पड़ोसी देश नेपाल में जब से सत्ता परिवर्तन हुआ है और बालेंद्र शाह प्रधानमंत्री बने हैं, भारत के साथ रिश्ते बहुत अच्छे नहीं चल रहे हैं। जिस नेपाल के साथ भारत का रोटी-बेटी का रिश्ता था अब उसमें रुकावट आ रही है। दरअसल, नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ने भारत से जाने वाले भारतीय सामानों पर कस्टम ड्यूटी लगा दी है। भारत-नेपाल बॉर्डर से 100 रुपये से ज्यादा का सामान ले जाने पर नेपाल को कस्टम ड्यूटी देनी होगी। नेपाल अपने पुराने नियम को सख्ती से लागू कर रहा था, जिससे कि उसे राजस्व बढ़ सके।
इसके अलावा भारत-नेपाल की खुली सीमा पर अब पहले जैसी आसानी नहीं रह गई है। नेपाल सरकार ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए भारतीय नागरिकों के लिए पहचान पत्र अनिवार्य कर दिया है। पिछले हफ्ते से लागू हुए इस नए नियम के बाद बिहार के अररिया जिले स्थित जोगबनी बॉर्डर पर अफरा-तफरी का माहौल देखने को मिला है। बिना पहचान पत्र पहुंचे सैकड़ों यात्रियों को नेपाल पुलिस ने सीमा से ही वापस लौटा दिया।
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लिपुलेख दर्रे से यात्रा कराने पर आपत्ति
नेपाल सरकार ने इसी महीने भारत और चीन को राजनायिक स्तर पर चेतावनी भेजकर लिपुलेख दर्रे से यात्रा कराने पर आपत्ति दर्ज की थी। नेपाल का कहना है कि लिंपियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी पर उसका अधिकार है और भारत को वहां कोई गतिविधि नहीं करनी चाहिए। हालांकि, भारत ने इसपर आपत्ति जताते हुए कहा, 'लिपुलेख दर्रा साल 1954 से ही कैलाश मानसरोवर यात्रा का पारंपरिक रास्ता रहा है। यह कोई नई बात नहीं है। भारत नेपाल के साथ सभी मुद्दों पर बातचीत के लिए तैयार है और सीमा संबंधी लंबित मुद्दों को संवाद के जरिए सुलझाने को तैयार है।'
नेपाल को यह खटकता क्यों है?
नेपाल, लिपुलेख दर्रे को अपना मानता है। भारत कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए लिपुलेख का इस्तेमाल करता रहा है। नेपाल का दावा है कि ब्रिटिश काल के दौरान साल 1816 में भारत और नेपाल के बीच सुगौली संधि हुई थी। यह संधि, महाकाली नदी के पूर्व में स्थित, लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा पर नेपाल को संप्रभुता का हक देती है।
विदेश सचिव विक्रम मिस्री का दौरा रद्द
नेपाल के इस बदलते रवैये को देखते हुए भारत के विदेश सचिव विक्रम मिस्री का नेपाल दौरा तय था लेकिन बीच में ही यह दौरा रद्द करना पड़ा। उन्हें 11 मई को दो दिवसीय यात्रा के लिए काठमांडू पहुंचना था। भारत सरकार ने नेपाल की नई बालेंद्र शाह सरकार के साथ बातचीत करने और उसकी प्राथमिकताओं को समझने के लिए अपने विदेश सचिव विक्रम मिस्री को काठमांडू भेजने का फैसला किया था। इस यात्रा से द्विपक्षीय संबंधों की भविष्य की दिशा तय होने की उम्मीद थी लेकिन अब ये दौरा टल गया है।
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पड़ोसियों के साथ रिश्ते पहले ही ठीक नहीं
खास बात ये है कि भारत के अपने पड़ोसियों के साथ रिश्ते पहले ही ठीक नहीं हैं। पाकिस्तान से भारत के संबंध कैसे हैं यह किसी से नहीं छिपा है। हाल के वर्षों में बांग्लादेश कई बार भारत को आंख दिखा चुका है। मालदीव भी आंख दिखाकर चीन के करीब जा चुका है, हालांकि बाद में भारत ने कुटनीतिक चालों से मालदीव को सामान्य किया। ऐसे में एक और पड़ोसी देश नेपाल का नाराज होना भारत के लिए अच्छा नहीं होगा।
खासतौर से चीन नेपाल को वर्षों से साधने की कोशिश में रहा है। चीन यहां भारी निवेश करके नेपाल की जमीन को भारत के खिलाफ रणनीतिक रूप से इस्तेमाल करना चाहता है। मगर, भारत लंबे समय से नेपाल को अपने पक्ष में किए हुए है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या सच में दिल्ली घेरी जा रही है? क्योंकि भारत का आखिरी पड़ोसी देश भी बागी हो रहा है।
