क्या हो कि आपके पास जो पैसा है, उसकी कोई वैल्यू ही न रह जाए। ऐसा ही ईरान के लोगों के साथ हुआ है और वहां जो विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, उसकी बड़ी वजह भी यही है। आज के समय में अमेरिका और यूरोप के ज्यादातर देशों में ईरान की करंसी रियाल की कोई वैल्यू नहीं रह गई है। इसका मतलब यह कि अगर आप यहां ट्रक भरकर भी रियाल लेकर पहुंच जाए तो वह सिर्फ कागज का टुकड़ा होगा।

 

ईरान की रियाल इतनी कमजोर हो गई है कि तेहरान के बाजार के दुकानदारों ने सरकार के खिलाफ प्रदर्शन शुरू कर दिया। 28 दिसंबर को तेहरान से जो सरकार के खिलाफ प्रदर्शन शुरू हुए थे, वह अब 100 से ज्यादा शहरों में फैल चुके हैं। दो हफ्ते से ज्यादा हो गया है लेकिन प्रदर्शन थमने का नाम नहीं ले रहे है।

 

ईरानी सरकार और वहां के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई आरोप लगा रहे हैं कि अमेरिका और इजरायल इन प्रदर्शनों को भड़का रहा है। ईरान की सरकार तो प्रदर्शनकारियों की तुलना 'दंगाइयों' और 'आतंकियों' से कर रही है। अब तक ढाई हजार से ज्यादा प्रदर्शनकारियों की भी मौत हो चुकी है और 18 हजार से ज्यादा हिरासत में हैं।

 

ईरान की सरकार भले ही इन प्रदर्शनों को भड़काने के लिए अमेरिका और इजरायल पर आरोप लगाए लेकिन एक सच यह भी है कि वहां कि करंसी रियाल इतनी टूट चुकी है कि उसकी कोई कीमत ही नहीं रह गई। अमेरिकी डॉलर में तो रियाल की वैल्यू '0' हो गई है। इसी तरह यूरो में भी अब ईरानियन रियाल की कोई वैल्यू नहीं रही।

 

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भारतीय रुपये के आगे कहां है रियाल?

भारतीय रुपये के मुकाबले भी ईरानियन रियाल की वैल्यू लगभग न के बराबर हो गई है। इस वक्त यानी 14 जनवरी को 1 रियाल की कीमत 0.000083 रुपये है।

 

इस हिसाब से अगर कैलकुलेट करें तो 1 रुपये की कीमत 12,110 रियाल के बराबर है। वहीं, 10 रुपये की कीमत 1.21 लाख रियाल से ज्यादा है। जबकि, 100 रुपये की कीमत 12 लाख रियाल से भी ज्यादा पहुंच गई है।

 

 

ईरानियन रियाल किस तरह से कमजोर हो चुकी है, इसका अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि 5 साल पहले 16 जनवरी 2021 को 1 रियाल की कीमत 0.0017 रुपये थी। यानी, उस समय भारत का 1 रुपया 588 रियाल के बराबर था। उस वक्त 10 रुपये की कीमत 5,882 रियाल और 100 रुपये की कीमत 58,823 रियाल थी।

 

इसका मतलब हुआ कि 5 साल में भारतीय रुपये की तुलना में ईरानियन रियाल की कीमत 20 गुना से भी ज्यादा कम हो गई है।

 

इतना ही नहीं, ईरान में 28 दिसंबर से प्रदर्शन शुरू हुए थे। उस दिन 1 रियाल की कीमत 0.0021 रुपये थी। यानी सिर्फ 17 दिन में ही भारतीय रुपये के मुकाबले ईरानियन रियाल की कीमत 25 गुना कमजोर हो गई है।

 

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रियाल इतनी कमजोर कैसे हो गई?

दुनियाभर में कोई करंसी कितनी कमजोर है, उसकी तुलना अमेरिकी डॉलर से की जाती है। साल 1979 में जब ईरान में इस्लामिक क्रांति हुई थी, तब 1 डॉलर की कीमत 70 रियाल के बराबर थी। अब इसकी वैल्यू '0' हो गई है।

 

ईरान की कमजोर करंसी के कई सारे फैक्टर्स हैं। इनमें एक फैक्टर इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) है। इस्लामिक क्रांति के बाद इसे बनाया गया था। ईरान में सबसे ताकतवर IRGC ही है। 90 के दशक में खाड़ी युद्ध खत्म होने के बाद IRGC को रीकंस्ट्रक्ट किया गया और इसे और ताकतवर बनाया गया।

 

धीरे-धीरे ईरान की अर्थव्यवस्था पर IRGC और उसकी कंपनियों का ही कंट्रोल आ गया। इसके बाद जब अमेरिका ने ईरान पर प्रतिबंध लगाना शुरू किया तो सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई ने इसे और ताकतवर बना दिया। अर्थव्यवस्था से प्राइवेट सेक्टर लगभग खत्म हो गया और सारी ताकत IRGC के पास आ गई।

 

बीच में कुछ समय के लिए ईरान पर जो प्रतिबंध लगाए गए थे, उसमें कुछ ढील दी गई थी। हालांकि, ये ढील बहुत लंबे समय तक नहीं रही। 2018 में जब अमेरिकी प्रतिबंध फिर से लगाए गए, तब 1 डॉलर की कीमत 42,000 रियाल के बराबर थी।

 

अमेरिकी प्रतिबंधों ने ईरान के एक्सपोर्ट को भी काफी कम कर दिया। ईरान की अर्थव्यवस्था बहुत हद तेल पर निर्भर है। ईरान ओपन डेटा प्रोजेक्ट के मुताबिक, अमेरिकी प्रतिबंधों से बचने के लिए ईरान ने नया तरीका तो ढूंढा लेकिन इसके बावजूद भी उसको ऑइल एक्सपोर्ट से जो कमाई होती थी, वह 20% कम हो गई।

 

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कितनी खराब हो गई अर्थव्यवस्था?

प्रतिबंधों और IRGC के कंट्रोल के कारण ईरान की अर्थव्यवस्था को खासा नुकसान हुआ। वर्ल्ड बैंक का कहना है कि सिर्फ तेल पर फोकस करने और प्रतिबंधों की वजह से ईरान की अर्थव्यवस्था 10 साल पीछे चल रही है। 2011 से 2020 के बीच हर साल ईरान की जीडीपी में औसतन 0.6% की गिरावट आई।

 

वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले एक दशक में 1 करोड़ से ज्यादा ईरानी गरीबी में चले गए हैं। 2011 से 2020 के बीच अंतर्राष्ट्रीय गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले ईरानियों का हिस्सा 20% से बढ़कर 28% हो गया है।

 

इस दौरान न सिर्फ गरीबी में जीने वाले ईरानियों की संख्या बढ़ी है, बल्कि उन ईरानियों की भी हालत खराब हुई है जो गरीबी रेखा से ऊपर थे।

 

डॉलर की तुलना में रियाल की कीमत गिरने से महंगाई भी खूब बढ़ी है। दिसंबर में ईरान में महंगाई दर 42% तक पहुंच गई, जो 2024 में 33% के आसपास थी। इससे रहना, खाना-पीना, घूमना-फिरना और इलाज सबकुछ महंगा हो गया है।