वैश्विक संकट को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में अपील की थी कि लोग सोना कम खरीदें, तेल बचाएं और वर्क फ्रॉम होम को अपनाएं। इस अपील के पीछे की पहली और बड़ी वजह थी आयात के कारण पड़ने वाले दबाव को कम करना था। पीएम मोदी की अपील में आयात कम करने के लिए जरूरतें कम करने की बात भी कही गई थी। उनका कहना था कि वर्क फ्रॉम होम होने से डीजल-पेट्रोल जैसी चीजें बचाई जा सकेंगे। इसी तरह सोना कम खरीदने, तेल की खपत कम करने और खाद के विकल्प तलाशने से भी विदेशी मुद्रा का खर्च कम होगा और देश की माली हालत कुछ दिन और सुरक्षित रह सकेगी।

 

पीएम मोदी की की अपील की वजह यह थी कि भारत अपनी जरूरत का लगभग 99 प्रतिशत सोना, 87 प्रतिशत कच्चा तेल, लगभग 27 प्रतिशत खाद और लगभग 60 प्रतिशत खाद्य तेल के लिए दूसरे देशों पर निर्भर है।  इन चीजों की खरीद के लिए भारत को हर साल भारी भरकम विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ती है। मौजूदा वक्त में कच्चा तेल लगभग दोगुना महंगा है और डॉलर के बनाम रुपये की हालत खराब है। नतीजा यह हो रहा है कि भारत की विदेशी मुद्रा बहुत तेज रफ्तार से खर्च हो रही है। मौजूदा वक्त में भारत के पास 690 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा बची है। यह सितंबर 2024 के अब तक से सबसे ज्यादा 704 अरब डॉलर की तुलना में कम है। जनवरी 2026 से देखें तो साल की शुरुआत में 701 अरब डॉलर और फरवरी में 728 अरब डॉलर थे।

 

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फरवरी के आखिर में इजरायल और अमेरिका ने मिलकर ईरान पर हमला किया और कुछ ही दिन में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद कर दिया। उसके बाद से ही स्थिति बदल गई। कच्चा तेल महंगा हो गया और आयात के चैनल प्रभावित हुए। इसका असर भारत के विदेशी मुद्रा कोष पर पड़ा। मार्च 2026 में विदेशी मुद्रा कोष 698 अरब डॉलर पर था। अप्रैल में थोड़ी राहत मिली और 703 अरब डॉलर तक गया लेकिन अप्रैल के आखिर और मई की शुरुआत तक इसमें गिरावट जारी रही और एक बार फिर से 690 अरब डॉलर तक पहुंच गया।

इन चीजों पर कितना खर्च करता है भारत?

भारत में सोने के गहनों का चलन बहुत है और इसके लिए देश की विदेशी मुद्रा खूब खर्च होती है। मिनिस्ट्री ऑफ कॉमर्स के आंकड़े बताते हैं कि साल 2025-26 में भारत के लोगों ने कुल 721.03 टन सोने का आयात किया जिसके लिए कुल 71.98 अरब डॉलर यानी लगभग 6.69 लाख करोड़ रुपये खर्च हो गए। यही वजह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक साल तक सोना ना खरीदने की अपील कर रहे हैं। 

 

इसी तरह भारत कच्चे तेल का आयात भी भारत पर काफी भारी पड़ता है। भारत की घरेलू जरूरत का 87 प्रतिशत हिस्सा दूसरे देशों से ही आता है। घरेलू जरूरत के अलावा भारत की तेल कंपनियां कच्चे तेल का आयात करती हैं और उनसे अलग-अलग उत्पाद बनाती हैं। इसके लिए भी विदेशी मुद्रा खर्च करती हैं। भारत हर साल लगभग 11.32 लाख करोड़ रुपये का कच्चा तेल और इससे जुड़े उत्पाद खरीदता है। यही वजह है कि पीएम मोदी गाड़ियों का इस्तेमाल कम करने की अपील कर रहे हैं।

 

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खेती वाले देश भारत में रासायनिक खाद या उन्हें बनाने के लिए जरूरी केमिकल दूसरे देश से मंगाए जाते हैं। भारत सरकार के अनुमान के मुताबिक, इस साल भारत में खाद के आयात पर होने वाला खर्च 18 बिलियन डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद है यानी लगभग 1.5 लाख करोड़ रुपये खाद पर खर्च हो सकते हैं। अगर भारत इसका कोई विकल्प तैयार कर पाए या स्वदेशी खादों से काम चलाए तो ये पैसे भी बचाए जा सकते हैं। हालांकि, बदलते मौसम और बेमौसम बारिश के अलावा एक्स्ट्रीम वेदर कंडीशन की बढ़ती घटनाओं के चलते खाद का इस्तेमाल भी बढ़ता ही जा रहा है।

 

 

अगर सिर्फ कच्चा तेल, सोना, खाने वाले तेल और खाद पर होने वाले खर्च को जोड़ें तो भारत 2026 में कम से कम 240 बिलियन डॉलर यानी लगभग 20 लाख करोड़ रुपये खर्च करेगा। अगर बजट की तुलना में देखें तो यह राशि लगभग एक तिहाई है क्योंकि 2026-27 में भारत का बजट 53.5 लाख करोड़ रुपये रखा गया था। वहीं, भारत की कुल जीडीपी लगभग 350 लाख करोड़ रुपये की है। 

 

भारत के लिए चिंता की बात है कि स्वदेशी अपनाने की तमाम अपीलों के बावजूद बीते कुछ साल में इन सभी चीजों के आयात में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। सोने के आयात में 24 प्रतिशत तो खाद के आयात में 77 पर्सेंट की बढ़ोतरी ने भारत की चिंता बढ़ा दी है। इसके अलावा, कच्चे तेल के आयात में 17.4 प्रतिशत की बढ़ोतरी है।

WFH से कितना बचा लेगा भारत?

भारत की आबादी का एक बड़ा हिस्सा काम के सिलसिले में या तो दूसरे शहरों में रहता है या फिर हर दिन अलग-अलग साधनों से अपने दफ्तर तक जाता है। प्रधानमंत्री मोदी की अपील के बाद कई राज्यों में दो से तीन दिन के वर्क फ्रॉम होम को भी लागू कर दिया गया है। कोरोना महामारी के समय भी वर्क फ्रॉम होम लागू किया गया था और इसका असर तेल की खपत पर देखने को मिला था। पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (PPAC) का डेटा बताता है कि अप्रैल 2025 से मार्च 2026 के बीच यानी एक साल में भारत में कुल 425.86 लाख मीट्रिक टन पेट्रोल और 947.04 लाख मीट्रिक टन डीजल की खपर हुई। 

 

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महीने के हिसाब से देखें तो हर महीने लगभग 36 लाख मीट्रिक टन पेट्रोल और 79 लाख मीट्रिक टन पेट्रोल की खपत हुई। अब अगर लॉकडाउन की समय यानी फरवरी 2020 के आंकड़े देखें तो उस एक महीने में 25.11 लाख मीट्रिक टन और 71.62 लाख मीट्रिक टन की खपत हुई थी। मार्च 2020 में इसमें और कमी आई और पेट्रोल सिर्फ 21.56 लाख मीट्रिक टन और डीजल सिर्फ 56.60 लाख मीट्रिक ही खर्च हुई। अगर मौजूदा खर्च की तुलना में देखें तो पेट्रोल की खपत लगभग 40 प्रतिशत और डीजल की खपत लगभग 27 प्रतिशत की कमी हो गई थी।

 

हालांकि, स्पष्ट तौर पर सिर्फ वर्क फ्रॉम होम से तेल या पैसे बचने की बात नहीं कही जा सकती है और लॉकडाउन के समय से इसकी तुलना भी ठीक नहीं है। इसकी बड़ी वजह यह है कि लॉकडाउन में आम लोगों का गाड़ी चलाना, लंबी दूर पर जाना और यहां तक कि सार्वजनिक परिवहन तक बंद थे। ज्यादातर फैक्ट्रियां बंद थीं और इन सब पर डीजल-पेट्रोल की खपत खूब होती है। अगर वर्क फ्रॉम होम होता है तब विदेशी मुद्रा में ज्यादा बचत होगी या नहीं यह स्पष्ट रूप से नहीं कहा जा सकता है।

WFH ही एकमात्र उपाय नहीं

सिर्फ WFH से पैसे बच सकते हैं या नहीं, इसका जवाब 2011 की जनगणना के आंकड़े कुछ हद तक देते हैं। हालांकि, यह भी जाहिर है कि बीते 15 साल में ट्रांसपोर्ट के साधनों में बड़ा बदलाव भी आया है। 2011 की जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि 23 प्रतिशत लोग पैदल ही अपने काम पर जाते थे। 13 प्रतिशत लोग साइकिल से ऑफिस जाते थे और 12 प्रतिशत लोग मोटरसाइकिल से अपने काम पर जाते थे। 

आईआईटी दिल्ली की एक रिसर्च बताती है कि भारत में सिर्फ 5 प्रतिशत लोग ही ऐसे हैं जो अपनी कार से ऑफिस जाते हैं। जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि 15 प्रतिशत लोग बस से, 8 प्रतिशत लोग ट्रेन से, 2 प्रतिशत लोग मेट्रो से और 5 प्रतिशत लोग ऑटो या अन्य साधनों से ऑफिस जाते हैं।

 

कितने लोग कर सकते हैं घर से काम?

वर्क फ्रॉम होम से तेल की बचत या पैसों की बचत का असर तो हो सकता है लेकिन यह बेहद मामूली होगी। इकनॉमिक सर्वे 2023-24 के आंकड़े बताते हैं कि भारत में काम करने वाले लोगों की संख्या लगभग 56.5 करोड़ थी जिसमें से लगभग 50 करोड़ लोग ऐसे हैं जो घर से काम नहीं कर सकते और सिर्फ 5 से 6 करोड़ लोग ही घर से काम कर सकते हैं।

 

भारत में सबसे बड़ा वर्ग कृषि पर आधारित है और लगभग 45 प्रतिशत वर्क फोर्स इसी में काम करती है। वर्क फ्रॉम होम इन पर लागू नहीं हो सकता। हां, यह जरूर है कि ज्यादातर लोगों को खेत में काम पर जाने के लिए किसी साधन की जरूरत भी नहीं पड़ती है। दूसरे नंबर पर आते हैं कंस्ट्रक्शन में काम करने वाले 13 प्रतिशत लोग। ये लोग भी घर से काम नहीं कर सकते। इसी तरह 11-12 प्रतिशत लोग मैन्युफैक्चरिंग, 12 प्रतिशत लोग हॉस्पिटैलिटी, 5 प्रतिशत लोग ट्रांसपोर्ट और लॉजिस्टिक्स और 3 प्रतिशत लोग हेल्थकेयर सेक्टर में काम करते हैं। ये ऐसे लोग हैं जिनका काम घर से नहीं हो सकता। इनके अलावा, सुरक्षा बलों के जवान, पुलिस, सेना और कई अन्य विभागों के लोग भी घर से काम नहीं कर सकते हैं।

 

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हालांकि, यह जरूर है कि आयात पर निर्भरता कम करने के लिए भारत सबसे ज्यादा आयात वाली चीजों के विकल्प तलाशकर अपनी स्थिति बेहतर कर सकता है। इसके अलावा, वर्क फ्रॉम होम जैसे उपाय कम वक्त के लिए थोड़े प्रभावी हो सकते हैं लेकिन इसके उलटे नतीजे भी  आ सकते हैं। उदाहरण के लिए, ट्रांसपोर्टेशन कम करने से तेल तो बच सकता है लेकिन ट्रांसपोर्ट इंडस्ट्री के लोगों का नुकसान हो सकता है।