कृषि के क्षेत्र में विदेशी निवेश और उत्पादों को मौका देना, हमेशा से संवेदनशील विषयों में से एक रहा है। स्थानीय स्तर पर, किसान संगठन, इसे लेकर हमेशा आशंकित रहे हैं। बढ़ती आर्थिक जरूरतों और अमेरिकी प्रतिबंधों के बीच भारत ने कृषि के क्षेत्र में भी कुछ ऐसे समझौते किए हैं, जिन्हें लेकर जम्मू और किसानों के बागबानों और सेब किसानों की नींद उड़ी है। कश्मीर में करीब 35 लाख लोग, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर सेब की खेती से जुड़े हैं। 

भारत और अमेरिका के बीच, कुछ दिनों पहले, नया व्यापार समझौता हुआ है। समझौते की शर्तें, भारतीय किसानों को परेशान कर रही हैं। नए समझौते में, कुछ कृषि क्षेत्रों में अमेरिका को, भारत के विशाल बाजार में हिस्सेदारी मिलेगी। यूरोपियन यूनियन के साथ भी कुछ दिनों पहले एक समझौता हुआ है। दोहरा समझौता, किसानों को डरा रहा है। 

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क्यों परेशान हैं किसान?

यूरोपियन यूनियन और अमेरिका के साथ हुए व्यापार समझौतों के बाद, सेब के आयात पर कस्टम ड्यूटी में गिरावट आई है। जम्मू और कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और विपक्ष की नेता महबूबा मुफ्ती ने इन समझौतों की आलोचना की है। आलोचना करने की वजह भी है। उनका कहना है कि अगर, विदेशी सेब भारत में आए, भारतीय सेब का बाजार खराब होगा, यह किसानों पर कहर टूटने जैसा होगा। महबूबा मुफ्ती ने 20 फरवरी को यह चिंता जाहिर की थी।

महबूबा मुफ्ती, पूर्व मुख्यमंत्री, जम्मू और कश्मीर:-
मैं प्रधानमंत्री से अपील करती हूं कि वह जम्मू-कश्मीर के लोगों की मुश्किलों पर विचार करें। अगर आप हमारी आजीविका, रोजगार के अवसर और बच्चों की शिक्षा छीन लेंगे तो ये लोग क्या करेंगे? बागवानी पर निर्भर अनगिनत युवा कहां जाएंगे?

क्या समाधान हो सकता है?

महबूबा मुफ्ती, इसका उपाय भी सुझा रही हैं। उनका कहना है कि प्रधानमंत्री को समझौते पर फिर से सोचना चाहिए। सेब के आयात पर कम से कम 50 फीसदी टैरिफ लगाना चाहिए। 

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डर की बात क्या है?

महबूबा मुफ्ती की तरह ही, कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि जैसे ईरानी सेब, जब भारत में आए तो भारतीय किसानों की मुश्किलें बढ़ीं, ठीक वैसे ही एक डर और भी है। अमेरिकी सेब की बराबरी करना मुश्किल है। 

चिंता की बात क्या है? 

जम्मू-कश्मीर की अर्थव्यवस्था सेब प्रधान है। भारत-अमेरिका और भारत-यूरोपीय संघ (EU) व्यापार समझौतों ने बागवानों और व्यापारियों को डरा दिया है। सरकार ने अमेरिका से आने वाले सेबों पर इम्पोर्ट ड्यूटी 50 फीसदी से घटाकर 25 फीसदी कर दिया है। यूरोपीय संघ के साथ हुए समझौते में भी टैक्स कम किया गया है। व्यापारियों को डर है कि जब विदेशी सेब सस्ते में भारत आएंगे तो कश्मीरी सेब की मांग प्रभावित होगी। ऐसा हो सकता है कि मांग ही घट जाए। 


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ऐसा क्यों हो सकता है?

कश्मीर के बागवानों के लिए विदेशी सेबों से मुकाबला करना मुश्किल थोड़ा मुश्किल है। अमेरिका और यूरोप की आबादी कम है, खेत भारत की तुलना में ज्यादा बड़े हैं। किसानों के पास औसतन 50 हेक्टेयर से बड़े फॉर्म हैं, जबकि कश्मीर में किसान के पास औसतन आधा हेक्टेयर से भी कम जमीन है। एक अंतर पैदावार का भी है। भारत में प्रति हेक्टेयर में अधिकतम 7-8 टन सेब उत्पादित होता है। अमेरिका और यूरोपीय देशों में आधुनिक तकनीक के आने से और मशीनरी की वजह से 40-70 टन तक पैदावार होती है।

जम्मू और कश्मीर सरकार की एक चिंता तकनीक की भी है। विदेशी किसान अब कटाई और छंटाई के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तक का इस्तेमाल कर रहे हैं, भारत का कृषि क्षेत्र, इससे कोसों दूर है। किसानी में ज्यादा लागत, मुनाफा कम वाली नौबत है। 

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सेब के बागान। Photo Credit: PTI

सेब से कितना कमाता है कश्मीर?

कश्मीर के फल उद्योग से करीब ₹10,000 करोड़ का राजस्व आता है।  सेब उद्योग से करीब 35 लाख लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हैं। भारत के कुल सेब उत्पादन का करीब 70 फीसदी हिस्सा सिर्फ जम्मू-कश्मीर से आता है। जम्मू कश्मीर विधानसभा में पेश सरकारी आंकड़े बताते हैं कि कश्मीर ने साल 2023-24 में करीब 13.12 लाख मीट्रिक टन सेब बेचे थे। 

 

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साल 2022-23 में 17.48 लाख मीट्रिक टन और 2021-22 में 12.07 लाख मीट्रिक टन सेब बाहर गए थे। इस दौरान जम्मू-कश्मीर में कुल सेब उत्पादन 18.57 लाख मीट्रिक टन रहा, जबकि 2022-23 में यह 27.21 लाख मीट्रिक टन और 2021-22 में 23.41 लाख मीट्रिक टन था। कश्मीर के सेब उद्योग का कुल रेवेन्यू करीब 12,000 करोड़ रुपये है। जम्मू और कश्मीर की GSDP करीब 2.86 लाख करोड़ है। इस सेक्टर की GDSP में 6-8 फीसदी का योगदान है। कश्मीर में सेब के लिए कृषि योग्य जमीनें करीब 1.72 लाख हेक्टेयर हैं। 

 

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कश्मीर से ही देश का 70 फीसदी सेब आता है। Photo Credit: PTI

​अमेरिका या यूरोप फायदे में क्यों रहेंगे?

कश्मीर में व्यापारियों के एक बड़े तबके ने कोल्ड स्टोरेज बनवाए हैं। इसे बनवाने में भारी लागत खर्च कर चुके हैं। सीजन के दौरान, सेब बेहद सस्ते हो जाते हैं। उन्हें स्टोर करके बेचने में ही मुनाफा होता है। किसानों को डर है कि अगर ऑफ-सीजन में विदेश से ताजा और सस्ता सेब बाजार में आएगा तो कोल्ड स्टोरेज में रखे पुराने हो चुके कश्मीरी सेब को कौन खरीदेगा। किसानों को मजबूरी में सस्ते दाम में इन सेबों को बेचना पड़ेगा।