ईरान और अमेरिका के बीच तनाव चल रहा है। हाल ही में कुछ खबरों में दावा किया गया कि भारत ईरान के चाबहार पोर्ट से पीछे हट रहा है। हालांकि विदेश मंत्रालय ने इन दावों का खंडन किया और अमेरिका के साथ बातचीत जारी है, लेकिन अब केंद्रीय बजट में चाबहार पोर्ट को कोई धनराशि आवंटित नहीं की गई। इसके बाद नए सवाल उठने लगे हैं? 

 

2024-25 में 400 करोड़ रुपये की धनराशि आवंटित की गई थी। वहीं 2025-26 में भी संशोधिन अनुमान में इतनी ही राशि आवंटित की गई। मगर इस वर्ष भारत ने कोई आवंटन नहीं किया है। हाल ही में अमेरिका ने ईरान पर नए प्रतिबंध लगाए हैं। इसके बाद ही भारत सरकार ने यह कदम उठाया है। भारत हर साल परियोजना पर करीब 100 करोड़ रुये खर्च कर रहा था।

 

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साल 2015 में ईरान और भारत के बीच चाबहार पोर्ट विकसित करने पर एक समझौता हुआ था। पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह के जवाब में भारत ईरान के सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत में यह बंदरगाह विकसित कर रहा है। रणनीतिक तौर पर यह बंदरगाह बेहद अहम है, क्योंकि यह भारत को 7,200 किलोमीटर लंबे इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर से जोड़ता है। चाबहार के रास्ते भारत न केवल ईरान और अफगानिस्तान, बल्कि आर्मेनिया, अजरबैजान, रूस, मध्य एशिया और यूरोप तक अपना माल पहुंचा सकता है।

 

पिछले साल सितंबर में अमेरिका ने ईरान पर प्रतिबंधों का ऐलान किया था, लेकिन चाबहार पोर्ट को छह महीने की छूट दी थी। भारत को मिलने वाली यह छूट 26 अप्रैल से खत्म हो जाएगी। हाल ही में ट्रंप ने ईरान से व्यापार करने वाले देशों को 25 फीसद टैरिफ की धमकी दी। इसके बाद भारत अन्य विकल्पों पर विचार विमर्श कर रहा है।

 

दरअसल, इकोनॉमिक टाइम्स ने अपनी एक रिपोर्ट में दावा किया था कि भारत लगभग 120 मिलियन अमरीकी डॉलर ट्रांसफर करने की प्रक्रिया में है, ताकि चाबहार पोर्ट प्रोजेक्ट पर सीधे जोखिम को खत्म किया जा सके। यह भी कहा गया कि भारत एक नई इकाई बनाने पर विचार कर रहा है, जिससे चाबहार पोर्ट के विकास कार्य को आगे बढ़ाया जा सके।

 

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जब विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल से चाबहार पोर्ट से पीछे हटने के बारे में पूछा गया तो उन्होंने मीडिया रिपोर्ट का खंडन किया और कहा कि इस मामले में अमेरिका के साथ भारत की बातचीत जारी रहेगी। भारत अपनी भागीदारी के संबंध में कई विकल्पों पर विचार कर रहा है।