इजरायल-अमेरिका और ईरान के बीच जारी टकराव स्ट्रेट ऑफ होर्मुज सबसे ज्यादा चर्चा का कारण बना हुआ है। ईरान ने यहां से गुजरने वाले जहाजों पर रोक लगा दी जिसका नतीजा यह हुआ कि अरब देशों से दुनिया के बाकी देशों तक होने वाला कारोबार लगभग ठप पड़ गया है। इसकी वजह है कि दुनिया को जाने वाला लगभग एक चौथाई तेल इसी रास्ते से होकर गुजरता है। अब बाल अल-मंडब स्ट्रेट भी चर्चा में है और कयास लगाए जा रहे हैं कि अगर स्थिति नहीं सुधरती है तो इस रास्ते पर भी असर पड़ सकता है। एशिया और अरब देशों को यूरोप और अमेरिका से जोड़ने वाला यह रास्ता अगर बंद होता है तो भारत समेत तमाम एशियाई देशों के कारोबार को बड़ा झटका लग सकता है। यही वजह है कि इसके जिक्र मात्र से पूरी दुनिया में खलबली मची हुई है।
यह समझना जरूरी है कि भारत ऊर्जा, उर्वरक, खाद्य और तमाम अन्य जरूरतों के लिए अरब, यूरोप, अमेरिका और अफ्रीका के देशों पर निर्भर है। भारत के कारोबारियों का कच्चा या तैयार माल भी इन देशों में खूब जाता है। इस कारोबार का सबसे आसान और सबसे ज्यादा निर्भरता वाला रास्ता समुद्री रास्ता है। अरब के देशों तक जाने के लिए स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और यूरोप के देशों तक जाने के लिए स्ट्रेट ऑफ बाब अल-मंडब अहम रास्ते हैं। बाकी के रास्ते ज्यादा खर्चीले और कम सुरक्षित हैं। ऐसे में सबसे ज्यादा जरूरी है इनकी सुचारु रूप से चालू रहना। आइए समझते हैं कि ये रास्ते भारत समेत बाकी दुनिया के लिए कितने अहम हैं।
क्यों जरूरी हैं ये रास्ते?
ईरान, इराक, कुवैत, सऊदी अरब, UAE और कतर जैसे देशों से भारत का कारोबार जिस संकरे रास्ते से होता है उसी को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज कहते हैं। मौजूदा हालात में यह बंद है और भारत का जो कारोबार प्रभावित हुआ है, वह मुख्य तौर पर इन देशों से ही होता है। यूरोप और अमेरिकी देशों से होने वाले काराबोर पर असर नहीं पड़ा है क्योंकि उन देशों से होकर आने वाले जहाज दूसरे रास्ते से आते हैं।
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अब यूरोप से आने वाले जहाजों का रास्ता समझते हैं। यूरोप के ज्यादातर देशों से आने वाले जहाज भूमध्य सागर से होते हुए स्वेज नहर के रास्ते स्वेज की खाड़ी और फिर लाल सागर में दाखिल होते हैं। लाल सागर के एक तरफ सऊदी अरब और यमन हैं। दूसरी तरफ मिस्र और सूडान जैसे देश हैं। इसी लाल सागर के आखिरी छोर पर जो संकरा रास्ता पड़ता है उसे बाब अल-मंडब स्ट्रेट कहा जाता है। इसके एक ओर यमन और दूसरी तरफ डिजबूती पड़ते हैं। अगर यह रास्ता किसी भी कारण से बंद होता है तो भारत पर इसका बुरा असर पड़ेगा।
दरअसल, उत्तरी अफ्रीका और यूरोप के देशों को होने वाले व्यापार का 50 से 60 प्रतिशत हिस्सा इसी रास्ते से होकर गुजरता है। इसके अलावा भारत के कुल व्यापार का जितना हिस्सा समुद्र के रास्ते जाता है उसका एक चौथाई हिस्सा इस रास्ते से गुजरता है। यानी अगर यह रास्ता बंद हुआ तो भारत के आयात और निर्यात दोनों पर असर पड़ेगा। यही असर एशियाई देशों के साथ-साथ अमेरिका और यूरोप के देशों पर भी पड़ेगा क्योंकि उनके कारोबार भी इसी रास्ते से होते हैं।
तीसरा रास्ता सोमालिया, केन्या, मोजांबिक और साउथ अफ्रीका होते हुए अमेरिका की ओर जाता है लेकिन यह रास्ता बेहद खर्चीला, ज्यादा समय लेने वाला और कम सुरक्षित है। इसकी वजह है कि सोमालिया जैसे देशों में समुद्री लुटेरे आज भी इस रास्ते को खतरनाक बनाते हैं। ऐसे में भारत समेत दुनिया के देशों के लिए यह जरूरी है कि किसी भी सूरत में स्टेट ऑफ बाब अल-मंडब बंद न हो और जल्द से जल्द स्ट्रेट ऑफ होर्मुज भी खुल जाए।
क्यों बढ़ी चिंता?
हाल ही में बाब अल-मंडब चर्चा में आ गया था क्योंकि हूती समूहों के एक वरिष्ठ नेता ने कहा था कि वे पूरी तरह से सैन्य विकल्पों के लिए तैयार हैं। ऐसे ही कुछ संकेत ईरान ने दिए थे कि वह बाब अल-मंडब के रास्ते को प्रभावित कर सकता है। एक ईरानी न्यूज एजेंसी के मुताबिक, अगर अमेरिका स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खुलवाने के लिए सैन्य कार्रवाई का रास्ता अपनाता है तब उस स्थिति में ईरान हूतियों की मदद से स्ट्रेट ऑफ बाब अल-मंडब को बंद करने की कोशिश कर सकता है।
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इसी के बाद यह देखा गया कि डोनाल्ड ट्रंप के तेवर नरम पड़ गए और उन्होंने ईरान के पावर प्लांट्स पर हमले रोकने का आदेश दे दिया। हालांकि, दूसरी तरफ अमेरिका लगातार अपने सैनिकों को इस क्षेत्र में भेज रहा है जिसके चलते चिंता बढ़ रही है और सभी देश आशंकित हैं।
हूती हैं बड़ा खतरा
स्ट्रेट ऑफ बाब अल-मंडब पर खतरा इसलिए है क्योंकि यमन में सक्रिय हूती ईरान समर्थित हैं। मौजूदा हालात में जब स्ट्रेट ऑफ होर्मुद बंद है तो सऊदी अरब एक ऐसा देश है जो अपने यानबू बंदरगाह के जरिए आयात-निर्यात कर पा रहा है। वह भी तब तक संभव है जब तक यमन में बैठे हूती शांत हैं। अगर हूती इसके खिलाफ उतर आते हैं तो यह रास्ता भी बंद हो सकता है। साल 2024 में हूती विद्रोहियों ने एक कार्गो शिप पर मिसाइल मारकर उसे डुबा दिया था। यह बताता है कि इस रास्ते से गुजरना तभी संभव है जब हूती इसके लिए राजी हों।
वैकल्पिक रास्तों से कितना नुकसान होगा?
भारत से यूरोप और अमेरिका के देशों को अंगूर और मीट जैसे सामान भेजे जाते हैं जो जल्दी खराब हो सकते हैं। अगर अफ्रीका वाले रास्ते से सामान भेजा जाएगा तो 15 से 20 दिन अतिरिक्त लगेंगे और ये चीजें खराब हो सकती हैं। इन चीजों को बचाए रखने के लिए ज्यादा खर्च करना पड़ेगा और फिर उनका दाम मार्केट में कंपटीशन के लिए लायक नहीं बचेगा। साल 2024 में हूतियों के हमलों के कारण भारत ने ऐसी स्थिति एक बार झेली भी है।
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एक आशंका यह भी है कि अगर हूती इस रास्ते पर हमला करते हैं तो तेल की कीमतों पर बुरा असर पड़ेगा। पहले ही आसमान छू रहा कच्चा तेल कम से कम 10 डॉलर प्रति बैरल और महंगा हो सकता है। इसका असर भारत की तेल कंपनियों पर पड़ेगा और उनका खर्च और भी बढ़ जाएगा। भारत ने मौजूदा स्थिति में 41 देशों से तेल लेना शुरू कर दिया है लेकिन इसमें से भी ज्यादातर तेल इसी रास्ते से होकर आ रहा है। ऐसे में इस रास्ते पर असर पड़ने से भारत की तेल सप्लाई बुरी तरह प्रभावित हो सकती है।
