केरल के चुनाव में रबर की खेती करने वाले किसानों की चर्चा हर बार होती है। इस बार कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने वादा किया है कि अगर केरल में यूनाइटेड डेमोक्रैटिक फ्रंट (UDF) की सरकार बनती है तो रबर के किसानों को 250 रुपये प्रति किलो का समर्थन मूल्य दिलाया जाएगा। इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी वादा किया है कि UDF की सरकार आई तो किसानों की आय स्थिर करने के प्रयास किए जाएंगे। इस वादे के बाद रबर के किसान चुनाव का केंद्र बन गए हैं।
कुछ दिनों पहले ही केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने रबर किसानों का जिक्र करते हुए कहा था कि केंद्र में चाहे कांग्रेस की सरकार रही हो या फिर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की, दोनों ने ऐसे नीतियां बनाईं कि रबर सेक्टर धराशायी हो गया। उन्होंने यह भी कहा कि लेफ्ट की सरकार ने ही रबर किसानों पर ध्यान दिया और उनकी फसल के लिए उन्हें न्यूनतम समर्थन मूल्य दिलाया। आपको यह बता दें कि मौजूदा समय में केरल के किसानों को एक किलो प्राकृतिक रबर के लिए 200 रुपये मिलते हैं। केरल सरकार ने पिछले साल 1 नवंबर को ही इसे बढ़ाकर 180 रुपये से 200 रुपये किया था।
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राहुल गांधी ने सोमवार को कहा, '2016 में लेफ्ट ने वादा किया था कि रबर की कीमत 250 करेंगे। 2026 में अब ये लोग 200 रुपये दे रहे हैं। मैं वादा करता हूं कि हमारी सरकार बनी तो पहली कैबिनेट मीटिंग में रबर का दाम 250 रुपये प्रति किलो किया जाएगा और आने वाले समय में इसे और भी बढ़ाया जाएगा।' राहुल के इस वादे को रबर किसानों को लुभाने के लिए किया गया वादा भी माना जा रहा है।
कितने अहम हैं रबर के किसान?
मुख्य रूप से तटीय इलाकों में रहने वाले रबर के किसान कैथलिक हैं और चर्च के इशारे पर वोट करते रहे हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में चर्च ने बीजेपी के समर्थन का एलान किया था और उसके वोट प्रतिशत में जबरदस्त इजाफा भी हुआ था। लगभग 20 लाख लोग ऐसे हैं जिनके परिवार रबर की खेती और रबर उत्पादन करते हैं। इसमें ज्यादातर किसान ऐसे हैं जिनके पास छोटे खेत हैं और रबर के उत्पादन से ही वे अपने घर चलाते हैं।
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केरल में हर साल लगभग 6 लाख टन से ज्यादा रबर का उत्पादन होता है। इसके बावजूद रबर के किसान गरीबी में जी रहे हैं। भले ही रबर के दाम 200 और 250 करने की बात हो रही हो लेकिन किसानों को मिलने वाला औसत दाम 170 रुपये से भी कम है। अब 10 साल से केरल की सत्ता से बाहर चल रही कांग्रेस और उसके गठबंधन UDF को तटीय जिलों में जीत के लिए कैथलिक वोटों की जरूरत है। यही वजह है कि खुद राहुल गांधी ने रबर किसानों को लुभाने वाला वादा किया है और इस पर भरोसा दिलाने के लिए यह भी कहा है कि पहली ही कैबिनेट मीटिंग में इससे जुड़ा फैसला लिया जाएगा।
क्या हैं रबर की खेती से जुड़ी समस्याएं?
सेंटर फॉर पब्लिक पॉलिसी रिसर्च की एक रिपोर्ट बताती है कि रबर बोर्ड का बजट साल 2021-22 में 190 करोड़ था और 2025-26 में इसे बढ़ाकर 360.31 करोड़ रुपये कर दिया गया। इसके बावजूद 2013-14 में जो उत्पादन 1629 किलो प्रति हेक्टेयर था वह 2023-24 में घटकर 1485 किलो प्रति हेक्टेयर हो गया। इसका असर यह हुआ है कि घरेलू स्तर पर जितनी मांग है उससे भी कम उत्पादन हो पा रहा है। नतीजतन भारत को रबर का आयात करना पड़ रहा है।
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दरअसल, नेचुरल रबर पहले तो पेड़ से निकाला जाता है और इसी से स्मोक शीट या रबर की शीट तैयार की जाती हैं। रबर के किसान यही रबर शीट मार्केट में बेचते हैं। इन्हीं शीट का इस्तेमाल करके बड़ी कंपनियां खिलौने, टायर और रबर के अन्य उत्पाद बनाती हैं। अब समस्या यह है कि रबर का नया पेड़ लगाने पर उसमें से रबर कम से कम 5 से 7 साल बाद निकलना शुरू होता है। इतने समय तक कोई कमाई नहीं हो सकती है। एक पेड़ 25 से 40 साल तक रबर निकालता है लेकिन पुराने पेड़ों से रबर नहीं निकल पाती है।
एक पेड़ से सालाना लगभग 7 से 10 किलो रबर ही निकाली जा सकती है। अगर किसी के पास 100 पेड़ भी हैं और मौजूदा रेट और अधिकतम उत्पादन के हिसाब से जोड़ें तो 100 पेड़ के हिसाब से सालाना उत्पादन 1000 किलो होगा। अगर 200 रुपये का रेट भी मिल जाए तब भी सालाना कमाई 2 लाख रुपये ही बनती है। यही वजह है कि रबर के रेट को लेकर कई बार सवाल उठते हैं और हर चुनाव में यह अहम मुद्दा बनता है।
