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तीन हिस्सों में बंटा असम, 1 में बीजेपी, 1 में कांग्रेस और एक बना किंगमेकर

असम की राजनीति को समझने के लिए असम को भूगोल के हिसाब से तीन हिस्सों में बांटा जाता है। इन तीन हिस्सों में से बीजेपी और कांग्रेस 1-1 में आगे हैं लेकिन तीसरे हिस्से में खेल हो जाता है।

Assam Politics

असदुद्दीन ओवैसी, बदरुद्दीन अजमल, गौरव गोगोई और हिमंत बिस्व सरमा। Photo Credit: Khabargaon

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असम विधानसभा चुनावों को लेकर तैयारीयां चल रही हैं। राज्य की सभी 126 सीटों पर 9 अप्रैल को वोटिंग होगी। 4 मई को पता चल जाएगा कि राज्य की जनता किस पार्टी पर विश्वास करती है। असम में साल 2021 में हुए विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने जीत दर्ज की थी। बीजेने के अपनी 93 सीटों में से 60 सीटों पर जीत दर्ज की थी और एनडीए को कुल 75 सीटों पर जीत मिली थी। असम के भूगोल के हिसाब से ही इसकी राजनीति भी तीन हिस्सों में बंटी हुई है। असम की राजनीति को समझने के लिए इन तीन हिस्सों को समझना होगा। 

 

असम की राजनीति को समझना मुश्किल काम है। असम की राजनीति ऊपरी असम, मध्य असम (बोडोलैंड क्षेत्र ) और निचले असम में बंटी है। इन तीनों क्षेत्रों में राजनीति एक दूसरे से काफी अलग है। इन तीनों इलाकों में अलग-अलग मुद्दे हैं और यहां अलग-अलग पार्टियों का दबदबा है। कहीं हिंदू आबादी बहुमत में है तो कहीं मुस्लिम आबादी का दबदबा है। ऐसे में असम की राजनीति को समझने के लिए इन तीनों क्षेत्रों की राजनीति को अलग-अलग समझना जरूरी है। 

 

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2021 में क्या हुआ था?

2021 के विधानसभा चुनावों में ऊपरी असम में एनडीए और बीजेपी को बढ़त मिली थी। वहीं, निचले असम में मुकाबला बराबरी का रहा था। मध्य असम में मिलाजुला रिजल्ट रहा। हालांकि, अब 2023 के बाद से तीनों क्षेत्रों में बड़ा बदलाव आया है। 2023 के परिसीमन के बाद बदली सीट संरचना, सीमावर्ती जिलों में पहचान की राजनीति और नए मतदाताओं के जुड़ने से इस बार चुनावी समीकरण और भी पेचीदा हो गया है। 2021 में भले ही एनडीए को 75 सीटें मिली हों और कांग्रेस गठबंधन को 50 लेकिन दोनों गठबंधनों के वोट शेयर में मात्र 3 प्रतिशत का अंतर था।  

ऊपरी असम में बीजेपी का दबदबा

भारतीय जनता पार्टी असम में विधानसभा जीत का दावा ठोक रही है और राजनीतिक जानकार भी मान रहे हैं कि बीजेपी असम में तीसरी बार सरकार बना सकती है। इसके पीछे मुख्य कारक ऊपर असम है। इस क्षेत्र को बीजेपी की चुनावी रीढ़ भी कहा जा सकता है क्योंकि इस क्षेत्र की कुल 35 सीटों में से बीजेपी को 30 सीटें मिली थीं। कांग्रेस गठबंधन को सिर्फ 5 सीटें ही मिली थीं। तिनसुकिया, शिवसागर, डिब्रूगढ़, जोरहाट जैसे जिले इस इलाके में आते हैं और बीजेपी इन जिलों में काफी ज्यादा मजबूत है। इस बार इस इलाके में परिसीमन के बाद बीजेपी को और ज्यादा मजबूत माना जा रहा है क्योंकि जनजातीय आबादी इस इलाके में बढ़ गई है। 

 

ऊपरी असम में अवैध प्रवासियों का मुद्दा काफी अहम है। 2016 के चुनाव में बीजेपी ने इस मुद्दे को बुनाया था और इसका फायदा भी पार्टी को हुआ था। स्थानीय समुदायों को लगता है कि प्रवासियों से उनकी भाषाई और सांस्कृतिक पहचान को खतरा है। इसके अलावा बाढ़ और कटाव, चाय बागान मजदूरों की समस्याओं के साथ-साथ अलग-असद जातीय और राजनीतिक समूहों की स्वायत्ता की मांग है। 

निचला असम

अगर ऊपरी असम को बीजेपी की चुनावी रीढ़ कहा जा सकता है तो निचले असम को कांग्रेस की एकमात्र उम्मीद भी कहा जा सकता है। धुबरी, बारपेटा, गोलपाड़ा जैसे मुस्लिम बहुल जिलों वाला यह क्षेत्र बांग्लादेश सीमा से सटा हुआ है। इस इलाके में पहचान की राजनीति काफी ज्यादा हावी रहती है और कांग्रेस और एआईयूडीएफ का इस इलाके में काफी प्रभाव है।  एआईयूडीएफ को असम में 16 सीटें मिली थीं, जिनमें से ज्यादातर सीटें इसी इलाके से आई थी। इस इलाके की कुल 50 सीटों में से 23 सीटें एनडीए के पक्ष में गई, जबकि 27 सीटों पर कांग्रेस गठबंधन की जीत हुई। 

 

इस क्षेत्र में ध्रुवीकरण की राजनीति जमकर चलती है। बांग्लादेश की सीमा के पास होन के कारण इस इलाके में अवैध प्रवासी भी बांग्लादेश से आकर बसे हुए हैं, जिन्हें बीजेपी और एनडीए मुद्दा बनाती है। हालांकि, एआईयूडीएफ और कांग्रेस का कहना है कि बीजेपी बांग्लादेशी अवैध प्रवासियों के बहाने स्थानीय मुस्लिों को निशाना बना रही है। इसके अलावा भूमि अतिक्रमण, ब्रह्मपुत्र नदी के कारण बाढ़-कटाव और क्षेत्रीय विकास और आर्थिक असमानता इस क्षेत्र के प्रमुख मुद्दे हैं। इस क्षेत्र में बजरुद्दीन अजमल और अन्य मुस्लिम नेताओं का बोलबाला है। इस बार AIMIM पार्टी ने भी असम में ताल ठोक दी है। 

 

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मध्य असम बना किंग मेकर

ऊपरी असम में बीजेपी और निचले असम में काग्रेस गठबंधन को 2021 में जमकर समर्थन मिला लेकिन मध्य असम में क्षेत्रीय दल किंग मेकर बनकर उभरे। मध्य असम में नगांव, मोरीगांव के साथ बोडोलैंड क्षेत्र शामिल है, जहां जातीय और क्षेत्रीय राजनीति का प्रभाव ज्यादा है। इस इलाके में कुल 41 विधानसभा सीटें हैं। 2021 के चुनाव में यहां बीजेपी गठबंधन को 22 सीटों पर जीत मिली थी और कांग्रेस गठबंधन को 16 मिली। इसके अलावा स्थानीय पार्टियों को भी यहां 3 सीटों पर जीत मिली। 

 

मध्य असम में अवैध प्रवासन, सांस्कृतिक पहचान का खतरा, भूमि अतिक्रमण, ब्रह्मपुत्र नदी के कारण बाढ़-कटाव, और क्षेत्रीय विकास व आर्थिक असमानता प्रमुख मुद्दे हैं। यहां स्थानीय और सांस्कृतिक पहचान का मुद्दा प्रमुख रहता है जिसके चलते स्थानीय पार्टियों का दबदबा है। 


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