भारत के स्कूलों में 0.3 फीसदी छात्र, प्राइमरी स्कूल में पहुंचकर पढ़ाई छोड़ देते हैं। प्राइमरी स्कूल से आगे बढ़कर जो छात्र 5वीं से 8वीं कक्षा तक की पढ़ाई करते हैं, उनमें से 3.5 फीसदी छात्र ऐसे हैं, जो स्कूल छोड़ देते हैं। सेकेंड्री एजुकेशन तक पहुंचकर 11.5 फीसदी छात्र पढ़ाई छोड़ देते हैं। 

प्राइमरी स्कूल छोडने के ये आंकड़े, 2016-17 में 6.35 फासदी तक बढ़े थे, फिर 2022 से 2023 के बीच बढ़कर 7.8 फीसदी तक पहुंचे। यह डर, सबसे ज्यादा रही। साल 2023-24 में यह घटकर 2.9 प्रतिशत तक आया, अब 0.3 फीसदी छात्र, प्राइमरी स्कूल में पढ़ाई छोड़ रहे हैं। 

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सुधार दिख रहा, फिर भी चिंताजनक हैं आंकड़े 

5वीं से 8वीं तक की पढ़ाई छोड़ने का आंकड़ा, साल 2022-23 में 8.1 फीसदी तक पहुंचा था। 2023-24 में सुधकर 5.3 तक आया, अब 3.5 तक पहुंच गया है। सुधार की व्यापक गुंजाइश बची हुई है। 8 से 12वीं तक की पढ़ाई करने वाले करीब 16.4 फीसदी छात्रों ने 2022-23 में स्कूल छोड़ दिया था, 2023-24 में यह आंकड़ा 14.1 प्रतिशत तक पहुंचा, 2024-25 में यह दर 11.5 फीसदी हो गई। 

क्यों डराती है यह रिपोर्ट?

'स्कूल एजुकेशन सिस्टम इन इंडिया' की रिपोर्ट बताती है कि 8वीं से 12वीं तक पढ़ाई करने वाले छात्रों के स्कूल छोड़ने की दर सबसे ज्यादा है। एक बड़ी आबादी, उच्च शिक्षा के लिए जा ही नहीं पाती है। दर में सुधार आ रहा है लेकिन हर 10 में एक छात्र पढ़ाई छोड़ रहा है। नीति आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि बीते 10 साल में सेकेंडरी स्तर पर ड्रॉपआउट दर में सुधार हुआ है, लेकिन स्कूल छोड़ने के मामले, अभी ज्यादा हैं, जिनमें बड़े सुधार की गुंजाइश है। 

क्यों स्कूल छोड़ते हैं छात्र?

साल 2024-25 में देशभर में औसत स्कूल छोड़ने की दर 11.5 प्रतिशत रह गई है। आर्थिक तंगी, जल्दी नौकरी शुरू करने का दबाव, सही काउंसलिंग की कमी और स्कूलों के खराब रवैये की वजह से बच्चे बीच में ही स्कूल छोड़कर भाग रहे हैं। विश्व बैंक के मुताबिक भारत की 27 करोड़ आबादी, आज भी गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करती है। कई समुदाय ऐसे हैं, जिनकी उच्च शिक्षा तक, आर्थिक वजहों से पहुंच ही नहीं हैं। बिहार, झारखंड और पूर्वोत्तर के राज्यों में यह स्थिति ज्यादा खराब है। 


राजेंद्र यादव, शिक्षामित्र हैं। सिद्धार्थनगर के डफरा प्राइमरी स्कूल में उनकी नियुक्ति है। उन्होंने कहा, 'गरीब परिवारों में बच्चे स्कूल छोड़कर काम पर लग जाते हैं या घरेलू जिम्मेदारियों में फंस जाते हैं। लड़कियों को 5वीं के बाद घर के काम-काज में इतना उलझा दिया जाता है कि वे स्कूल छोड़ देती हैं। शिक्षकों की किल्लत, गरीबी और बुनियादी सुविधाओं की कमी भी छात्रों के पढ़ाई छोड़ने की एक वजह है।'

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एक वजह यह है कि सरकारी स्कूलों में एक बड़ी आबादी पढ़ती है। इन स्कूलों में बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं। नीति आयोग की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि 98,592 स्कूलों में लड़कियों के इस्तेमाल लायक शौचालय नहीं हैं। 61540 स्कूलों में शौचालय ही नहीं है। 1,19,000 हजार स्कूल ऐसे हैं, जहां बिजली ही नहीं है। ऐसे में खराब बुनियादी ढांचा भी स्कूलों से बच्चों के मोहभंग होने की एक वजह है। 

किन राज्यों में ज्यादा चिंताजनक हैं आंकड़े?

2024-25 में सबसे ज्यादा ड्रॉपआउट वाले राज्यों में पश्चिम बंगाल है। पश्चिम बंगाल में 20 फीसदी बच्चों ने 8वीं से 12वीं के बीच पढ़ाई छोड़ दी। अरुणाचल प्रदेश दूसरे नंबर है। यहां करीब 18.3 फीसदी बच्चों ने पढ़ाई छोड़ी, कर्नाटक में भी 18.3 प्रतिशत छात्रों ने पढ़ाई छोड़ी। असम में 17.5 फीसदी और मिजोरम-मेघालय में भी 17.4 फीसदी लोगों ने बीच में पढ़ाई छोड़ दी। गुजरात में 16.9 फीसदी, मध्य प्रदेश में 16.8 फीसदी और लद्दाख में 16.2 फीसदी छात्र स्कूल छोड़ रहे हैं।


किन राज्यों में दिखा है सुधार?

चंडीगढ़ में सेकेंड्री स्कूल में ड्रॉपआउट के आंकड़े सिर्फ 2 फीसदी हैं। झारखंड में 3.5 फीसदी, लक्षद्वीप में 4.प्रतिशत, उत्तराखंड 4.6 और केरल में 4.8 प्रतिशत छात्र स्कूल छोड़ते हैं। कई राज्यों ने पिछले सालों में अच्छा सुधार दिखाया है। ओडिशा में ड्रॉपआउट दर 49.5 फीसदी से घटकर 15 फीसदी रह गई है। झारखंड में 23.2 फीसदी से घटकर 3.5 फीसदी, नगालैंड में 35.प्रतिशत से घटकर 12.प्रतिशत हो गई है। बिहार, राजस्थान और केरल में भी सुधार दिखा है।