असम विधानसभा के लिए अगले हफ्ते 9 अप्रैल को वोटिंग होगी। राज्य की जनता 126 सीटों पर अपने प्रतिनिधियों का चयन करेगी और तय करेगी की अगले पांच साल तक राज्य की सत्ता किस पार्टी और नेता के हाथ में रहेगी। 10 साल से सत्ता पर काबिज बीजेपी बहुसंख्यक हिंदू आबादी के वोटों के जरिए जीत का दम भर रही है और कह रही है कि दिल्ली की सत्ता की तरह गुवाहटी में भी बीजेपी की हैट्रिक तय है। कांग्रेस ने भी गठबंधन बनाकर बीजेपी को हराने का प्लान बनाया है और चुनावी अभियान में जुटी हुई है। कांग्रेस को अल्पसंख्य वोटों से बहुत उम्मीद है लेकिन इस बार 2021 चुनाव के उनके साथी और असम में बड़े मुस्लिम नेता बदरुद्दीन अजमल उनके साथ नहीं है। कांग्रेस ने खुद बदरुद्दीन अजमल की पार्टी से किनारा कर लिया है। ऐसे में कांग्रेस मुस्लिम वोटों को लेने के लिए क्या प्लान बना रही है हर किसी के मन में यही सवाल है।

 

2021 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने भारतीय जनता पार्टी को सत्ता से बाहर करने के लिए और मुस्लिम वोटबैंक को एकजुट करने की रणनीति से अपने पुराने विरोधी और बदरुद्दीन अजमल की पार्टी  एआईयूडीएफ से गठबंधन किया था। असम में 35 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता हैं और कांग्रेस को इन वोटों के बंटवारे का डर था। इसी डर के कारण कांग्रेस ने अजमल की पार्टी से हाथ मिलाया था ताकि मुस्लिम एकजुट होकर कांग्रेस के गठबंधन को वोट करें और उनकी सत्ता में वापसी सुनिश्चित हो सके। 

 

यह भी पढ़ें: तीन हिस्सों में बंटा असम, 1 में बीजेपी, 1 में कांग्रेस और एक बना किंगमेकर

AIUDF से अब दूरी क्यों बना रही कांग्रेस?

कांग्रेस पार्टी ने 2021 के विधानसभा चुनाव के बाद AIUDF से गठबंधन तोड़ दिया था। इस साल हो रहे विधानसभा चुनाव में भी पार्टी बिना AIUDF के चुनावी मैदान में उतर चुकी है। कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव में और अब विधानसभा चुनाव में भी AIUDF से दूरी बना रखी है। कांग्रेस को लगता है कि 2021 में उन्हें बदरुद्दीन अजमल का साथ बहुत मंहगा पड़ा। राजनीतिक जानकारों का भी मानना है कि कांग्रेस और AIUDF के गठबंधन से बीजेपी की लड़ाई आसान हो गई। 2021 के चुनावों में कांग्रेस की हार पर असम से सीनियर पत्रकार बैकुंठ नाथ गोस्वामी ने कहा था कि कांग्रेस-AIUDF के गठबंधन के सहारे बीजेपी को सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने का अच्छा मौका मिल गया। AIUDF को गठबंधन में साथ लेने से बीजेपी के लिए हिंदू वोटर एकजुट हो गए, जिससे कांग्रेस को मुस्लिम बहुल सीटों पर तो जीत मिल गई लेकिन अन्य सीटों पर हार का सामना करना पड़ा। 

 

चुनावों से पहले बीजेपी को ऊपरी असम की सीटों पर नुकसान होने का अनुमान लगाया जा रहा था लेकिन चुनावी नतीजे इसके बिल्कुल विपरीत रहे। ऊपरी असम में बीजेपी ने एकतरफा जीत दर्ज की और मध्य असम में सहयोगियों के सहारे कांग्रेस गठबंधन को पीछे छोड़ दिया। कांग्रेस को AIUDF से गठबंधन कर सिर्फ निचले असम में ही फायदा हुआ लेकिन उसके बदले ऊपरी असम में नुकसान उठाना पड़ गया, जिसका नतीजा हार मिली। 

क्या है कांग्रेस का प्लान?

बदरुद्दीन अजमल के बिना ही कांग्रेस चुनावी मैदान में कूद गई है इसके पीछे कारण साफ हैं की कांग्रेस इस बार बीजेपी को वोटों के ध्रुवीकरण का मौका नहीं देना चाहती। गठबंधन टूटने का मुख्य कारण ऊपरी असम है। इसके अलावा पिछले 5 सालों में बदली राजनीति भी एक मुख्य कारण है। सीएम हिमंत सरमा खुले मंचों से मुस्लिमों पर हमले करते हैं और विवादित बयान देते हैं। ऐसे में मुस्लिम वोट उन्हें नहीं मिल सकते और कांग्रेस को लगता है कि मुस्लिम आबादी समझती है कि बीजेपी का विकल्प AIUDF कभी नहीं हो सकती। 

 

ऊपरी असम में पिछली बार कांग्रेस को बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा था। ऊपरी असम की 35 में से 30 सीटों पर बीजेपी को जीत मिली थी। कांग्रेस गठबंधन को सिर्फ 5 सीटें ही मिली थीं। तिनसुकिया, शिवसागर, डिब्रूगढ़, जोरहाट जैसे जिले इस इलाके में आते हैं और बीजेपी इन जिलों में काफी ज्यादा मजबूत है। इस बार इस इलाके में परिसीमन के बाद बीजेपी को और ज्यादा मजबूत माना जा रहा है क्योंकि जनजातीय आबादी इस इलाके में बढ़ गई है। अवैध प्रवासियों का मुद्दा भी काफी अहम है। 2021 के चुनाव में बदरुद्दीन अजमल के कारण इस इलाके में कांग्रेस को नुकसान हुआ था। कांग्रेस ऊपरी असम में इस बार सीटें जीतना चाह रही है और ऊपरी असम के लोग बदरुद्दीन अजमल को कभी स्वीकार नहीं करेंगे। 

क्या परिसीमन है कारण?

2023 में राज्य में परिसीमन हुआ। इससे ऊपरी असम के इलाके की करीब 40 सीटों पर जंग दिलचस्प हो गई है। पहले असम में कुल 27-28 सीटें ऐसी थीं, जिन पर मुस्लिम समुदाय के उम्मीदवारों की जीत होती थी लेकिन अब परिसीमन की वजह से इनकी संख्या कम होकर 22-23 रह गई है। ऐसे में बीजेपी को परिसीमन की वजह से पांच सीटें ज्यादा मिलने की उम्मीद है। कांग्रेस अगर AIUDF से गठबंधन करती है तो हिंदू वोट बीजेपी के साथ एकतरफा चला जाएगा और इसका सीधा नुकसान कांग्रेस को होगा। इसलिए कांग्रेस मुस्लिम वोटों के साथ-साथ हिंदू वोटों को अपने साथ लाने की रणनीति पर काम कर रही है। 

 

यह भी पढ़ें: BJP की पिच को कैसे ढाल बना रही कांग्रेस? गौरव गोगोई का 'करप्शन' प्लान समझिए

कैसे मिलेगा कांग्रेस को मुस्लिम वोट?

2021 के विधानसभा चुनाव में बदरुद्दीन अजमल की पार्टी ने 20 सीटों पर चुनाव लड़ा था और 16 पर जीत दर्ज की थी। हालांकि, लोकसभा चुनाव में खुद बदरुद्दीन अजमल भी कांग्रेस से हार गए। कांग्रेस इस बार AIUDF से गठबंधन के बजाय अन्य छोटी पार्टियों से गठबंधन कर जीत दर्ज करना चाहती है। कांग्रेस के साथ अब कुल 5 अन्य पार्टियां शामिल हैं जिसमें अखिल गोगोई की पार्टी रायजोर दल, असम जातीय परिषज (एजेपी), सीपीआई(एम), ऑल पार्टी हिल लीडर्स कॉन्फ्रेंस और सीपीआई(एमएल) शामिल हैं। कांग्रेस अब इन दलों के सहारे मुस्लिम वोट के साथ-साथ स्थानीय समुदायों के वोट का समीकरण बनाने की कोशिश कर रही है। 

AGP से मिलेगी चुनौती

बीजेपी भले ही मुस्लिमों पर सोशल मीडिया या मंचों से हमले कर रही हो लेकिन एनडीए में शामिल असम गण परिषद ने अपने हिस्से की 50 प्रतिशत सीटों पर बंगाली मुस्लिमों को टिकट देकर कांग्रेस की राह मुस्किल कर दी है। पार्टी ने 26 में से 13 सीटों पर बांग्ला भाषी मुस्लिमों को टिकट दिया है। हालांकि, उनकी यह सूची कांग्रेस से ज्यादा AIUDF को परेशान कर सकती है क्योंकि बदरुद्दीन अजमल को बंगाली मुस्लिमों का ही ज्यादा साथ मिलता रहा है।