बंगाल और असम में क्यों फेल हो जाती है असदुद्दीन ओवैसी की सियासत?
असम में AIUDF को असदुद्दीन ओवैसी ने समर्थन दिया है लेकिन वह बिहार की तरह उत्साहित नहीं है। ऐसा क्यों है, आइए समझते हैं।

AIMIM चीफ असदुद्दीन ओवैसी। Photo Credit: PTI
देश की सियासत में ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन(AIMIM) ऐसी पार्टी है, जिस पर विपक्षी, सिर्फ मुस्लिम राजनीति करने का ठप्पा लगाते हैं। पार्टी के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी को इस ठप्पे से कोई ऐतराज नहीं है। वह दावा करते हैं कि कोई पर्दानशीं महिला एक न एक दिन जरूर भारत की प्रधानमंत्री बनेगी।
असदुद्दीन ओवैसी का सियासी सफर, तेलंगाना से शुरू होकर महाराष्ट्र और बिहार तक, सफलता की इबारत लिख रहा है। महाराष्ट्र में उनकी पार्टी ने स्थानीय निकाय चुनावों में कमाल किया है। बीएमसी में भी कामयाबी हासिल की है। बिहार में उनकी पार्टी से 5 विधायक हैं। तेलंगाना में 7 विधायक हैं।
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कई राज्यों में कामयाब ओवैसी के साथ लेकिन ऐसा क्या है कि उन्हें उन राज्यों में सफलता नहीं मिल रही है, जहां मुस्लिम निर्णायक स्थिति में हैं?
असदुद्दीन ओवैसी, अध्यक्ष, AIMIM:-
मेरा सपना है कि एक दिन हिजाब पहनने वाली बेटी भारत की प्रधानमंत्री बनेगी। मैं शायद उस दिन जिंदा न रहूं लेकिन वह दिन जरूर आएगा।
असम और पश्चिम बंगाल में मुस्लिम वोटर कितने मजबूत?
असदुद्दीन ओवैसी को बिहार, महाराष्ट्र और तेलंगाना में तो कामयाबी मिलती है लेकिन 27% फीसदी पश्चिम बंगाल में न एक सीट मिलती है, न कोई जनाधार बन पाता है। असम में भी असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी, जनाधार से चूकती है, वह चुनाव लड़ने से कतराते हैं और बदरुद्दीन अजमल जैसे नेता को समर्थन देते हैं। असम में करीब 24 फीसदी आबादी मुस्लिम समुदाय की है।
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पश्चिम बंगाल में AIMIM का प्लान क्या है?
असदुद्दीन ओवैसी ने हुमायूं कबीर की पार्टी, आम जनता उन्नयन के साथ गठबंधन किया है। AIMIM ने शुक्रवार को पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के लिए अपनी पहली प्रत्याशी सूची जारी की थी। पार्टी ने कुल 12 उम्मीदवारों के नाम घोषित किए हैं।
- इमरान सोलंकी, रघुनाथगंज
- दानिश अजीज, आसनसोल उत्तर
- मिस्बाह उल इस्लाम खान, कांदी
- रेजाउल करीम, सुजापुर
- एडवोकेट मोहम्मद मुस्ताहिद हक, मोटाबाड़ी
- हाजी अंसार शेख, नलहाटी
- तासिर शेख, मोरारी
- मोनैम सरदार, बारासात
- मेहबूब आलम, करंदीघी
- असदुल शेख, सूती
- शबाना परवीन, बसीरहाट
- आसिक राज मंडल, हाबड़ा
पश्चिम बंगाल में क्यों नहीं गलती है ओवैसी की दाल?
AIMIM ने उन्हीं सीटों पर उम्मीदवार उतारा है, जो मुस्लिम बाहुल हैं। पश्चिम बंगाल में मुस्लिम समुदाय, पारंपरिक रूप से अब तृणमूल कांग्रेस का वोटर है। ममता बनर्जी के पश्चिम बंगाल में 2011 से लगातार सत्ता में रहने की एक वजह यह भी है। 34 फीसदी आबादी वाले राज्य में मुस्लिम समुदाय का खुला समर्थन, ममता बनर्जी के साथ रहा है। कांग्रेस भी अल्पसंख्यक राजनीति करती है। ओवैसी पश्चिम बंगाल की सियासत में नए हैं, हुमायूं कबीर भी नए हैं, ऐसे में असदुद्दीन ओवैसी पर जनता कितना भरोसा करती है, यह 4 मई को ही साफ हो सकेगा।
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दोनों राज्यों में पिछड़ते क्यों हैं ओवैसी?
पश्चिम बंगाल में एक तरफ ममता बनर्जी की TMC अल्पसंख्यक वोटों पर अपनी मजबूत पकड़ बनाए हुए है, दूसरी तरफ कांग्रेस है। मुस्लिम मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा भारतीय जनता पार्टी को रोकने के लिए TMC को ही एकमात्र विकल्प मानता है। 2021 के चुनावों में भी रणनीतिक वोटिंग की वजह से AIMIM को कोई सफलता नहीं मिली थी।
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असम में ओवैसी सीधे चुनाव नहीं लड़ रहे हैं। वहां बदरुद्दीन अजमल की AIUDF पहले से ही एक मजबूत अल्पसंख्यक केंद्रित पार्टी के तौर पर पहचान पा रही है। असदुद्दीन ओवैसी के लिए अपनी अलग जगह बनाना मुश्किल है। यही वजह है कि इस चुनाव में वह खुद लड़ने के बजाय AIUDF के समर्थन में प्रचार कर रहे हैं।
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वजहें, जो ओवैसी के खिलाफ बनाती हैं माहौल
- बाहरी पहचान: बंगाल और असम के ज्यादातर मुस्लिम बंगाली भाषी हैं। बंगाल में 90 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम जातीय रूप से बंगाली हैं। वहां की राजनीति में बाहरी बनाम स्थानीय का मुद्दा बहुत संवेदनशील है। बीजेपी इसका खामियाजा भुगतती है, यह नुकसान AIMIM को भी उठाना पड़ता है। कोई स्थानीय बड़ा नेता ओवैसी के पास नहीं है।
- वोटकटवा का टैग: असदुद्दीन ओवैसी की छवि पश्चिम बंगाल में मुस्लिम नेता की नहीं, वोटकटवा की है। वजह यह है कि मुस्लिम, वैचारिक रूप से तृणमूल कांग्रेस के साथ हैं। बीजेपी, टीएमसी पर मुस्लिम परस्त होने का ठप्पा भी लगाती है। अल्पसंख्यक मतदाताओं में यह डर बना रहता है कि अगर वे AIMIM के साथ जाएंगे, बीजेपी के खिलाफ वाला वोट बंट जाएगा, फायदा बीजेपी को होगा।
- BJP की टीम B का टैग: विरोधी दल, अक्सर असदुद्दीन ओवैसी पर बीजेपी की टीम बी होने का आरोप लगाते हैं। वह जितना ध्रुवीकरण करते हैं, हिंदू वोटर एकजुट होकर बीजेपी के पक्ष में वोट करते हैं। पश्चिम बंगाल और असम जैसे राज्यों में यही उनके खिलाफ जाता है।
- मुस्लिमों की पार्टी का ठप्पा: AIMIM पर सिर्फ मुस्लिमों की पार्टी होने का टैग लगा है। ओवैसी, अल्पसंख्यक राजनीति पर जोर देते हैं, इस्लाम पर जोर देते हैं लेकिन बीच-बीच में धर्मनिरपेक्षता का पाठ पढ़ा देते हैं। जनता के लिए यह तय करना मुश्किल होता है कि उनका एजेंडा क्या है। पश्चिम बंगाल में मुस्लिम तो बड़ी संख्या में हैं लेकिन सिर्फ मुस्लिमों के भरोसे वह चुनाव नहीं जीत सकते हैं। मुस्लिम वोट बंटता है, ममता बनर्जी के साथ चला जाता है। हिंदू वोटर भी ममता के साथ होते हैं और यहीं ओवैसी की राजनीति को झटका लगता है।
किन राज्यों में चुनाव नहीं लड़ रहे हैं ओवैसी?
AIMIM ने तमिलनाडु, पुदुचेरी, केरल और असम में इस बार चुनाव नहीं लड़ने का फैसला किया है।
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