकार ने तेल रिफाइनरियों को निर्देश दिया है कि वे LPG का उत्पादन बढ़ाकर घरेलू मांग की आपूर्ति सुनिश्चित करें। इतना ही नहीं, एक और नियम लागू कर दिया गया है कि आप एक सिलेंडर बुक करने के 25 दिन बाद ही दूसरा गैस सिलेंडर बुक कर सकते हैं। सरकार का कहना है कि यह कदम इसलिए उठाया गया है ताकि लोग सिलेंडर लेकर जमा न कर सकें। इसके अलावा, अस्पतालों और शिक्षण संस्थानों को दी जाने वाली गैस को भी प्राथमिकता दी जा रही है।
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बाकी के घरेलू सेक्टर को मिलने वाली गैस सप्लाई के बारे में चर्चा के लिए एक कमेटी बनाई गई है। यही कमेटी रेस्टोरेंट, होटलों और अन्य उद्योंगों की गैस जरूरतों की समीक्षा करेगी और उसका बाद कोई फैसला लिया जाएगा। इस बीच बेंगलुरु के सांसद तेजस्वी सूर्या ने भी चिट्ठी लिखकर मांग की है कि होटल और रेस्तरां संचालकों की चिंताओं पर ध्यान दिया जाए। यानी इतना स्पष्ट है कि गैस की कमी हो रही है और आने वाले कुछ दिनों में अगर हल नहीं निकल पाता है तो संकट गंभीर हो सकता है।
कहां से आती है भारत की गैस?
भारत में गैस का सबसे ज्यादा इस्तेमाल घरों में खाना बनाने, होटल और रेस्तरां बिजनेस में और कई फैक्ट्रियों में होता है। इसके अलावा, गाड़ियों में इस्तेमाल के लिए भी गैस का इस्तेमाल होता है। हर काम के लिए अलग-अलग गैस का इस्तेमाल होता है। हालांकि, जितनी गैस की जरूरत भारत में होती है, उसका 60 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा भारत को दूसरे देशों से ही खरीदना पड़ता है। बीते कुछ सालों में उज्ज्वला गैस जैसी योजनाओं के चलते लगभग हर घर में गैस कनेक्शन है और गैस का इस्तेमाल भी बढ़ गया है।
साल 2012-13 से तुलना करें तो 10 साल में भारत में LPG का इस्तेमाल दोगुना बढ़ चुका था। यह जरूरत आयात से पूरी होती है और आयात होता है पर्शियन खाड़ी यानी अरब के देशों से। अब स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद है तो वहां से तमाम चीजों के साथ-साथ गैस भी नहीं आ पा रही है। कुछ गैस प्राकृतिक रूप से तेल के कुओं के साथ निकलती है तो कुछ गैस क्रूड ऑयल को प्रोसेस करने के समय बनती है। इसीलिए सरकार ने रिफाइनरी कंपनियों को कहा है कि वे गैस का उत्पादन बढ़ाएं। मुख्य रूप से प्रोपेन और ब्यूटेन का उत्पादन बढ़ाने को कहा गया है। आपके घर में जो लाल वाला सिलिंडर आता है उसमें यही गैस भरी गई होती हैं।
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60 प्रतिशत आयात के अलावा भारतीय तेल कंपनियां जैसे कि इंडियन ऑयल, बीपीसीएल आदि मिलकर 40 पर्सेंट LPG की जरूरतें पूरा करती हैं। ये कंपनियां खुद गैस का उत्पादन करती हैं और फिर सिलिंडर में भरकर आपके घरों तक पहुंचाती हैं।
LPG के बाद नंबर आता है लिक्विफाइड नेचुरल गैस यानी LNG का। यह वही गैस है जो पाइप के जरिए घरों तक पहुंचाई जाती है। इसका आधार हिस्सा दूसरे देशों से आता है और आधा हिस्सा भारत में पैदा होता है। दूसरे देशों से आने वाला हिस्सा कतर से आता है यानी इस समय इसके आने में भी दिक्कत ही है। 20 पर्सेंट LNG तो कतर से ही आता है और कतर ने गैस का उत्पादन ही बंद कर दिया है। भारत के पास LNG स्टोर करने की क्षमता तो है लेकिन यह क्षमता यूरोप के देशों जैसी नहीं है कि सप्लाई रुक जाने पर लंबे समय तक काम चलाया जा सके।
किन कामों पर हो रहा असर?
LNG का ज्यादा इस्तेमाल अमोनिया बनाने में होता है और इसी अमोनिया से यूरिया समेत तमाम काद बनाई जाती हैं। कई शहरों में बिजली उत्पादन, फैक्ट्रियों में मशीनें चलाने, शहरी घरों में गैस की सप्लाई करने और अन्य कामों में LNG का ही इस्तेमाल होता है। रेटिंग एजेंसी IACRA के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट प्रशांत वशिष्ठ का कहना है कि प्राकृतिक गैस का 30 प्रतिशत हिस्सा तो खाद बाने में खर्च हो जाता। वह बताते हैं कि 13 प्रतिशत गैस का इस्तेमाल करके बिजली बनाई जाती है और 21 प्रतिशत गैस घरेलू इस्तेमाल में खर्च होती है। अब चिंता की बात यह है कि जायद की फसलों की बुवाई होनी है और खाद की जरूरत पड़ने वाली है। इसके बाद सबसे अहम धान की फसल की बुवाई भी होगी जिसमें खाद की जरूरत ज्यादा होती है। अगर खाद का उत्पादन प्रभावित होता है तो किसानों को गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।
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भारत के मेट्रो शहरों में 60 प्रतिशत से ज्यादा आबादी बाहर के खाने पर निर्भर है। छोटे-मोटे ठेले, रेहड़ी, रोडसाइड ढाबों से लेकर बड़े-बड़े होटल से ही ये लोग खाना खाते हैं। शहरों में इस तरह के जितने भी खाना बेचने वाले कारोबारी हैं वे खाना बनाने के लिए गैस का ही इस्तेमाल करते हैं, ऐसे में सबसे बड़ी समस्या कामगार वर्ग के सामने आने वाली है। अगर कमर्शियल गैस की सप्लाई कम होती है, खाने की समस्या पैदा होती है तो लोग घर पर ज्यादा खाना बनाएंगे और यह दबाव फिर घरेलू गैस की मांग पर भी पड़ सकता है।
इन चीजों के अलावा फूड प्रोसेसिंग, सीमेंट, ग्लास, सेरैमिक, केमिकल और बिजली उत्पादन से जुड़ी कंपनियां भी गैस के सहारे ही काम करती हैं। पेट्रोलियम उत्पादों की सप्लाई भी कम ही हो रही है ऐसे में यह भारत के कारोबारियों पर दोहरी मार की तरह पड़ सकता है और तमाम काम ठप पड़ सकते हैं।
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