पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव के लिए 23 और 29 अप्रैल को दो चरणों में मतदान डाले जाएंगे। वोटरों को लुभाने के लिए तृणमूल कांग्रेस और बीजेपी जी जान से जुटे हुए हैं और जमता तक अपने मुद्दे पहुंचा रहे हैं। मुख्य मुकाबला तृणमूल कांग्रेस और बीजेपी के बीच है, जबकि कांग्रेस और वाम दल तीसरे और चौथे पायदान के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यह चुनाव पहचान, नागरिकता, शासन और रोजमर्रा की समस्याओं के इर्द-गिर्द घूम रहा है।
चाहे लोकसभा चुनाव, विधानसभा, पंचायत या फिर प्रधानी का चुनाव हो- यह किसी ना किसी मुद्दे पर लड़े जाते हैं। कुछ मुद्दे पहले से तय होते हैं तो कई चुनाव के दौरान पैदा हो जाते हैं। इस बार बंगाल में वोटर लिस्ट संशोधन, बंगाली अस्मिता, घुसपैठ और सीमा सुरक्षा, मटुआ समुदाय, महिलाओं की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था, भ्रष्टाचार और एंटी-इनकंबेंसी, अल्पसंख्यक वोट और ध्रुवीकरण आदि मुद्दे टीएमसी और बीजेपी एक दूसरे के खिलाफ उठा रही हैं। इसी बीच राज्य में चुनावी घोषणा होने के बाद से बंगाल में एक और मुद्दा बन गया है। यह मुद्दा 'बंगाल के अधिकारी' हैं।
इन अधिकारियों को लेकर अभी तक तृणमूल कांग्रेस और बीजेपी ही कर शिकायतें रही थीं। दोनों इनसे परेशान थे, लेकिन अब परेशानी वाली लिस्ट में हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस भी आ गए हैं। जज इस कदम परेशान हुए कि यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। ऐसे में आइए जानते हैं कि आखिर पार्टियों के बाद बंगाल में अधिकारियों से जज क्यों परेशान हैं?
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जज फोन लगाते रह गए, नहीं उठाया
पश्चिम बंगाल के वर्तमान चीफ सेक्रेटरी और डीजीपी ने पिछले दिनों कोलकाता हाई कोर्ट के मुख्य न्यायधीश का फोन नहीं उठाया। यह मामला देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट में उठा। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को पश्चिम बंगाल के दोनों अधिकारियों को फटकार लगाई। बंगाल के मालदा जिले में न्यायिक अधिकारों को घेरने से जुड़े मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई कर रही थी।
सुप्रीम कोर्ट ने लगाई फटकार
सुप्रीम कोर्ट ने बंगाल पुलिस को मालदा में एसआईआर के काम में शामिल न्यायिक अधिकारियों के घेराव से जुड़े मामले के रिकॉर्ड एनआईए को सौंपने का निर्देश दिया। साथ ही कोर्ट ने कहा कि स्थानीय पुलिस पर भरोसा नहीं किया जा सकता है। जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने बंगाल के चीफ सेक्रेटरी के रवैये पर सवाल उठाते हुए उनसे जवाब तलब किया और टिप्पणी की कि उनका फोन अक्सर स्विच ऑफ रहता है, यहां तक कि कोलकाता हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस भी उनसे संपर्क नहीं कर पा रहे हैं। सीजेआई ने कहा कि नौकरशाही के इस बेहद अड़ियल रवैये का सामना हमें दूसरे राज्यों में भी करना पड़ रहा है।
मुख्य न्यायाधीश को गंभीरता से नहीं लेते?
सीजेआई सूर्य कांत ने राज्य के मुख्य सचिव से पूछा कि आप मुख्य न्यायाधीश को भी गंभीरता से नहीं लेते? वो भी आपसे संपर्क नहीं कर सकते। वीडियो कॉन्फ्रेंस से पेश मुख्य सचिव ने कहा कि मैं एक बैठक के लिए दिल्ली गया था। 1 अप्रैल को दो बजे से चार बजे तक मैं फ्लाइट में था। मेरे फोन पर कोलकाता से कोई कॉल नहीं आई थी। जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने सुनवाई के दौरान कहा कि शाम को फोन आए होंगे, अगर आपने मोबाइल नंबर शेयर किया होता तो बात होती। आपके फोन अक्सर बंद रहते हैं। अगर वो खुले होते या आप फोन उठाते तो यह हाई कोर्ट प्रशासन के लिए बेहद मददगार होता।
चीफ सेक्रेटरी दुष्यंत नारियाला ने कहा कि मेरे नंबर उनके लिए उपलब्ध हैं। एक और नंबर है जो ज्यादा सिक्योर और कनेक्टिविटी बेहतर है। जस्टिस बागची ने कहा कि आपकी सुरक्षा कुछ ज्यादा ही है। आप इतने ऊंचे नहीं हो सकते कि मुख्य न्यायाधीश की आप तक पहुंच न हो पाए। अपने आप को कम ऊंचा रखिए, ताकि कोलकाता हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस जैसे यानी आम सेवक आपसे जुड़ सकें।
सीजेआई ने बंगाल के मुख्य सचिव को कोर्ट ने कोलकाता हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस को लिखित माफी मांगने का निर्देश दिया।
बीजेपी का अधिकारियों को लेकर आरोप
बीजेपी लगातार टीएमसी पर अधिकारियों का दुरुपयोग करने का आरोप लगी रही है। बीजेपी का कहना है कि राज्य सरकार प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों का राजनीतिक इस्तेमाल कर रही है। आरोप है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने में अधिकारी निष्पक्ष नहीं हैं और टीएमसी के पक्ष में काम कर रहे हैं। कई मामलों में बीजेपी नेताओं के कार्यक्रमों के दौरान पुलिस पर लापरवाही बरतने का आरोप लगा है।
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भगवा पार्टी ने इसके अलावा चुनाव प्रक्रिया में टीएमसी पर अधिकारियों के बल पर बाधा डालने का आरोप लगाया है। बीजेपी का आरोप है कि अधिकारियों द्वारा विपक्षी गतिविधियों में बाधा डाली जा रही है और चुनावी प्रक्रिया को निष्पक्ष तरीके से नहीं चलाया जा रहा। बीजेपी का मुख्य आरोप यह है कि बंगाल में अधिकारियों की निष्पक्षता खत्म हो गई है। राज्य में टीएमसी सरकार के दबाव में काम कर रहे हैं और इससे चुनाव की पारदर्शिता प्रभावित हो रही है।
टीएमसी के अधिकारियों को लेकर आरोप
तृणमूल कांग्रेस भी बीजेपी पर अधिकारियों और उनके तबादलों को लेकर आरोप लगा रही है। टीएमसी ने कहा है कि चुनाव आयोग और अधिकारी बीजेपी के प्रभाव में हैं और उनके लिए काम कर रहे हैं। टीएमसी ने इसमें सबसे बड़ा आरोप लगाया है कि चुनाव आयोग और कई अधिकारी निष्पक्ष नहीं हैं। बल्कि वे बीजेपी के इशारे पर काम कर रहे हैं।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने तो सीधे आरोप लगाते हुए कहा कि चुनाव आयोग बीजेपी का कठपुतली बन गया है। उन्होंने कहा कि बंगाल में कुछ फैसले एकतरफा लिए जा रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस लगातार बीजेपी और चुनाव आयोग पर आरोप लगा रही है कि दोनों मिलकर राज्य के अधिकारियों के तबादले कर रहे हैं। सत्तारूढ दल ने अधिकारियों और बीजेपी नेताओं की मिलीभगत का भी आरोप लगाया है कि कुछ वरिष्ठ अधिकारी बीजेपी नेताओं के साथ मिलकर काम कर रहे हैं।
हालांकि, चुनावी घोषणा के बाद ही चुनाव आयोग ने बंगाल में बड़े प्रशासनिक फेरबदल कर दिए थे। चुनाव आयोग ने पहले पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव और गृह सचिव का तबादला कर दिया था। घोषणा के बाद यह राज्य में पहला तबादला था, इसके बाद तबादलों का सिलसिला चल पड़ा।
डीजीपी- आईजी को हटाया
चुनाव आयोग ने राज्य के डीजीपी, आईजी और कोलकाता के पुलिस कमिश्नर को उनके पद से हटा दिया। उनकी जगह नए अधिकारियों को जिम्मेदारी सौंपी गई। चुनाव आयोग ने पुलिस विभाग में इस बड़े प्रशासनिक फेरबदल से पहले पश्चिम बंगाल की चीफ सेक्रेटरी नंदिनी चक्रवर्ती को उनके पद से हटा दिया है। उनकी जगह 1993 बैच के आईएएस अधिकारी दुष्यंत नारियाला को नया चीफ सेक्रेटरी बनाया गया।
इन तबादलों के बाद तृणमूल कांग्रेस ने आरोप लगाया कि बीजेपी चुनाव जीतने के लिए सरकारी संसाधनों का गलत इस्तेमाल कर रही है। जिन अधिकारियों को हटाया गया है उनकी नियुक्ति ममता बनर्जी सरकार ने की थी और कई अधिकारियों को सीएम का भरोसेमंद भी माना जाता था।
चुनाव आयोग ने सिर्फ बड़े अधिकारियों के ही तबादले नहीं किए। आयोग ने 30 मार्च को पश्चिम बंगाल चुनाव से पहले 173 थाना प्रमुखों और प्रभारी निरीक्षकों का ट्रांसफर कर दिया था। आयोग ने इन पुलिस अधिकारियों का ट्रांसफर करते हुए कोलकाता पुलिस के अधीन आने वाले 31 थाने के जूनियर अधिकारियों के तबादले कर दिए। इस तबादले में भवानीपुर पुलिस स्टेशन के एसएचओ का भी नाम शामिल है। भवानीपुर से ही मुख्यमंत्री ममता बनर्जी चुनाव लड़ रही हैं।
