पश्चिम बंगाल में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन को बेहद अहम माना जा रहा है। अभी तक इस प्रक्रिया से लगभग 90.83 लाख हटा दिए गए हैं। अगर इसे राज्य की 294 विधानसभा सीटों के हिसाब से देखें तो एक सीट पर औसतन 30 हजार वोट कम हुए हैं। यही वजह है कि तृणमूल कांग्रेस (TMC) इसे लेकर हमलावर है और वह शुरुआत से ही SIR का विरोध कर रही है। इस विरोध की एक वजह यह भी है कि 2021 के विधानसभा चुनाव में राज्य की 194 सीटें ऐसी थीं जिन पर जीत और हार का अंतर 30 हजार वोटों से कम था। यानी जितने मतदाताओं के नाम हटे हैं, उससे कम वोटों के अतंर से ही जीत या हार का फैसला हो सकता है। 

 

रोचक बात है कि 2021 में बीजेपी का साथ देने वाले मतुआ समुदाय के लोग जिन सीटों पर अच्छी-खासी संख्या में हैं, वहां भी खूब वोट कटे हैं। इसके चलते भारतीय जनता पार्टी (BJP) भी संशय में है। अब स्थिति ऐसी बन रही है कि कई सीटों पर एक-एक वोट की लड़ाई होने वाली है और बूथ मैनेज करने वाले कार्यकर्ताओं पर दबाव बढ़ गया है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस स्थिति में TMC बाकी के दलों पर भारी पड़ सकती है क्योंकि पश्चिम बंगाल में वह इकलौती पार्टी है जिसका संगठन हर विधानसभा सीट पर मजूबत स्थिति में है।

SIR का कितना असर हुआ?

पश्चिम बंगाल में SIR के तहत 90.83 लाख से ज्यादा वोटरों के नाम हटाए जा चुके हैं। अब राज्य के कुल मतदाताओं की संख्या 7.66 करोड़ से घटकर 6.77 करोड़ रह गई है, लिहाजा दोनों प्रमुख दलों को इस महीने दो चरण में होने वाले चुनाव अलग परिस्थितियों में लड़ने होंगे। इस बार परिस्थितियां 2021 के चुनाव की तुलना में काफी अलग हैं, जिनमें ममता बनर्जी की जीत हुई थी। SIR का सबसे ज्यादा असर उन जिलों में पड़ा है, जो लंबे समय से बंगाल की सत्ता तय करते रहे हैं। इनमें अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्र और दक्षिण बंगाल हैं जो 2011 से तृणमूल कांग्रेस के गढ़ रहे हैं। दूसरी ओर उत्तर 24 परगना, नदिया और उत्तर बंगाल के कुछ हिस्सों में मतुआ-शरणार्थी क्षेत्र में 2019 के बाद बीजेपी मजबूत हुई। हालांकि, इसका राजनीतिक असर हर जगह समान नहीं है। 

 

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दक्षिण बंगाल में तृणमूल की पकड़ कुछ कमजोर होती दिख रही है जबकि उत्तर बंगाल और जंगलमहल में बीजेपी अब भी मजबूत है लेकिन बीजेपी का सबसे अहम सामाजिक आधार यानी मतुआ वोट अब पहले जैसा सुरक्षित नहीं दिख रहा। तृणमूल कांग्रेस के गढ़ माने जाने वाले जिलों उत्तर और दक्षिण 24 परगना, मुर्शिदाबाद, नदिया, मालदा, हुगली, हावड़ा, उत्तर दिनाजपुर और पूर्व बर्धमान में कुल मिलाकर करीब 66.6 लाख नाम हटाए गए हैं, जो राज्य में हटाए गए नामों का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा है। इन जिलों में 294 में से 178 विधानसभा क्षेत्र आते हैं। साथ ही, मतुआ बहुल 55 सीट पर भी एसआईआर का बड़ा असर पड़ा है, जिससे बीजेपी के भरोसेमंद वोट बैंक में अस्थिरता आई है।

 

बांग्लादेश सीमा से लगे जिलों में सबसे ज्यादा बदलाव देखने को मिला है, जहां नागरिकता और प्रवासन लंबे समय से तृणमूल कांग्रेस और बीजेपी के बीच राजनीतिक मुद्दा रहे हैं। उत्तर 24 परगना (31 सीट) में 12.6 लाख, दक्षिण 24 परगना (33 सीट) में 10.91 लाख, मुर्शिदाबाद (22 सीट) में 7.48 लाख, नदिया (17 सीट) में 4.85 लाख और मालदा (16 सीट) में 4.59 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं।

 

राजनीतिक विश्लेषक बिश्वनाथ चक्रवर्ती के अनुसार, 'तृणमूल कांग्रेस की राज्यव्यापी बढ़त तीन स्तंभों पर टिकी है—अल्पसंख्यक क्षेत्र, महिला मतदाता और उत्तर एवं दक्षिण 24 परगना जिले। अगर इन क्षेत्रों में उसकी बढ़त थोड़ी कम रहती है, तो बीजेपी कई सीट पर मुकाबले में आ सकती है।'

2021 में क्या हुआ था?

2021 के विधानसभा चुनाव के नतीजों को देखें तो 7 विधानसभा सीटें ऐसी थीं जहां जीत और हार का अंतर 1000 से भी कम वोट का था। इनमें से 3 पर बीजेपी और 4 पर TMC को जीत मिली थी। 5 सीटों पर जीत और हार का अंतर 1000 से 2000 वोटों का था और इनमें से पांचों सीटों पर बीजेपी को जीत मिली थी। 7 सीटें ऐसी थीं जिन पर जीत और हार का अंतर 2000 से 3000 वोटों का था। इनमें से 4 सीटों पर टीएमसी और तीन पर बीजेपी को जीत मिली थी। 3000 से 4000 वोटों के अंतर वाली कुल 10 सीटें थीं और इनमें से 3 पर बीजेपी, 6 पर टीएमसी और 1 पर निर्दलीय उम्मीदवार को जीत मिली थी। 4000 से 5000 वोटों के अंतर वाली कुल 7 सीटें थीं, इन सातों ही सीटों पर बीजेपी को जीत मिली थी।

 

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ये आंकड़े दिखाते हैं कि कुल 36 सीटें ऐसी थीं जिन पर जीत और हार का अंतर 5000 से भी कम वोट का था। इनमें से 21 सीटों पर बीजेपी, 14 पर टीएमसी और 1 पर निर्दलीय उम्मीदवार को जीत मिली थी। अब वोटों का कटना इन सीटों के नतीजों को किसी भी दिशा में मोड़ सकता है और एक बड़ी संख्या में सीटें इधर से उधर हो सकती हैं। बता दें कि साल 2021 में तृणमूल कांग्रेस ने कम से कम 45 सीट 10,000 से कम अंतर से जीती थीं, जबकि बीजेपी ने भी लगभग 20 सीट इसी अंतर से जीती थीं।

 

2021 के चुनाव में कुल 194 सीटें ऐसी थीं जिन पर हार और जीत का अंतर 30 हजार से कम वोटों का था। 63 सीटें ऐसी थीं जिन पर हार और जीत का अंतर 10 से 20 हजार वोटों का था और 10 हजार से कम अंतर वाली सीटों की संख्या 69 थी। ये आंकड़े दिखाते हैं कि पश्चिम बंगाल की एक तिहाई ऐसी हैं जिन पर वोटों की संख्या बढ़ने या घटने के चलते चुनाव नतीजे प्रभावित हो सकते हैं।


मतदाताओं में डर का माहौल

SIR के बाद वोटर लिस्ट में लैंगिक संतुलन भी बदला है। पहले प्रति 1000 पुरुषों पर 959 महिला मतदाता थीं, जो अब घटकर 950 रह गई हैं। इससे तृणमूल कांग्रेस के एक और मजबूत आधार महिला वोट पर असर पड़ने का संकेत मिलता है। हालांकि, इस बदलाव का उल्टा असर भी हो सकता है। अल्पसंख्यक बहुल जिलों में इस प्रक्रिया से असुरक्षा की भावना बढ़ी है, जिससे मुस्लिम मतदाता तृणमूल के पक्ष में और ज्यादा एकजुट हो सकते हैं। इससे छोटे दलों जैसे इंडियन सेकुलर फ्रंट (आईएसएफ), आम जनता उन्नयन पार्टी (एजेयूपी) और ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीनए (आईएमआईएम) को नुकसान हो सकता है।

 

राजनीतिक विश्लेषक सुमन भट्टाचार्य के अनुसार, 'अगर असुरक्षा की भावना से पूरी तरह एकजुटता आती है, तो तृणमूल कांग्रेस नुकसान की भरपाई कर सकती है।’ बीजेपी के लिए सबसे बड़ी चिंता मतुआ शरणार्थी क्षेत्र है, जहां समुदाय के नेताओं का दावा है कि करीब 70 प्रतिशत परिवार एसआईआर से प्रभावित हुए हैं। करीब 1.3 करोड़ मतदाताओं वाले मतुआ समुदाय का असर कम से कम 55 सीट पर है और 2021 के चुनाव में बीजेपी के खाते में आईं 77 सीट में से आधी से ज्यादा इसी क्षेत्र की थीं। नदिया में सबसे ज्यादा असर पड़ा, जहां जांच के दायरे में आए लगभग 78 प्रतिशत मतदाताओं के नाम हटा दिए गए।

 

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हालांकि, बीजेपी को उम्मीद है कि उत्तर बंगाल में उसे कुछ राहत मिल सकती है, जहां उसकी स्थिति मजबूत है और हटाए गए नामों का असर अधिकतर अल्पसंख्यक क्षेत्रों में पड़ा है। कूचबिहार में 2.42 लाख, जलपाईगुड़ी में 2.01 लाख, दार्जिलिंग में 1.9 लाख और उत्तर दिनाजपुर में 3.63 लाख मतदाता सूची से हटाए गए हैं। जंगल महल क्षेत्र में भी बीजेपी का मुख्य वोट बैंक अपेक्षाकृत सुरक्षित दिख रहा है। झारग्राम में केवल 55,364, पुरुलिया में 1.91 लाख और बांकुड़ा में 1.43 लाख नाम हटाए गए हैं। तृणमूल के नेताओं का आरोप है कि इस प्रक्रिया ने अल्पसंख्यकों, महिलाओं और प्रवासी मजदूरों को ज्यादा प्रभावित किया है, जो पार्टी के प्रमुख समर्थक रहे हैं। सबसे बड़ी अनिश्चितता उन सीट पर है, जहां जीत का अंतर कम था। 120 से अधिक सीट पर हटाए गए मतदाताओं की संख्या 2021 विधानसभा या 2024 लोकसभा चुनाव में जीत के अंतर से ज्यादा है।

(न्यूज एजेंसी भाषा के इनपुट्स के साथ)