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जितनी कमाई नहीं, उससे ज्यादा है प्राइवेट स्कूलों की फीस, कैसे पढ़ेंगे बच्चे?

देश के तमाम प्राइवेट स्कूलों की फीस चिंताजनक होती जा रही है। हर साल फीस बढ़ने के बाद यह मामला चर्चा में तो आता है लेकिन इसका कोई समाधान नहीं निकलता।

school fee crisis in india

स्कूलों में बढ़ती फीस से परेशान हैं पैरेंट्स, Photo Credit: Khabargaon

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भारत में स्कूली शिक्षा प्राइवेट और सरकारी दोनों तरह के स्कूलों के सहारे चलती है। देश के 24.69 करोड़ से ज्यादा बच्चे स्कूलों में पढ़ते हैं और इनमें से एक तिहाई से ज्यादा बच्चे प्राइवेट स्कूलों में पढ़ते हैं। अब प्राइवेट स्कूलों की लगातार बढ़ती फीस बेहद परेशान करने वाली है। तमाम रोकथाम के बावजूद इन स्कूलों की फीस इतनी ज्यादा है कि देश की आबादी का एक बड़ा वर्ग इन स्कूलों में अपने बच्चों को पढ़ा ही नहीं सकता है। कई स्कूलों की फीस भारत की प्रति व्यक्ति आय से कई गुना ज्यादा है। महानगरों में रहने वाले लाखों लोग अपने बच्चों को स्कूल में तभी पढ़ा पा रहे हैं जब उनके परिवार में कमाने वाले लोगों की संख्या एक से ज्यादा हो।

 

यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इन्फॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन प्लस (UDISE+) 2024-25 की रिपोर्ट बताती है कि देश के 24.69 करोड़ बच्चों में से 9.58 करोड़ बच्चे यानी लगभग 39 प्रतिशत बच्चे प्राइवेट स्कूलों में ही पढ़ते हैं। इसी का असर है कि हर साल गांवों से लेकर शहरों तक हजारों नए प्राइवेट स्कूल खुलते जा रहे हैं। इन स्कूलों की फीस में तो इजाफा होता ही है। अलग-अलग कारणों से फीस के अतिरिक्त भी पैसे लिए जाते हैं। हाल ही में सोशल मीडिया पर कई स्कूलों का फीस स्ट्रक्चर वायरल हुआ जिसे लेकर खूब चर्चा हो रही है।

कितने महंगे हैं स्कूल?

हाल ही में सोशल मीडिया पर वायरल हुई लिस्ट के मुताबिक, Prometheus स्कूल में नर्सरी के बच्चों की सिर्फ ट्यूशन फीस 1,17,000 रुपये सालाना थी। इसके अलावा, स्कूल बस के पैसे और कई अन्य खर्च अलग से लिए जाते हैं। एक और स्कूल पाथवेज स्कूल, नोएडा में साल 2026-27 के लिए क्लास 1 से 8 तक के बच्चों की सालाना फीस 912000 रुपये है। इसके अलावा, 2 लाख रुपये की एडिमिशन फीस, 35 हजार रुपये की रजिस्ट्रेशन फीस, ट्रांसपोर्ट फीस, लर्निंग सपोर्ट के 1.75 लाख रुपये और इंग्लिश सपोर्ट के 1.45 लाख रुपये अलग से देने होंगे। इसमें से कुछ फीस वैकल्पिक हैं यानी अगर आप ये सुविधाएं नहीं लेते हैं तो आपको ये पैसे नहीं देने होंगे।

 

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इसी तरह स्टेप बाय स्टेप स्कूल में नर्सरी की सालाना फीस 4.71 लाख रुपये, शिव नाडर स्कूल की सालना फीस 4.47 लाख रुपये और द श्रीराम मिलेनियम स्कूल की सालाना फीस लगभग 2.3 लाख रुपये है। इन स्कूलों की महीने की औसत फीस निकालें तो लगभग 10 से 30 हजार रुपये महीने की बनती है। जाहिर सी बात है कि इतनी महंगी फीस है तो सुविधाएं भी उसी तरह की होती हैं। अच्छे कमरे, अच्छी सीट और बाकी सुविधाएं भी स्कूल में उपलब्ध हैं। हालांकि, यहां हमारा सवाल मूल रूप से शिक्षा की उपलब्धता और हर व्यक्ति तक उसकी पहुंच को लेकर है।

 

अगर इसी औसत फीस की तुलना भारत में प्रति व्यक्ति आय से करें तो पता चलता है कि लोगों की कमाई ही इस फीस से कम है। साल 2025-26 के इकनॉमिक सर्वे के मुताबिक, साल 2024-25 में भारत के हर व्यक्ति का सालाना आय 205324 रुपये थी। 2025-26 में इसके 219575 रुपये रहने का अनुमान है। अब अगर इस महीने के हिसाब से देखें तो प्रति व्यक्ति आय लगभग 18 हजार रुपये बनती है।

 

students in private and govt schools

अच्छी शिक्षा की गारंटी नहीं हैं महंगे स्कूल

इन स्कूलों में लाखों की फीस देने के बावजूद बच्चों को अच्छी शिक्षा नहीं मिल पा रही है। ना तो बच्चों पर पर्याप्त ध्यान दिया जाता है और ना ही उनका शैक्षणिक विकास अपेक्षित रूप से होता है। 2025 में आए नेशनल सैंपल सर्वे के डेटा के मुताबिक, दिल्ली में 10 में से 4 यानी 40 प्रतिशत बच्चे स्कूल के बाद ट्यूशन भी पढ़ते हैं। वहीं, राष्ट्रीय स्तर पर 27 प्रतिशत बच्चे स्कूलों के अलावा ट्यूशन भी पढ़ते हैं। जैसे-जैसे बच्चे आगे बढ़ते हैं कोचिंग पर उनकी निर्भरता बढ़ती जाती है। IIT-JEE और NEET जैसी परीक्षाओं की तैयारी पूरी तरह से कोचिंग पर ही आश्रित है। 

 

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प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे भी महंगे कोचिंग संस्थानों पर ही निर्भर हैं और अच्छी रैंक लाने के लिए स्कूल और कोचिंग से इतर खुद भी घंटों मशक्कत करके पढ़ाई करनी पड़ती है। यह दिखाता है कि भले ही स्कूलों की फीस बहुत महंगी हो, कोचिंग संस्थान महंगे हो लेकिन वे अच्छी शिक्षा की गारंटी तो कतई नहीं हैं।

हर साल बढ़ रही फीस

महंगी फीस स्थायी भी नहीं रहती है। हर साल इस फीस में जबरदस्त इजाफा होता है। कई स्कूलों में 20 से 35 प्रतिशत तक का इजाफा देखने के मामले भी सामने आ चुके हैं। LocalCircles का एक सर्वे के मुताबिक, 44 पर्सेंट पैरेंट्स ने माना कि 2022 से 2025 के बीच स्कूल की फीस में 50 से 80 प्रतिशत बढ़ोतरी हुई। सिर्फ 13 पर्सेंट पैरेंट्स ने कहा कि फीस में बढ़ोतरी नहीं हुई। 

 

साल 2025-26 के बारे 81 प्रतिशत पैरेंट्स ने माना कि लगभग 10 पर्सैंट बढ़ोतरी हुई। वहीं, 22 पर्सेंट पैरेंट्स ने माना कि स्कूल की फीस लगभग 30 पर्सेंट बढ़ वहीं। वहीं, लोगों की सैलरी औसतन 9 से 10 प्रतिशत ही बढ़ी। यानी स्कूल में तो ज्यादा पैसे देने ही पड़े, घर में होने वाली बचत में भी कमी हो गई।

 

people economic status in india

कितने लोगों से दूर हो रही है शिक्षा?

इसे उदाहरण से समझिए। दिल्ली में प्रति व्यक्ति आय 5.31 लाख रुपये सालाना है। वहीं, प्राइवेट एजेंसियों का आकलन देखें तो दिल्ली-एनसीआर में एक बड़ी आबादी ऐसी भी है जिसकी सालाना आय 8 लाख से लेकर 30 लाख रुपये तक भी है। इस आबादी में बड़ा हिस्सा सैलरी से कमाने और EMI पर खर्च करने वाला है। अगर एक परिवार की महीने की कमाई 2 लाख रुपये है तो उसके घर या फ्लैट की EMI 30 से 50 हजार रुपये महीने, कार की EMI 15 से 25 हजार रुपये, अन्य खर्च लगभग 25 से 30 हजार रुपये महीने हो सकते हैं।

 

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अगर ऐसे परिवार घर में हाउसहेल्प की मदद लेते हैं तो हर महीने आपके 4 से 5 हजार रुपये खर्च हो जाते हैं। अब अगर इस परिवार में एक भी बच्चा है तो उस इन स्कूलों में भेजने के लिए 25 से 30 हजार रुपये महीने खर्च करने पड़ते हैं। अगर इसी परिवार में एक से ज्यादा बच्चे हों तो उन्हें स्कूल भेजना, पढ़ाना और अन्य खर्चे संभालना मुश्किल हो जाता है। 

क्यों है ऐसी समस्या?

भारत शिक्षा पर अपनी GDP का लगभग 4 प्रतिशत ही खर्च करता है जो कि दूसरे विकसित देशों की तुलना में काफी कम है। भारत से बड़ी इकॉनमी वाले देश अपनी जीडीपी का 6 से 7 प्रतिशत पैसा शिक्षा पर खर्च करते हैं। कम खर्च के कारण भारत में सरकारी स्कूली शिक्षा की व्यवस्था बेहद लचर है। भारत में केंद्रीय विद्यालय, नवोदय विद्यालय और सैनिक स्कूल जैसे अच्छे स्कूल तो हैं लेकिन पढ़ने वाले बच्चों की तुलना में उन स्कूलों की संख्या बेहद कम है।

 

यहीं से जो जरूरत पैदा होती है उसे भरने वाले प्राइवेट प्लेयर्स का बिजनेस शुरू होता है और शिक्षा की पैकेजिंग की जाती है। अच्छी बिल्डिंग, बेहतर प्रजेंटेशन और पढ़ाई से इतर कई अन्य गतिविधियों का लालच दिखाकर ये प्राइवेट स्कूल अपनी फीस लाखों में पहुंचा देते हैं। मेट्रो शहरों में रहने वाले सैलरी क्लास के लोगों 'अच्छी शिक्षा' के लिए अपने बच्चों को इन स्कूलों में भेजने पर मजबूर होते हैं और मोरी रकम चुकाने के लिए उनके पास कोई और रास्ता नहीं होता है। 

कितना कमाते हैं भारत के लोग?

साल 2023-24 में ITR फाइल करने वाले लगभग 8 करोड़ लोगों में से लगभग 4 करोड़ लोग ऐसे थे जिनकी सालाना आय 5 लाख रुपये से कम थी। 1.28 करोड़ लोग ऐसे जिनकी आय 5 से 10 लाख सालाना और 50 लाख लोग ऐसे थे जिनकी सालाना आय 10 से 15 लाख रुपये के बीच में थी। यह दिखाता है कि ITR फाइल करने वाले परिवार भी महंगे स्कूलों में अपने बच्चों को नहीं पढ़ा सकते हैं। अगर किसी के परिवार में एक से ज्यादा बच्चे हैं और वे मेट्रो शहरों में रहते हैं तो उनके लिए सभी बच्चों को इन महंगे स्कूलों में भेज पाना दूर की कौड़ी है।

 

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आखिरी जनगणना साल 2021 में होने के कारण भारत के लोगों की आय के ताजा आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में कई निजी संस्थाओं के सर्वे के आंकड़ों पर ही भरोसा करना होगा। अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की 'द डिस्ट्रिब्यूशन ऑफ हाउसहोल्ड इनकम, 2019-2024' के मुताबिक, साल 2023-24 में भारत के 10 प्रतिशत सबसे गरीब लोग महीने भर में सिर्फ 1059 रुपये ही कमा पा रहे थे। वहीं, सबसे अमीर 10 प्रतिशत लोगों की औसत आय 20,380 रुपये ही थी। यह रिपोर्ट दिखाती है कि पिछले 2019 से 2024 के बीच लगभग हर आय वर्ग की कमाई में 6 से 10 प्रतिशत के बीच ही इजाफा हुआ। 


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