पश्चिम बंगाल में विपक्षियों के तमाम दावों के बावजूद ममता बनर्जी अभी तक अपने विरोधियों पर भारी पड़ी हैं। 2021 का विधानसभा चुनाव हो या फिर 2024 का लोकसभा चुनाव, तमाम दावों के बावजूद ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस के आगे भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ज्यादा असरदार नहीं साबित हुई। बेहतर बूथ मैनजमेंट, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) कार्यकर्ताओं की घर-घर तक पहुंच और हैवीवेट नेताओं की रैलियों के बावजूद तृणमूल कांग्रेस भारी पड़ती है क्योंकि उसके पास इन सबका तोड़ पहले से है। लंबे समय से पाड़ा क्लब के जरिए टीएमसी अपनी सरकार और पार्टी से लोगों को जोड़कर रखती है। इन पाड़ा क्लबों को सरकार और पार्टी दोनों की तरफ से आर्थिक मदद भी मिलती है और चुनाव के समय यही क्लब टीएमसी की मदद भी करते हैं। इसका असर यह होता है कि बूथ स्तर पर TMC बेहद मजबूत नजर आती है और तमाम कोशिशों के बावजूद मजबूत संगठन वाली बीजेपी भी पीछे छूट जाती है।
साल 2011 में सत्ता में आने के बाद से ममता बनर्जी ने स्थानीय लोगों से कनेक्ट रखने का सबसे अहम जरिया इन पाड़ा क्लबों को बनाया है। पाड़ा का मतलब होता है मोहल्ला। मोहल्ले के स्तर पर ऐसी जगहें होती हैं जहां लोग उठते-बैठते हैं, कैरम, लूडो खेलते हैं, पत्ते खेलते है, गाहे-बगाहे शराब भी पीते हैं और यही पाड़ा क्लब दुर्गा पूजा जैसे तमाम आयोजन भी करते हैं। ममता बनर्जी की सरकार हर मोहल्ले में बने इन पाड़ा क्लबों को दुर्गा पूजा के लिए सीधे तौर पर पैसे देती है तो ये सरकार के पक्ष में ही रहते हैं।
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पन्ना प्रमुख vs पाड़ा क्लब
हर बूथ पर माइक्रो मैनेजमेंट के लिए बीजेपी की ओर से पन्ना प्रमुख की तैनाती बेहद मशहूर हुई थी। हालांकि, बंगाल में ममता बनर्जी यह काम बीजेपी से भी पहले करती रही हैं। लगातार सत्ता में बने रहने से ममता बनर्जी को यह भी फायदा हुआ है कि ये पाड़ा सत्ताधारी पार्टी यानी टीएमसी के ही साथ चलते रहे हैं। इसकी वजह यह है कि इन क्लबों को पैसा मिलता रहता है।
शुरुआत में ब्लड डोनेशन कैंप और 1 मई को कम्युनिस्ट पार्टी का झंडा फहराने जैसी गतिविधियों तक सीमित रहे इन पाड़ा क्लबों को ममता बनर्जी ने अपने साथ बेहद चतुराई से जोड़ा। इन्हीं के जरिए टीएमसी ने अपनी जड़ें मजबूत कीं और पूरे पश्चिम बंगाल में अपनी मजबूत किलेबंदी कर ली। इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2012 से 2020 के बीच ही ममता बनर्जी की सरकार ने इन पाड़ा क्लबों को लगभग 1300 करोड़ रुपये दिए।
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सीधे तौर पर नहीं लेकिन असलियत में इन क्लबों के सदस्य ममता बनर्जी और टीएमसी के कार्यकर्ता की तरह काम करते हैं। ममता बनर्जी ने अपनी दुआरे सरकार और स्वास्थ्य साथी जैसी योजनाओं के जरिए लाभार्थियों को खुद से जोड़ने के लिए भी इन्हीं क्लबों का खूब इस्तेमाल किया। इसके अलावा, स्थानीय स्तर पर राशन की दुकान का कामकाज हो, किसी अन्य योजना के लिए सरकार की मदद करनी हो या फिर चुनाव में बूथ मैनेज करना हो, ये क्लब सारे काम टीएमसी के लिए आसानी से करते हैं।
क्यों भारी पड़ते हैं पाड़ा क्लब?
सरकार से अच्छी मदद मिलने के चलते कई मोहल्लों में दो से 10 तक क्लब भी होते हैं। इसमें से ज्यादातर क्लब दुर्गा पूजा के आयोजन करते हैं। अगर इनकी कुल संख्या देखी जाए तो पश्चिम बंगाल में लगभग 1 लाख क्लब काम कर रहे हैं। वहीं, पश्चिम बंगाल में बनाए गए चुनावी बूथों की संख्या ही लगभग 80 हजार है। इस तरह से ये एक क्लब आराम से एक बूथ पर नजर रखने और मतदाताओं को रिझाने के लिए काफी माना जाता है।
साल 2025 में ममता बनर्जी की सरकार ने हर रजिस्टर्ड क्लब को 1.1 लाख रुपये दिए थे। सरकार ने इसके लिए 495 करोड़ रुपये खर्च कर डाले थे। यही वजह है कि प्रदेश में 45 हजार क्लब तो सिर्फ दुर्गा पूजा का आयोजन करते हैं और सरकार से अच्छी-खासी मदद लेते हैं। दुर्गा पूजा के अलावा, यूथ क्लब, पाड़ा क्लब और स्पोर्ट्स क्लब को मिलाकर यह संख्या एक लाख के पार है।
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इन क्लबों को बिजली बिल में 80 पर्सेंट छूट मिलती है, सरकारी कैंप लगाने पर कमीशन मिलता है, सरकार इनसे कोई फीस नहीं लेती और कई योजनाओं के लिए सीधे इन्हीं क्लबों को ही पैसा मिलता है। इससे हर वर्ग के लोग इन क्लबों से जुड़े रहते हैं और लगातार किसी न किसी गतिविधि से जुड़े होने के चलते सरकार इनसे अपना कनेक्ट बनाकर रखती है।
