तमिलनाडु में द्रविड़ मुनेत्र कझगम (DMK) की राजनीति, अब विकास की जगह, हिंदी पर आ गई है। मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के लिए ऑल इंडिया द्रविड़ मुनेत्र कझगम (AIADMK) के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन की आलोचना की सबसे बड़ी वजह उन्हें मिल गई है। AIADMK भी द्रविड़ राजनीति करती है लेकिन अब DMK यह आरोप लगा रही है कि भारतीय जनता पार्टी (BJP) के हिंदी थोपने वाले एजेंडे में यह पार्टी भी शामिल है।

एक तरफ चुनावी मौसम है, दूसरी तरफ तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के बीच तीन भाषा फॉर्मूले को लेकर जोरदार बहस छिड़ गई है। यह विवाद राज्य में इस महीने होने वाले विधानसभा चुनावों के दौरान ही शुरू हुआ है। एमके स्टालिन मानते हैं कि केंद्र सरकार की राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के तहत तीन भाषा फॉर्मूला दरअसल हिंदी थोपने की कोशिश है। 

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एमके स्टालिन, मुख्यमंत्री, तमिलनाडु:-
DMK सत्ता में रहते हुए 3 भाषा नीति को तमिलनाडु में नहीं आने देगी। जीत की संभावना है। हम सभी 234 सीटें जीतेंगे। हिंदी थोपे जाने का हमारा विरोध किसी डर की वजह से नहीं है। हमारी मातृभाषा तमिल कभी कमज़ोर नहीं होगी। तमिल और तमिल भाषी लोगों ने हर तरह के थोपे जाने या सांस्कृतिक दखल का सामना किया है, और आगे भी वे इसका विरोध करते हुए अपना अस्तित्व बचाए रखेंगे। यह सिद्धांत, गरिमा और भारत की सच्ची विविधता को बचाए रखने का मामला है।

हिंदी पर ही घिरेगा NDA?

एमके स्टालिन ने दोहरा दांव चला है। एक तरफ वह बीजेपी को घेर रहे हैं, दूसरी तरफ AIADMK पर इसके मुखर विरोध का दबाव बना रहे हैं। उन्होंने सवाल किया है कि DMK और NDA के दूसरे सहयोगी तमिल दल, तीन भाषा नीति पर क्या भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले NDA गठबंधन के साथ हैं? 

एमके स्टालिन बार-बार जोर दे रहे हैं कि तीन भाषा के नाम पर हिंदी थोपने की कोशिश की जा रही है। अब AIADMK के महासचिव ई पलानीस्वामी और उनके सहयोगी यह साफ करें कि वे बीजेपी को थोपी जा रही भाषा नीति का विरोध क्यों नहीं कर रहे हैं।

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एमके स्टालिन, मुख्यमंत्री, एमके स्टालिन:-
मैं AIADMK के महासचिव, पलानीस्वामी और उनके NDA सहयोगियों से भी अपील करता हूं कि वे अपना रुख साफ करें। क्या वे BJP की इस जोर-शोर से थोपी जा रही तीन-भाषा नीति का समर्थन करते हैं? अब समय आ गया है कि श्री पलानीस्वामी अपना रुख पूरी तरह से साफ करें कि वह तमिलनाडु की जनता के साथ खड़े हैं या फिर दिल्ली में बैठे अपने उन आकाओं के साथ, जो नीति की आड़ में हिंदी थोपना चाहते हैं।

अचानक दांव कैसे मिल गया?

केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने तीन भाषा नीति को 'भाषाई आजादी' का घोषणापत्र बता दिया। उन्होंने कहा कि हिंदी को अनिवार्य नहीं बनाया गया है। उन्होंने कहा कि बहुभाषी होना किसी खतरे की आशंका नहीं है। तमिल, किसी और भाषा के सीख लेने भर से कमजोर नहीं हो जाएगी। यह और मजबूत होगी।

धर्मेंद्र प्रधान, केंद्रीय शिक्षा मंत्री:-
एमके स्टालिन, हिंदी थोपे जाने की बात, आपकी नाकामियों को छिपाने की एक पुरानी और थकी हुई कोशिश है। NEP तो असल में भाषाई आजादी का एक घोषणापत्र है। यह मातृभाषा को सबसे ज्यादा अहमियत देती है, जिससे तमिलनाडु का हर बच्चा अपनी ही शानदार भाषा में आगे बढ़ सके। यह नीति उदार है, जिसे आप हिंदी को अनिवार्य बनाना कहकर गलत तरीके से पेश कर रहे हैं। आप तमिल की रक्षा नहीं कर रहे हैं, ऐसी रुकावटें खड़ी कर रहे हैं, जो हमारे जवानों को बहुभाषी नेता बनने से रोक रही हैं। 

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स्टालिन को हिंदी विरोध से मिलता क्या है?

एमके स्टालिन, अब AIADMK और बीजेपी को स्थानीय विरोधी बता रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया है कि समग्र शिक्षा योजना के तहत 2,200 करोड़ रुपये का बजट आवंटन केंद्र सरकार ने रोका है, क्योंकि तमिलनाडु हिंदी थोपने की नीति से असहमत है। उनका कहना है कि यह राशि केंद्र की नहीं है, तमिलनाडु के लोगों के कर का पैसा है, इसे मानने का दबाव नहीं बनाया जा सकता है। तमिलनाडु में बीजेपी के खिलाफ हिंदी और हिंदुत्व थोपे जाने के आरोप लगते रहे हैं। ऐसे में यह दांव, एमके स्टालिन को सियासी लाभ दिला सकता है। 

बीच चुनाव 'हिंदी' का जिक्र छेड़ने का मकसद क्या है?

  • द्रविड़ पहचान की सियासत: तमिलनाडु की राजनीति में DMK की पहचान, द्रविड़ और हिंदी विरोध पर टिकी है। पार्टी के विचारकों का तर्क रहा है कि हिंदी सिर्फ भाषा नहीं लेकर आती है, संस्कृति लेकर आती है, जो तमिल संस्कृति के लिए खतरा पैदा कर सकती है। 17 सितंबर 1949 को जब डीएमके की स्थापना हुई थी, तब से लेकर अब तक, पार्टी का मकसद एक रहा है। द्रविड़, दलित, वंचित और पिछड़ों का साथ, अगड़ी जातियों के उत्पीड़न का विरोध और हिंदी के खिलाफ मुखर आंदोलन, यह डीएमकी की पहचान रही है। 

  • तमिल संस्कृति की सियासत: DMK का कहना है कि केंद्र की NDA सरकार नई शिक्षा नीति (NEP) और प्रशासनिक निर्देशों के माध्यम से तमिलनाडु पर हिंदी और संस्कृत थोप रही है। एमके स्टालिन और उदयनिधि स्टालिन जैसे नेता इसे तमिल संस्कृति और भाषा के अस्तित्व पर खतरे के रूप में पेश करते हैं।

  • हिंदी विरोध का ध्रुवीकरण: भारतीय जनता पार्टी, हिंदी और हिंदुत्व की राजनीति करने वाली पार्टी रही है। बीजेपी, गैर हिंदी भाषी राज्यों में भी हिंदी को प्रमुखता देती रही है। यही बात डीएमके को खटकती है। DMK बीजेपी को एक 'उत्तर भारतीय' और 'हिंदी भाषी' पार्टी  बताती है। उनका नजरिया है कि NDA के सारे फैसले, दिल्ली से होते हैं, AIADMK की मालिक, बीजेपी है। अगर AIADMK सत्ता में आई तो रिमोट कंट्रोल, दिल्ली से ऑपरेट होगा। वह बाहरी बनाम स्थानीय का मुद्दा उठाकर बीजेपी को आसानी से घेर रहे हैं।  

  • सांस्कृतिक भय की राजनीति: तमिलनाडु सांस्कृतिक तौर पर बेहद संवेदनशील राज्यों में शामिल है। मुख्यमंत्री एमके स्टालिन, बीजेपी पर यह आरोप लगाते रहे हैं कि बीजेपी सांस्कृतिक साम्राज्यवाद में भरोसा रखती है। उनका तर्क है कि बीजेपी, 'एक राष्ट्र, एक भाषा, एक संस्कृति' पर जोर देती है, जबकि तमिल स्वतंत्र संस्कृति है। उनका तर्क है बीजेपी का विजन, सांस्कृतिक साम्राज्यवाद है, जो भारत की विविधता के विरुद्ध है। 

  • सगा बनाम सौतेले की कवायद: DMK स्थानीय जनसभाओं में यह कह रही है केंद्र सरकार, तमिलनाडु के साथ सौतेला व्यवहार करता है, हिंदी भाषी राज्यों को ज्यादा फंड देता है, जबकि तमिलनाडु जैसे प्रगतिशील राज्यों के साथ भेदभाव करता है। भेदभाव की वजह भाषा है। डीएमके का जोर, तमिलनाडु के विकास पर कम, AIADMK और NDA को घेरने पर ज्यादा है।