देश के समुद्र तटीय राज्यों में रहने वाला मछुआरा समुदाय मछली पालन पर आश्रित होता है। ये लोग समुद्र में जाकर मछली पकड़ते हैं। ये मछलियां स्थानीय स्तर से लेकर दूर देश में भी बेची जाती हैं। केरल वैसा ही एक राज्य है जिसके ज्यादातर जिले समुद्र तट पर बसे हैं और अच्छी-खासी आबादी मछली पालन पर आश्रित है। 30 से 40 विधानसभा सीटों पर प्रभाव रखने वाले ये लोग हर चुनाव में कुछ मुद्दों को लेकर वोट करते हैं लेकिन हर बार उनकी उम्मीदें धरी की धरी रह जाती हैं। इस बार भी केरल के मछुआरा समुदाय के लोगों का कहना है कि वे मैनिफेस्टो देखकर ही यह तय करेंगे कि किस पार्टी या गठबंधन को वोट देना है। तमाम वादों के बावजूद उम्मीदें पूरी होने से इस वर्ग में बड़े स्तर पर निराशा भी है।
केरल में लगभग 20 लाख लोग ऐसे हैं जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मछली के कारोबार से जुड़े हुए हैं। कोई समुद्र में जाकर मछली पकड़ता है तो कोई समुद्र तट से मार्केट तक ले जाने का काम करता है। कुछ ऐसे कारोबारी भी हैं जो मछलियों को दूसरे देश में बेचने का काम भी करते हैं। मुख्य रूप से ये लोग लैटिन कैथलिक यानी ईसाई हैं। हालांकि, बाकी धर्मों के लोग भी इस काम से जुड़े हुए हैं। इन लोगों के जीवन और इनकी राजनीतिक समझ पर आज भी चर्च का अच्छा-खासा असर माना जाता है।
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बीते कुछ समय में मछली उत्पादन कम होने से और चिंता बढ़ी है। इसकी बड़ी वजह यह भी है कि समुद्र तट के कई इलाकों को खनन के लिए लीज पर दे दिया। इसके चलते मछलियों का मिलना कम हो गया है। साथ ही, बहुत सारे लोग पीने के पानी के लिए भी परेशान रहे हैं। समुद्र तट पर बसे बहुत सारे लोग अभी भी पैसे देकर पानी खरीद रहे हैं और राज्य या केंद्र सरकार पीने के पानी का पर्याप्त इंतजाम नहीं कर पाई है।
केरल और मछली का कारोबार
केरल में समुद्री सीमा 590 किलोमीटर की है। एक्सक्लूसिव इकनॉमिक जोन के अंतर्गत आने वाला क्षेत्रफल 2.19 लाख वर्ग किलोमीटर है। 2015 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, लगभग 8 लोग इस कारोबार से जुड़े हुए थे। 2012-13 में ही इस कारोबार का केरल की जीडीपी में योगदान लगभग 3.49 लाख करोड़ रुपये का था। समुद्र तट से लगी सभी 30 से 35 विधानसभाओं में मछुआरे रहते हैं और उनके ही वोट से इन सीटों पर जनप्रतिनिधियों का चुनाव होता है।
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जलवायु परिवर्तन के चलते बदलती समुद्री सीमा से भी मछुआरों का नुकसान हुआ है। इसी समस्या से निपटने के लिए 7.36 किलोमीटर की एक समुद्री दीवार भी बनाई गई है। हालांकि, कई लोगों का यह भी मानना है कि जलवायु परिवर्तन से जुड़ी समस्याओं में सरकार ज्यादा कुछ नहीं कर सकती है।
क्या हैं समस्याएं?
मछली पकड़ने के लिए गहरे पानी में जाना होता है और यह काम डीजल से चलने वाली नावों के जरिए होता है। डीजल की कीमतें लंबे समय से स्थिर रही हैं लेकिन मछुआरों की मांग हमेशा से रही है इसमें उन्हें मदद मिले। हर चुनाव में मछुआरे यह मांग राजनीतिक दलों के सामने रखते रहे हैं। हालांकि, इस समस्या का कोई स्थायी निदान अब तक नहीं मिल पाया है।
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केरल में समुद्र तट पर खनन की अनुमति देने से भी मछुआरों के एक बड़ा वर्ग नाराज बताया जा रहा है। इसके लिए मछुआरों ने कई बार प्रदर्शन भी किया। दरअसल, मछुआरों का कहना है कि इस तरह के खनन की अनुमति दिए जाने से पानी में धुंधलापन बढ़ेगा और जलीय जीवन प्रभावित होगा। इसका नतीजा यह होगा कि मछलियां समुद्र के और अंदर चली जाएंगी और वहां से मछली लाना आसान काम नहीं होगा। आम तौर पर मछुआरे पानी के अंदर 25 से 40 किलोमीटर तक जाते हैं लेकिन दिसंबर-जनवरी में टूना मछली पकड़ने के लिए उन्हें 100 किलोमीटर तक जाना पड़ता है।